Shiv Sena Split: बालासाहेब की विरासत को बर्बाद करने वाला वारिस
Shiv Sena Split: बाल ठाकरे अगर आज जिंदा होते तो शिवसेना को ये दिन नहीं देखने पड़ते, जो उनकी शिवसेना और शिवसैनिक देख रहे हैं। ठाकरे की विरासत के वारिस उद्धव ठाकरे से उनके ज्यादातर विधायक व सांसद पहले ही छिटक गए थे, अब शिवसेना का असली नाम और प्रचलित चुनाव चिन्ह भी उनसे छिन गए है।
'बालासाहेब की शिवसेना' एकनाथ शिंदे वाले बड़े गुट के पास पहुंच गया है। पार्टी, विधायक, सांसद, चुनाव चिन्ह और शिवसेना का झंडा सब कुछ खो देने के बाद उद्धव का कहना है कि चुनाव आयोग उनके साथ अन्याय कर रहा है।

उद्धव ने आयोग से आश्वासन मांगा है कि शिंदे गुट के पक्ष में आयोग ऐसा पक्षपातपूर्ण व्यवहार जारी नहीं रखेगा और दोनों समूहों को बराबर स्वीकारेगा।
बाल ठाकरे की तरह ही जो उद्धव ठाकरे, उनकी शिवसेना और उनके शिवसैनिक हर मौके पर हर किसी को झटके देने को लिए कुख्यात होने की हद तक विख्यात रहे हैं, उन्हीं उद्धव के लिए सन 2022 झटकों का वर्ष कहा जा सकता है।
इस साल बाला साहेब के वारिस से उसके विधायक और सांसद अलग हो गये। पार्टी टूट गयी और शिवसेना की नाम पहचान सब मिट गयी। और यह सब उन्हीं उद्धव के फैसलों के कारण हुआ जिन्हें उनके पिता बाल ठाकरे अपनी राजनीतिक विरासत सौंपकर गये।
दुनिया आज शिवसेना के हाल पर हंस रही है। लोग समझ रहे हैं कि शिवसेना के मामले में उद्धव से गलती कहां हुई और गलती को सुधारने की कोशिश तक उनसे क्यों नहीं हुई। चुनाव चिन्ह तो गया ही, बाला साहेब का नाम भी शिंदे को मिलना, उद्धव के लिए सबसे बड़ा झटका है।
लगातार 56 साल से जिस बाघ और तीर - धनुष को शिवसेना अपनी ताकत दिखाने के लिए इस्तेमाल करती रही है, उसका चुनाव चिन्ह तीर-धनुष अब फ्रीज हो गया है। अब मशाल शिवसेना का चुनाव चिन्ह है और पार्टी का नया नाम है - शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे।
चुनाव आयोग के आदेशों के अनुसार उद्धव ठाकरे की पार्टी के पास बाल ठाकरे का नाम तो रहेगा लेकिन पिता के रूप में। पार्टी की पहचान तो उद्धव की शिवसेना के रूप में ही होगी।
बाला साहेब की शिवसेना शिंदे गुट वाली शिवसेना को कहा जाएगा। एकनाथ शिंदे की शिवसेना का नाम है 'बालासाहेब की शिवसेना' और चिन्ह मिला है ढाल और तलवार।
शिवसेना के वर्तमान हालात को देखकर यह तो कहा ही जा सकता है कि बाल ठाकरे की राजनीतिक विरासत के वारिस कहे जाने वाले उद्धव ठाकरे न तो अपने पिता की पार्टी को सही से सम्हाल सके, न उनके प्रखर हिंदुत्व के रास्ते पर चल पाए और न ही उनके सत्ता में न आने के वचन का पालन कर पाए।
राजनीतिक विश्लेषक संदीप सोनवलकर कहते हैं कि बाल ठाकरे घोषित रूप से अपने परिवार के किसी भी सदस्य के चुनाव लड़ने तथा सरकारों में किसी भी पद पर बैठने के समर्थक कभी नहीं रहे।
सोनवलकर की जानकारी की पुष्टि करते हुए वरिष्ठ पत्रकार अभिमन्यु शितोले बताते हैं कि बाला साहेब के जीते जी शिवसेना ने अपने दो मुख्यमंत्री बनाए, 1995 में मनोहर जोशी और 1999 में नारायण राणे, लेकिन ठाकरे परिवार के किसी भी सदस्य ने सरकार में पद पाने की लालसा नहीं पाली। सोनवलकर और शितोले की बात में दम है, लेकिन बाद में वक्त बदला तो शिवसेना भी बदल गई।
यह भी पढ़ें: Uddhav Thackeray:शिवसेना में बाल ठाकरे की राजनीतिक विरासत को उद्धव ने कितना सहेजा-कितना गंवाया ?
