Uddhav Thackeray:शिवसेना में बाल ठाकरे की राजनीतिक विरासत को उद्धव ने कितना सहेजा-कितना गंवाया ?
शिवसेना की कमान जब खुद संस्थापक बाल ठाकरे के हाथों में थी, तभी छगन भुजबल ने 17 और विधायकों के साथ पार्टी सुप्रीमो के खिलाफ विद्रोह कर दिया था। यह शिवसेना का वो दौर था, जब बाल ठाकरे पर पार्टी को अपनी जागरी समझ लेने के आरोप भी लगने लगे थे। 18 जुलाई, 1992 को सीनियर ठाकरे ने पार्टी के मुखपत्र सामना में एक आर्टिकल लिखा और पार्टी छोड़ने की घोषणा कर दी। दो दिन बाद मुंबई में शिवसेना दफ्तर के सामने शिवसैनिकों की भीड़ उमड़ पड़ी। सबकी जुबान पर एक ही अपील थी कि बाल ठाकरे अपने फैसले पर फिर से विचार करें। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को गुस्साए शिवसैनिकों का सामना करना पड़ा, क्योंकि उनपर संदेह था कि वे बाला साहेब के प्रति वफादार नहीं रहे। बाल ठाकरे शिवसैनिकों के अपने प्रति इस विश्वास को 'टाल' नहीं सके और उनकी गुजारिश को स्वीकार किया। इसके बाद बाल ठाकरे जबतक जीवित रहे, उनका शिवसेना पर एकाधिकार स्थापित रहा और उन्होंने आगे चलकर बेटे उद्धव ठाकरे को उत्तरधिकारी के तौर पर स्थापित करने का प्रयास शुरू कर दिया।

शिवसेना तीन दशकों में कहां से कहां पहुंच गई
ठीक 30 साल बाद उनके बेटे उद्धव ठाकरे के सामने भी वही परिस्थितियां थीं। एकनाथ शिंदे की अगुवाई में करीब 40 विधायकों ने बगावत का ऐलान किया था। लेकिन, बाल ठाकरे और उद्धव के कार्यकाल में बड़ा फर्क था। बाल ठाकरे ने कभी भी सत्ता को आत्मसात नहीं किया। बल्कि, वह अपने प्रभाव से दूर रहकर भी सरकार को चलाने का माद्दा रखते थे और उन्होंने इसे बखूबी करके दिखाया भी। उद्धव के साथ स्थिति बिल्कुल अलग थी। वह खुद ही पार्टी की कमान भी संभाल रहे थे और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भी सियासत के नए प्रयोग से बैठे हुए थे। लेकिन, फिर भी 29 जून, 2022 को उद्धव को ना सिर्फ बिना किसी हो-हंगामें के मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी, बल्कि उन्होंने दो साल पुरानी एमएलसी की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया। उनके इस फैसले पर कार्यकर्ता क्या करते ये देखना बाकी ही था कि उन्होंने भाषण देकर शिवसैनिकों से शांत रहने की अपील कर दी। एकनाथ शिंदे ने जितनी आसानी से अगले मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली, उसकी उम्मीद किसी शिवसैनिक भी ने नहीं की होगी। उद्धव ने बहुत ही सामान्य तरीके से शिंदे के सामने सरेंडर कर दिया था। उन्होंने नए मुख्यमंत्री को बधाई देने में भी देरी नहीं की। तीन दशकों में शिवसेना के बदले नेतृत्व का यह स्पष्ट उदाहरण था।

