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Women Empowerment: स्त्री सशक्तीकरण का भारतीय दर्शन

भारतीय जीवन दर्शन में स्त्री पुरुष दो अलग तत्व हैं। स्त्री होने का अर्थ किसी पुरुष से प्रतिस्पर्धा नहीं है। स्त्री होना प्रकृति प्रदत्त नैसर्गिक शक्ति है। उस शक्ति का अपने भीतर अनुभव करना ही स्त्री सशक्तीकरण है।

Indian philosophy of women empowerment

Women Empowerment: भारतीय समाज में संतुलन, न्याय, समग्र विकास में नारी के योगदान के विश्लेषण की अनेकानेक परतें दिखाई पड़ती हैं। परिवार, भारतीय समाज व्यवस्था की वह ईकाई है जिसकी कल्पना नारी के बिना की ही नहीं जा सकती। भारतीय संस्कृति में जहां - स्त्री के बिना मकान घर नहीं, बिना स्त्री चेतना के सामाजिक संतुलन नहीं, त्यौहार नहीं, परिवार नहीं, वहाँ हमें स्त्री अधिकार के लिए विशेष प्रयोजन और आयोजन करने पड़ रहे हैं। क्या यह चिंता का विषय नहीं है?

यदि व्यापक दृष्टिकोण से हम भारतीय संस्कृति और स्त्री योगदान की चर्चा करेंगे ऐसी तमाम बातें भी उभर कर आती हैं कि भारतीय स्त्री ज्ञान परंपरा की संवाहक रही हैं। भारतीय शास्त्रों में स्त्री को सर्वोच्च शक्ति के रूप में प्रतिष्ठापित किया गया है।

शक्ति संगम तंत्र के तारा खण्ड में शिव जी कहते हैं,
'नारी त्रैलोक्य जननी, नारी त्रैलोक्य रूपिणी
नारी त्रिभुवन धारा, नारी देह स्वरुपिणी॥'
अर्थात् - 'नारी त्रैलोक्य की माता है, वही त्रैलोक्य का प्रत्यक्ष विग्रह है। नारी ही त्रिभुवन का आधार और वही शक्ति की देह है।'

लेकिन समकालीन समाज में भारतीय नारी के ज्ञान, उसकी योग्यता, गुण के गौरव भाव को अपकर्ष की स्थिति में पहुंचाने का कार्य कई स्तर पर किया गया है। आधुनिक स्त्री विमर्श में, बाजारवाद खूब हावी दिखता है। उत्पाद के प्रचार ने स्त्री भाव - भंगिमाओं को ही नहीं बल्कि, भावनाओं को भी जिस प्रकार बेचा है, उस पर 'माई बॉडी माई चॉइस' जैसे नारों ने स्त्री को ही उत्पाद की तरह देखने की भूमिका रच दी है। जब इस विषय पर कोई आपत्ति उठे तो वे भारतीय शास्त्रों में से 'कामसूत्र' का नाम लेकर इसे परंपरा बताने लगते हैं। यह हास्यास्पद ही नहीं निंदनीय भी है।

वात्स्यायन के कामसूत्र में सृष्टि की सृजनात्मक शक्ति, पालन की आधार स्त्री की प्रज्ञा, उनका चिंतन, सृजन, अनुशासन के पक्ष और जीवन के प्रति दृष्टिकोण के भाव उनके प्रति स्वतः सम्मान पैदा करते हैं। कामसूत्र में यह वर्णित है कि कैसे तत्कालीन स्त्रियां जीवन को स्वस्थ रखने के लिए कितनी आत्मनिर्भर थीं। वे अपनी गृह वाटिका में मूलक, आलुक, कन्द, पलंकी, दमनक, आम्रातक, ऐर्वारूक (फूट), त्रपुष (kheera), वार्ताक (बैंगन) , कुष्मांड, अलावु (लौकी) सूरण, शुकनासा (अगस्त), तिल पर्णिका, अग्नि मंथ लहसुन, पलाण्डु (प्याज) आदि उगाती थीं।

कामसूत्र में वर्णित इस सूची से पता चलता है कि भारत आज से 2 हजार साल पहले से रसोई के आयुर्वेदिक यानी आयुष सम्बन्धी ज्ञान को जानता था जिसका आधार स्त्रियां थीं। आज भी हम दादी मां के नुस्खे या नानी मां के नुस्खे की बात करते हैं तो इसका यही संकेत होता है कि भारतीय समाज में स्त्रियों के पास स्वास्थ्य को लेकर गहन जानकारी थी। वो जानती थीं कि उनकी रसोईं से परिवार के स्वास्थ्य को कैसे ठीक रखा जा सकता है।

आरोग्य विधाओं में ज्ञान को परंपरागत रूप में सीखने, प्रयोग करने और आगे बढ़ाने का काम भारतीय स्त्रियां करती रही हैं। ये स्त्रियां किसी भी क्षेत्र से हों वहां के प्राकृतिक अनुकूलन को भली भांति समझते हुए मौसम व लक्षण के अनुरूप इनका प्रयोग जानती रही हैं।

गृह देवियां उस समय आयुष लाभ वाले जड़ी बूटी और मसाले भी स्वयं उत्पन्न कर लेती थीं। जहां एक ओर जीरा, सरसों, अजवायन, सौंफ, तेज पत्ता आदि का स्थान होता था वहीं वाटिका के दूसरे भाग में कुब्जक (मालती) आमलक, मल्लिका (बेला) जाती (चमेली), कुरंटक, नव मालिका, तगर, जपा आदि वृक्ष, पुष्प, लताओं को उगाती थीं। इनके औषधीय प्रयोग, दैहिक, मानसिक और आत्मिक परिष्कार के लिए इनके विशेष प्रयोजन क्या हैं, इनका सहज ज्ञान स्त्रियों को होता था।