बाल ठाकरे की शिवसेना की एक कट्टर हिन्दू राष्ट्रवादी दल के रूप में पहचान होने के बावजूद 2019 में उसके मुखिया उद्धव ठाकरे कांग्रेस व राष्ट्रवादी कांग्रेस से हाथ मिलाकर मुख्यमंत्री क्य़ा बने, अपनी शिवसेना को संभालना ही भूल गए जैसे बाल ठाकरे संभालते थे।
उद्धव सत्ता का सुख भोगने में इतने मगन हो गए कि उनके साथ के 40 से ज्यादा विधायक और कई सांसद 21 जून 2022 को शिंदे के साथ अलग हो गए पर उनको भनक तक नहीं लग पाई।
सोनवलकर कहते हैं कि राजनीति का पहला नियम ही यही है कि नेता को सदा चौकन्ना रहना चाहिए, अपने आस पास के लोगों में क्या चल रहा है उस पर ध्यान तो उसका सबसे पहले होना चाहिए।
साथ ही भविष्य में घटनेवाली हर घटना का भान भी होना चाहिए तथा साथियों को साथ रखने की तरकीब भी अपनाए रखनी चाहिए। लेकिन उद्धव राजनीति की यह रीत निभा नहीं पाए, इसी कारण शिवसेना टूट गई, ज्यादातर विधायक और सांसद उद्धव का साथ छोड़कर एकनाथ शिंदे के साथ निकल गये और उद्धव हाथ मलते रह गए।
अब शिवसेना का चुनाव चिन्ह तीर कमान भी चुनाव आयोग ने फ्रीज कर दिया है, बदले में उसे मशाल थमा दी है और ज्यादातर सांसदों व बहुमत विधायकों वाली एकनाथ शिंदे की शिवसेना को बालासाहेब का नाम मिला और चुनाव चिन्ह के रूप में ढाल और तलवार। राजनीतिक हलकों में इसे उद्धव की राजनीतिक कमजोरी के रूप में देखा जा रहा है।
हालांकि जानकार इसे एक सहज राजनीतिक घटना मानते हैं। लेकिन शिवसेना के कई नेता ही नहीं उसकी राजनीति की धमक और धारा को जाननेवाले लोग जानते हैं कि बाल ठाकरे ने 19 जून 1966 को जब शिवसेना का गठन किया तो उसके बाद इस पार्टी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। लेकिन इसी पार्टी की ऐसी दशा हो गयी कि 29 जून 2022 को अल्पमत में आए उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने को लिए मजबूर होना पड़ा।
शिवसेना के नेतृत्व, नाम और पहचान को लेकर उद्धव के साथ एकनाथ शिंदे के बीच खींचतान शुरू हुई, और बवाल जब बहुत बढ़ गया, और मामला चुनाव आयोग तक पहुंचा, तो आयोग ने शिंदे गुट को बालासाहेबांची शिवसेना अर्थात बालासाहेब की शिवसेना नाम दे दिया। एकनाथ शिंदे जैसा कि कहते रहे हैं कि वे ही बाल ठाकरे के सच्चे उत्तराधिकारी है, जो एक तरह से उनके उस दावे की पुष्टि को प्रमाणित करता लगता है।
दूसरी तरफ उद्धव खेमे को आयोग ने शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे नाम दिया है, जिसे लेकर शितोले मानते हैं कि यह उद्धव को आभाहीन करने की साजिश भी हो सकती है।
मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे अपनी पार्टी को बालासाहेब की शिवसेना नाम और दो तलवारों के बीच ढाल चुनाव चिन्ह मिलने से लगभग संतुष्ट दिख रहे हैं। उन्होंने कहा है कि यह शिवसेना का पुराना चुनाव चिन्ह है, जो एक मराठी संस्कृति का प्रतीक है, साथ ही यह छत्रपति शिवाजी और उनके सैनिकों का प्रतीक है, जो वार करने और किसी अन्य के वार से बचने की निशानी है।
उनका कहना है कि हमें बालासाहेब का नाम मिला, जिस पर लोगों की भी अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है। शिंदे के विधायक दल के प्रवक्ता भरत गोगावले बोले कि ऐसा लगता है कि बाला साहेब ऊपर से हमें आशीर्वाद दे रहे हैं।
उधर, उद्धव ठाकरे ने चुनाव आयोग पर उनकी पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह देने के मामले में भेदभाव का आरोप लगाया है। उद्धव गुट के वकील विवेक सिंह ने चुनाव आयोग को 4 पेज के लिखे अपने पत्र में कहा है कि आयोग ने हाल ही जो प्रक्रियाएं अपनाई उससे शिंदे गुट को अनुचित रूप से बढ़ावा मिला है।
उन्होंने आयोग से उद्धव की शिवसेना के लिए इस आशय का आश्वासन भी मांगा है कि एकनाथ शिंदे गुट के पक्ष में आयोग आइंदा ऐसा कोई पक्षपातपूर्ण व्यवहार नहीं करेगा जिससे लगे कि वह उसे बढ़ावा दे रहा है।
उद्धव ठाकरे भले ही अपनी पार्टी के नाम को चुनाव आयोग का अन्याय मानते हैं, लेकिन उनके लिए यह अपने अंतस में झांकने का वक्त है कि खुद उन्होंने बाल ठाकरे की विरासत, उनकी राजनीतिक धमक और हिंदुत्व की विचारधारा के साथ कितना न्याय किया है।
वैसे, न्याय व अन्याय राजनीति के धंधेबाजों के हिसाब से सुविधाजनक शब्द हो सकते हैं, लेकिन हर शब्द की मर्यादा और हर कर्म की अपनी गरिमा होती है। इस गरिमा को तोड़ने वालों का अपराध भी तो किसी को तय करना ही होता है।
फिर, बात अगर राजनीतिक न्याय और अन्याय की है, तो न्यायशास्त्र का दैवीय विधान अपने सारे न्यायों का निर्धारण इसी लोक में करता है, जिसे शिवसेना अपने साथ होता हुआ देख रही है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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