India US Trade: क्या है अमेरिका की धारा 301? जिस पर भारत मांग रहा गारंटी, दिल्ली ने खेला मास्टरस्ट्रोक!

India US Trade: भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित Trade Deal को लेकर एक बड़ा अपडेट सामने आया है। जिसमें भारत की शर्त ने डोनाल्ड ट्रंप की टेंशन बढ़ा दी है। दोनों देशों के अधिकारी लगातार बातचीत कर रहे हैं और समझौते के मसौदे पर काम जारी है। हालांकि, नई दिल्ली चाहती है कि भविष्य में अमेरिका ऐसा कोई कदम न उठाए जिससे इस समझौते के तहत मिलने वाले फायदे कमजोर पड़ जाएं। खासतौर पर भारत की चिंता अमेरिकी ट्रेड कानून की धारा 301 (Section 301) को लेकर है। जानेंगे क्या है धारा 301 और क्या है शर्त।

टैरिफ रद्द होने के बाद बदली अमेरिका की नीति

इस साल अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए कुछ जवाबी टैरिफ को रद्द कर दिया था। ये टैरिफ International Emergency Economic Powers Act (IEEPA) के तहत लगाए गए थे। अदालती फैसले के बाद अमेरिका ने व्यापारिक कार्रवाई के लिए दूसरे कानूनी विकल्पों पर ध्यान देना शुरू किया। इनमें सबसे अहम है Trade Act 1974 की Section 301, जो अमेरिका को विदेशी व्यापारिक नीतियों की जांच करने और जरूरत पड़ने पर सीधे जवाबी कार्रवाई करने का अधिकार देती है।

भारत समेत कई देशों पर चल रही है जांच

अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) ने इस समय कई देशों के खिलाफ Section 301 के तहत जांच शुरू कर रखी है। इस सूची में भारत, चीन, जापान, यूरोपीय संघ, सिंगापुर समेत कई देश शामिल हैं। इन जांचों का असर भारत के कुछ सबसे बड़ी इंडस्ट्रीज पर पड़ सकता है। यही वजह है कि इंडियन इंडस्ट्री और सरकार दोनों इस मामले को गंभीरता से देख रहे हैं।

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नई दिल्ली पहुंचे अमेरिकी ट्रेड सेक्रेटरी

सोमवार को दक्षिण और मध्य एशिया के लिए डिप्टी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव ब्रेंडन लिंच के अगुवाई में एक अमेरिकी डेलिगेशन नई दिल्ली पहुंचा। उनका यह दौरा भारत-अमेरिका ट्रेड एग्रीमेंट पर चल रही बातचीत के नए दौर की शुरुआत माना जा रहा है। दोनों पक्ष व्यापारिक मतभेदों को कम करने की कोशिश में जुटे हैं।

भारत को Section 301 से क्यों है चिंता?

भारत और अमेरिका फरवरी 2026 से व्यापार समझौते पर काम कर रहे हैं। पिछले कई महीनों से दोनों देशों के अधिकारी टैरिफ, बाजार तक पहुंच और रेगुलेटर बाधाओं जैसे मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं।

लेकिन ट्रंप प्रशासन के पुराने टैरिफ को सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किए जाने के बाद अमेरिका का ध्यान Section 301 की तरफ चला गया। भारत को डर है कि अगर व्यापार समझौते के तहत वह अमेरिकी वस्तुओं को छूट देता है और बाद में अमेरिका Section 301 के जरिए भारतीय उत्पादों पर नए टैरिफ लगा देता है, तो भारत को दोहरा नुकसान हो सकता है।

भारत की क्या है मांग?

भारतीय रिप्रेजेंटेटिव चाहते हैं कि एग्रीमेंट को फाइन करने से पहले अमेरिका टैरिफ को लेकर स्पष्ट आश्वासन दे। बातचीत से जुड़े एक भारतीय सूत्र ने रॉयटर्स से कहा, "भारत को टैरिफ दर, Section 301 जांच के प्रभाव और कॉम्प्टीटिव टैरिफ अरेंजमेंट्स पर चर्चा करनी होगी।" सूत्र ने यह भी कहा कि यदि शर्तें ट्रांसपेरेंट, बैलेंस और जस्टिफाइड होती हैं तो समझौता जल्द पूरा हो सकता है।

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आखिर क्या है Section 301?