उद्धव की बीएमसी चुनाव में होगी पहली बड़ी अग्निपरीक्षा
लेकिन, कुछ दिनों बाद उद्धव ठाकरे ने जरूर अपने तेवड़ सख्त दिखाने की कोशिशें से शुरू कीं। लेकिन, शायद तबतक गेंद हाथ से निकल चुकी थी। पार्टी कार्यकर्ताओं के मन में इससे अनिश्चिचता ही बढ़नी शुरू हुई। उन्हें समझने में दिक्कत होने लगी कि करीब एक दशक पहले पिता से पूर्ण उत्तराधिकार प्राप्त करने के बाद उद्धव बची हुई शिवसेना को किस ओर ले जाना चाह रहे हैं? करीब साढ़े तीन महीने बाद वह दिन आया, जब उद्धव ठाकरे ना तो शिवसेना का असली नाम बचा पाए और ना ही चुनाव चिन्ह। उद्धव के साथ सबसे बड़ा समर्थन आज भी कहीं मौजूद है तो वह मुंबई में है, जहां इनके गुट के 15 में से 8 विधायक आते हैं। यहां बदले हालातों में उद्धव की पहली बड़ी अग्निपरीक्षा एमसीडी चुनाव में होनी है, जो कि पिछले कई वर्षों से पार्टी की 'लाइफ लाइन' की तरह रही है।

उद्धव अकेले चुनावों में भी ज्यादा दम नहीं दिखा सके
शिवसेना के लिए वैसे उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में हुए बीएमसी चुनावों का ट्रैक रिकॉर्ड भी देखें तो तस्वीर बहुत ज्यादा रोमांचित करने वाला नहीं रही है। 2002 के बीएमसी चुनावों में शिवसेना के लिए उद्धव ठाकरे ने बड़ी भूमिका निभाई थी। वह पार्टी के कैंपेन इंचार्ज थे। हालांकि, तब बाल ठाकरे खुद ही मौजूद थे और पूरी तरह सक्रिय भी। तब पार्टी ने 227 में से 97 सीटें जीती थीं। लेकिन, इसके तत्काल बाद उद्धव के हाथों में सत्ता का हस्तांतरण शुरू हो गया। 2003 में ही उन्हें पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया जा चुका था। 2007 में पार्टी को बीएमसी में सिर्फ 84 सीटें मिलीं। 2012 में यही सीटें घटकर सिर्फ 75 रह गईं (इसी साल बाल ठाकरे का देहांत हुआ था)। 2017 में बीजेपी-शिवसेना अलग-अलग चुनाव लड़ी थे और शिवसेना को महज 84 सीटें मिलीं। विधानसभा चुनावों में भी उद्धव वह करिश्मा कभी नहीं दिखा सके, जो जलवा उनके पिता ने बना रखा था। मसलन, 1995 में शिवसेना को विधानसभा की 288 में से 73 सीटें मिली थीं और वह सत्ता में आई थी। लेकिन, जब से उद्धव ठाकरे सक्रिय हुए, 2004 में उसे 62, 2009 में 45, 2014 में 63 (बीजेपी-शिवसेना अलग-अलग चुनाव लड़े थे) और 2019 में 56 सीटें मिलीं।

उद्धव का कद बढ़ता गया, बाल ठाकरे की विरासत धूमिल होती गई!
2003 से 62 वर्षीय उद्धव ठाकरे का शिवसेना में औपचारिक दखल बढ़ना शुरू हुआ था। उनके सक्रिय होने के बाद इस साल जून में हुआ विभाजन तीसरा था। उनसे बगवात करने वालों की शिकायत रही है कि उनका व्यक्तित्व बाल ठाकरे जैसा नहीं है, लेकिन फिर भी वह उम्मीद करते हैं कि लोग उनसे उन्हीं जैसा बर्ताव करें और उनकी कार्य-प्रणाली को आंख मूंद कर स्वीकार करते रहें। उनके बारे में यह भी शिकायत रही है कि वह परिवार और एक खास मंडली से घिरे रहते हैं, जो उनके पिता के व्यक्तित्व से पूरी तरह से अलग है। उनके फैसलों में पत्नी रश्मि ठाकरे और बेटे आदित्य ठाकरे के अलावा पार्टी सांसद संजय राउत का बहुत प्रभाव माना जाता है, जिनके जरिए पार्टी एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार की दखलअंदाजी के भी आरोप बढ़ते गए हैं और इस तरह से उद्धव ठाकरे अपने पिता वाली छवि से निरंतर दूर होते चले गए हैं।

