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Rural Unemployment: समावेशी विकास पर जोर, तो मनरेगा की क्यों काट रहे डोर?

मनरेगा को समावेशी विकास का माध्यम माना जाता है। इसके कारण न सिर्फ लोगों को रोजगार और न्यूनतम आय की गारंटी मिलती है बल्कि पानी पर्यावरण में भी सुधार आ रहा है। फिर भला सरकार ने इसके बजट में क्यों कमी कर दी?

Rural Unemployment: MNREGA fund cut in budget which is considered of inclusive development

Rural Unemployment: समावेशी विकास को सशक्त करने के लिए देश में नरेगा यानी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना शुरू की गई। 2 अक्टूबर 2009 को इसमें राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का नाम जोड़ते हुए इसे मनरेगा की संज्ञा दी गई। यह योजना ग्रामीण रोजगार की दृष्टि से एक क्रांतिकारी पहल साबित हुई है। इसने देश के समावेशी ढांचे को न केवल पुख्ता किया बल्कि पलायन से लेकर गरीबी और भुखमरी आदि के मोर्चे पर भी अंकुश लगाने में कारगर कामयाबी हासिल की। स्थानीय स्तर पर रही छिटपुट प्रशासनिक खामियों को दरकिनार कर देखें तो बुनियादी विकास की दृष्टि से आजीविका के एक विकल्प के रूप में सहायक है मनरेगा।

इसमें कोई दो राय नहीं कि किसी भी योजना की प्रगति और सफलता में बजट की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। पिछले 10 सालों में सरकार मनरेगा को लेकर बहुत अधिक उत्साहित और बजट के मामले में सकारात्मक रही है। साल दर साल केंद्रीय बजट में सरकार मनरेगा के मद में आवंटित की जाने वाली राशि में वृद्धि करती रही है। एक दशक के अंतराल पर यह पहला मौका है जब सरकार ने मनरेगा से मुंह मोड़ते हुए गत वर्ष की तुलना में 18% की कटौती की है।

केंद्र सरकार के बजट 2023-24 में समावेशी विकास के लिए गठित "मनरेगा" योजना के लिए 60 हजार करोड रुपए आवंटित किए गए हैं जो पिछले बजट में आवंटित किए गए 73 हजार करोड़ के मुकाबले 18 प्रतिशत और संशोधित अनुमान से करीब 32% कम है।

हालांकि सरकार के आर्थिक संतुलनकार तर्क दे रहे हैं कि बजट आवंटन में कटौती के बावजूद रोजगार पर कोई असर नहीं पड़ेगा। इनका मानना है कि प्रधानमंत्री आवास योजना, ग्रामीण और जल जीवन मिशन से जुड़ी अन्य योजनाओं के मदों में अच्छी खासी रकम बढ़ा दी गई है इसलिए रोजगार पर असर नहीं पड़ेगा, अलबत्ता रोजगार में वृद्धि होगी। लेकिन हमें यहां थोड़ा ठहर कर सोचना होगा कि मनरेगा एक ऐसी योजना है जो सभी के लिए रोजगार की गारंटी करती है।

मालूम हो कि मनरेगा दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक कल्याण कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम से देश में समावेशी विकास का दायरा लगातार बढ़ता रहा है। योजना के आरंभिक 10 सालों में लगभग 3 लाख करोड रुपए इस पर खर्च किए गए। वर्ष वार मनरेगा के तहत काम करने वाले व्यक्तियों की तादाद लगातार बढ़ती रही है। वर्ष 2013-14 में लगभग 8 करोड़ लोग मनरेगा के तहत रोजगार प्राप्त किए थे। रोजगार प्राप्त करने वालों में महिलाओं की संख्या कई वित्त वर्षों में आधी से अधिक रही है। इस योजना के तहत प्रत्येक परिवार के श्रम करने के इच्छुक व्यस्क सदस्यों के लिए 100 दिन का गारंटी युक्त रोजगार दिए जाने का प्रावधान है। इसी तरह सूखाग्रस्त क्षेत्रों और जनजाति इलाकों में 100 दिन की बजाय डेढ़ सौ दिनों के रोजगार का प्रावधान है।