Trade Act 1974 की Section 301 अमेरिकन ट्रेड सेक्रेटरी ऑफिस को यह अधिकार देती है कि वह किसी भी विदेशी देश की इंडस्ट्रियल पॉलिसी की जांच करे यदि उसे लगता है कि वे अमेरिकी व्यापारिक हितों को नुकसान पहुंचा रही हैं। यदि जांच में अमेरिकी प्रशासन को लगता है कि कोई देश अनुचित व्यापारिक रवैया अपना रहा है, तो अमेरिका अतिरिक्त टैरिफ लगा सकता है, इम्पोर्ट में कमी ला सकता है या पहले दी गई व्यापारिक रियायतें वापस ले सकता है।

किन कारणों से शुरू होती है Section 301 जांच?

Section 301 जांच कई कारणों से शुरू हो सकती है। इनमें इंटेलेक्चुअल कॉपी राइट, जबरन टेक्नोलॉडी ट्रांसफर, लेबल लॉ का उल्लंघन, विदेशी बाजारों में पहुंच की बाधाएं, भेदभावपूर्ण नियम और सरकारी सब्सिडी जैसे मुद्दे शामिल हैं। यही वजह है कि इसे अमेरिका के सबसे शक्तिशाली व्यापारिक हथियारों में से एक माना जाता है।

WTO से अलग क्यों है Section 301?

विश्व व्यापार संगठन (WTO) में किसी विवाद को सुलझाने के लिए लंबी प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। लेकिन Section 301 के तहत अमेरिका खुद जांच करता है, खुद फैसला लेता है और जरूरत पड़ने पर खुद ही कार्रवाई भी कर सकता है। यही कारण है कि कई देश इसे एकतरफा व्यापारिक दबाव का टूल मानते हैं।

ट्रंप के दौर में फिर चर्चा में आया कानून

1980 के दशक में यह कानून काफी इस्तेमाल किया जाता था। हालांकि WTO बनने के बाद इसका उपयोग कम हो गया था। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल में चीन पर लगाए गए भारी टैरिफ का कानूनी आधार भी यही Section 301 था। अब IEEPA टैरिफ को कानूनी झटका मिलने के बाद यह कानून फिर से अमेरिकी व्यापार नीति का अहम हिस्सा बन गया है। इसके बाद मार्च 2026 में USTR ने कई देशों के खिलाफ नई Section 301 जांच शुरू की।

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दूसरी जांच बंधुआ मजदूरी से जुड़ी

दूसरी जांच का संबंध उन उत्पादों से है जो कथित तौर पर बंधुआ मजदूरी (Forced Labour) से जुड़े हो सकते हैं। यह जांच करीब 60 देशों तक फैली हुई है और इसका उद्देश्य यह देखना है कि संबंधित देश ऐसे उत्पादों के खिलाफ कितनी प्रभावी कार्रवाई कर रहे हैं।

भारत क्यों आया जांच के दायरे में?

अमेरिका का कहना है कि भारत ने 2025 में अमेरिका के साथ लगभग 58 बिलियन डॉलर का व्यापार अधिशेष (Trade Surplus) दर्ज किया था। इसके अलावा अमेरिका ने कपड़े, ऑटोमोबाइल, स्टील, धातु, पेट्रोकेमिकल, रसायन, कंस्ट्रक्शन मटैरियल और कुछ स्वास्थ्य उत्पादों को भी जांच के दायरे में रखा है। अमेरिका का दावा है कि इन क्षेत्रों में उत्पादन क्षमता मांग से अधिक बढ़ाई गई है और इन्हें सरकारी सहायता भी मिली है। हालांकि भारत ने इन सभी आरोपों को खारिज किया है।

भारत के लिए यह समझौता क्यों जरूरी?

भारत खुद को चीन के विकल्प के रूप में एक बड़े मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करना चाहता है। भारत चाहता है कि अमेरिकी बाजार में उसे बांग्लादेश, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले बेहतर टैरिफ लाभ मिले। इससे विदेशी निवेश और निर्यात दोनों को बढ़ावा मिल सकता है।

जुलाई में आने वाला है बड़ा मोड़

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद लागू किया गया अस्थायी 10 प्रतिशत बेसलाइन टैरिफ जुलाई के अंत तक समाप्त होने वाला है। इससे अमेरिकी प्रशासन पर जल्द किसी दीर्घकालिक व्यापार ढांचे को अंतिम रूप देने का दबाव बढ़ गया है।

इसके अलावा एग्रीमेंट के फाइनल होने के बाद अमेरिकी ट्रेड सेक्रेटरी जैमीसन ग्रीर भी भारत आ सकते हैं। वहीं भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने हाल ही में भरोसा जताया है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता "अगले कुछ हफ्तों और महीनों में" पूरा हो सकता है।

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