इससे थोड़ा और आगे बढ़कर हम अपनी संस्कृति में वेदों की प्रज्ञाशील नारियों की यदि बात करें तो उनमें निःसंदेह अम्भृणी परम ओजस्विनी है। वाग्देवी सूक्त में उसकी उद्घोषणा 'अहं राष्ट्रीसंगमनी वसुनाम्।'
आज के तथाकथित नारीवाद से कहीं अधिक सशक्त अभिव्यक्ति है। वे कहती हैं - अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्। तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्यावेशयन्तीम्॥

अर्थात "मैं ही राष्ट्री अर्थात् सम्पूर्ण जगत् की ईश्र्वरी हूं। मैं उपासकों को उनके अभीष्ट वसु-धन प्राप्त कराने वाली हूं। जिज्ञासुओं के साक्षात् कर्तव्य परब्रह्म को अपनी आत्मा के रुप में मैंने अनुभव कर लिया है। जिनके लिये यज्ञ किये जाते हैं, उनमें मैं सर्वश्रेष्ठ हूं। सम्पूर्ण प्रपञ्च के रुप में मैं ही अनेक-सी होकर विराजमान हूं। सम्पूर्ण प्राणियों के शरीर में जीवनरुप में मैं अपने-आपको ही प्रविष्ट कर रही हूं। भिन्न-भिन्न देश, काल, वस्तु और व्यक्तियों में जो कुछ हो रहा है, किया जा रहा है, वह सब मुझमें मेरे लिये ही किया जा रहा है। सम्पूर्ण विश्व के रुप में अवस्थित होने के कारण जो कोई जो कुछ भी करता है, वह सब मैं ही हूं।"

ब्रह्मवाद पर गार्गी से याज्ञवल्क्य से वितर्क वैदिक नारी की श्रेष्ठता का अप्रतिम उदाहरण है। बौद्ध धर्म में गौतमी, सुंदरी एवं पटाचारा जैसी स्त्रियों की त्रिपटकों के निर्माण में भूमिका तथा बौद्ध संघ के अंदर विमर्श और प्रतिवाद की उनकी शक्ति, स्त्रीचेतना के आदर्शतम उदाहरण हैं। सातवाहन शासिका नागणिका, शुंग राजवंश की प्रखर प्रशासिका धारिणी, वाकाटक शासिका प्रभावती गुप्त, कन्नौज की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली राजश्री एवं चोलपट्ट महिषी लोखाम्बा देवी अपने युग की नारीशक्ति की श्रेष्ठतम् उदाहरण हैं। दुर्भाग्यवश इन महान नारियों का आज के समसामयिक स्त्री विमर्श में कहीं कोई भी उल्लेख नहीं आता।

वर्तमान में जो स्त्री सशक्तिकरण या स्त्री मुक्ति की बात है, ये पुरुष की तरह हो जाने का अभियान है। स्त्री का स्थान पुरुष की जगह हो ही नहीं सकता। यदि ऐसा होता तो सृष्टि में परम शक्ति को स्त्री पुरुष दो का निर्माण ही क्यों करना होता? क्यों देह ही नहीं बल्कि चेतना के स्तर पर भी अलग अनुभूति के लिए शरीर में अलग - अलग व्यवस्था की गयी होती? क्यों गर्भ और मातृत्व स्त्री के हिस्से में ही होता?

किसी भी जीव ने स्वयं स्त्री या पुरुष होना नहीं चुना, पर स्त्री और पुरुष होने के उत्तरदायित्व को समझना आवश्यक है। और यह उत्तरदायित्व लेने की प्रेरणा और शक्ति अपने देश की ही प्रज्ञाशील नारियों और पुरुषों से ली जा सकती है। स्त्री होने की गुणता और स्त्रीत्व की शक्ति को जानने के लिए उधार की दृष्टि की आवश्यकता नहीं।

आज यह प्रश्न उठना चाहिए कि क्या वाकई स्त्री भारत की ऐसी ही थी, जैसी हमें बताई जाती है? या फिर कहानी कुछ और है। पश्चिमी सभ्यताओं में विच हंटिंग की घटनाओं को भारत में प्रत्यारोपित कर देखने से क्या स्त्री सशक्तिकरण होगा? एक दूसरे के पूरक स्त्री - पुरुष को एक दूसरे के विरोध और प्रतिद्वंदी के रूप में स्थापित करने के विमर्श से क्या प्राप्त होगा? यह संघर्ष के दो ध्रुव तैयार करने हेतु बनाई गई पृष्ठभूमि है, जहां स्त्री कहीं समाज का पूरक अंग न होकर हमेशा परिवार, बच्चे और व्यावसायिक जीवन में संघर्षरत चित्रित की जाती है।

भारतीय स्त्री को आयातित स्त्रीवादी का विमर्श की आवश्यकता नहीं है। जिस दिन यह बोध जागृत हो जाएगा उस दिन स्पष्ट होगा कि स्त्री होने का अर्थ किसी सत्ता या पुरुष से प्रतिद्वंदिता नहीं है। स्त्री होना प्रकृति प्रदत्त नैसर्गिक शक्ति है। उस शक्ति का अपने भीतर अनुभव करना नारी सशक्तीकरण है। इस सहज विशिष्टता को देखने के लिए किसी बाहरी दृष्टि की ज़रूरत नहीं। अपने देश की स्त्रियों की समृद्ध गौरवशाली विरासत को देखने के लिए अपनी मौलिक दृष्टि की ही आवश्यकता है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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