इस योजना के तहत मजदूरी का भुगतान न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948 के तहत राज्य में खेतिहर मजदूरों के लिए निर्दिष्ट मजदूरी के अनुसार ही किया जाता है। पंचायती राज व्यवस्था को मनरेगा के तहत किए जा रहे कार्यों के नियोजन, कार्यान्यवन और निगरानी हेतु उत्तरदायी बनाया गया है। पंचायती राज व्यवस्था की स्थापना संविधान के 73वें संशोधन के जरिए वर्ष 1992 में की गई थी।

आजादी के बाद से ही सरकार गरीबी उन्मूलन और वंचित वर्गों के लोगों के कल्याण से जुड़े मुद्दों पर बल देती रही है। इसी के चलते केंद्र तथा राज्य सरकार अपने बजट का बड़ा हिस्सा तमाम सामाजिक कल्याण के कार्यों और आजीविका में सहायक कार्यक्रमों पर व्यय करने के लिए तय करती रही हैं। इन कार्यक्रमों का बुनियादी उद्देश्य सामाजिक और सरकारी सहायता की जरूरत वाले तबकों को गुणवत्तापूर्ण जीवन के लिए न्यूनतम सुविधाएं सुनिश्चित करना रहा है।

अमृत काल में चल रही भारतीय अर्थव्यवस्था का न सिर्फ आकार बड़ा हुआ है बल्कि इसके पास भी अपनी सफलता और संघर्ष की कहानी है जो आने वाले समय में विकास को दिशा दिखाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। करोना महामारी से उपजे संकट के पहले भी देश ने कई दौर की वैश्विक मंदियों के अतिरिक्त पड़ोसी देशों के साथ कई युद्ध, खाद्यान्न संकट, विकास के लिए जरूरी तकनीक और पूंजी की कमी सहित कई चुनौतियों का सामना किया है। लेकिन समय के साथ देश ने प्रगति की है। प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी हुई है। सरकारी कर राजस्व संग्रह में भी वृद्धि हुई है।

सबसे बड़ा सवाल है कि समावेशी विकास के लिए समावेशी ढांचे का होना आवश्यक है। लगातार बढ़ रही जनसंख्या और गांव से शहरों की ओर हो रहे पलायन के कारण समावेशी विकास को कई तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र ने 2030 तक गरीबी के सभी रूपों को समाप्त करने का लक्ष्य तय किया है, वही केंद्र की सरकार ने वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य तय किया था जिसे अब आगे बढ़ा दिया है। कृषि क्षेत्र खासकर ग्रामीण आबादी को केंद्र में लिए बगैर यह लक्ष्य कैसे हासिल किया जा सकता है।

सरकार ने अपने बजट में कृषि के लिए पैकेज तैयार करने समेत ग्रामीण डिजिटलीकरण को बढ़ावा देने पर जोर दिया है, मगर हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि मनरेगा एक ऐसे यंत्र की तरह है जो आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारियों का भी पूरा पूरा निर्वहन करता है। ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार साधनों की आवश्यकता अभी पूरी नहीं हुई है। हालांकि केंद्र सरकार ने कौशल विकास पर फोकस करते हुए रोजगार के नए नए अवसर सृजित करने का विकल्प प्रस्तुत किया है किंतु जब हम दुनिया के अन्य देशों से कौशल विकास की तुलना करते हैं तो निराशा हाथ लगती है। हमारे देश में कुल 25 हजार कौशल विकास केंद्र हैं जिनमें अधिकांश शहरों में स्थित हैं। पड़ोसी चीन में 5 लाख से अधिक कौशल विकास केंद्र हैं जबकि दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया जैसे कम आबादी वाले देशों में भी कौशल केंद्रों की संख्या हमारे देश की तुलना में कई गुना अधिक है।

ऐसे में हमें थोड़ा रुक कर सोचने की जरूरत है। पूरी दुनिया में आजकल समावेशी विकास का जयकारा जोर-जोर से लगाया जा रहा है किंतु कई बार नवउदारवाद और उत्तर-नवउदारवाद के थैले पर महज नई चिप्पी चिपकाकर अंदर से खोखला और सारहीन कर दिया जाता है ताकि उसी पुराने चरखे पर काम में लाई हुई सूत फिर से काती जा सके। इसलिए समावेशी विकास की राह में खड़े कैक्टस उखाड़िए, गुलाब लगाकर सुवासित कीजिए।

यह भी पढ़ें: Women Empowerment: स्त्री सशक्तीकरण का भारतीय दर्शन

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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