उद्धव की शिक्षा और परिवार
27 जुलाई, 1960 को जन्मे उद्धव ठाकरे राजनीति में आने से पहले पत्रकारिता में भी हाथ आजमा चुके हैं और फोटोग्राफी उनका पसंदीदा विषय रहा है। वे मुंबई के सर जेजे कॉलेज ऑफ आर्ट से ग्रेजुएट हैं और वे एक प्रोफेशनल वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर भी रहे हैं। परिवार में पत्नी रश्मि ठाकरे और बेटे आदित्य के अलावा दूसरे बेटे तेजस ठाकरे भी हैं, जो फिलहाल राजनीति से दूर हैं लेकिन, पिता की तरह पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीवों पर शोध करने में दिलचस्पी रखते है।

उद्धव ठाकरे के पास संपत्ति कितनी है
महाराष्ट्र और खासकर मुंबई की राजनीति में बाल ठाकरे की हैसियत चाहे जितनी भी बड़ी रही हो, आदित्य ठाकरे के चुनावी राजनीति में आने से पहले ठाकरे परिवार की आर्थिक हैसियत का अंदाजा भी लगा पाना मुश्किल था। 2020 में जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहते हुए उद्धव ठाकरे ने विधान परिषद के चुनाव के लिए नामांकन भरा, तब औपचारिक तौर पर पहली बार अपनी संपत्ति का ब्योरा पेश किया। इसके मुताबिक उनके पास तब कुल 143 करोड़ रुपए की चल-अचल संपत्ति थी, लेकिन उनके नाम पर कोई भी गाड़ी नहीं थी। चुनावी हलफनामे में यह भी बताया गया था कि इस संपत्ति में से उन्हें सिर्फ 14.50 करोड़ रुपए की संपत्ति विरासत में मिली है। लेकिन, उनके पास जो एक बड़ी प्रॉपर्टी थी, वह चर्चित मातोश्री बंगला है, जिसमें उद्धव ने अपना शेयर 75% होने का दावा किया था। उन्होंने अपनी आमदनी का जरिया, सैलरी, ब्याज, लाभांश और पूंजीगत लाभ को बताया था। उस तारीख तक उनके खिलाफ 23 आपराधिक मामले भी दर्ज थे।
-
Gold Rate Today: ईरान जंग के बीच लगातार गिर रहे सोने के भाव, अब 10 ग्राम की इतनी रह गई है कीमत, नए रेट -
UGC के नए नियमों पर आज फैसले की घड़ी! केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में देगी सफाई -
Iran US War: 'खुद भी डूबेंगे सनम तुम्हें भी ले डूबेंगे', ट्रंप पर भड़के बक्शी, कहा- Trump ने जनता से झूठ बोला -
PNG Connection: गैस संकट के बीच सबसे बड़ी गुड न्यूज! सिर्फ 24 घंटे में खत्म होगी किल्लत, सरकार ने उठाया ये कदम -
Gold Silver Price Crash: सोने-चांदी के दाम में बड़ी गिरावट, सिल्वर 13000, गोल्ड 5500 सस्ता, अब इतनी रह गई कीमत -
Gujarat UCC: मुस्लिम महिलाओं को हलाला से आजादी, दूसरी शादी पर 7 साल जेल! लिव-इन तक पर सख्त नियम, 5 बड़े फैसले -
Kangana Ranaut: 'कंगना-चखना सब चटनी है', मंडी सांसद पर भड़के ये दिग्गज नेता, कहा-'पर्सनल कमेंट पड़ेगा भारी' -
शुरू होने से पहले ही बंद होगा IPL? कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला, BCCI की उड़ गई नींद -
Silver Rate Today: जंग के बीच धड़ाम हुआ रेट, ₹15,000 सस्ती चांदी! आपके शहर में क्या है 10 ग्राम सिल्वर का भाव? -
Rajasthan Diwas 2026: 30 मार्च की जगह 19 को क्यों मनाया जा रहा राजस्थान दिवस? चौंका देगा तारीख बदलने का कारण! -
LPG Update: कितने दिन का बचा है गैस सिलेंडर का स्टॉक? LPG और PNG कनेक्शन पर अब आया मोदी सरकार का बड़ा बयान -
Hindu Nav Varsh 2026 Wishes :'राम करे आप तरक्की करें', नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं












Click it and Unblock the Notifications