Rahul Gandhi Yatra: भारत जोड़ो या मोदी विरोधी जोड़ो यात्रा?

Rahul Gandhi Yatra: भारत यात्रा जोड़ो यात्रा में शामिल हो रही हस्तियों को देखिए, इसमें योगेंद्र यादव और मेधा पाटकर को कुछ पल के लिए अलग कर सकते हैं। अन्यथा इस यात्रा में वही लोग जुड़ रहे हैं, जिनका अतीत कांग्रेस के आवरण में ही छांह ढूंढ़ने का रहा है। कांग्रेस की छांह हासिल करने की एक मात्र जरूरत गांधी-नेहरू परिवार की छत्रछाया को खुशी-खुशी स्वीकार करना होता है।
योगेंद्र यादव कांग्रेसी सर्किल से एक हद तक अलग इसलिए कहे जा सकते हैं, क्योंकि साल 2011 में सोशल मीडिया के जरिए उभरे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के ये प्रमुख स्तंभ रहे। यह बात और है कि आम आदमी के तौर पर दिल्ली की सत्ता पर काबिज होने के बाद वह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन कथित ही बनकर रह गया। हालांकि कथित सिविल सोसायटी के प्रतिनिधि के तौर कथित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में शामिल होने वाले योगेंद्र यादव स्वभाव से भले ही सोशलिस्ट हैं, लेकिन वे एक दौर में कांग्रेस के बहुत करीबी रहे हैं।
याद कीजिए साल 2004 को। शाइनिंग इंडिया की तमाम चकाचौंध के बावजूद वाजपेयी सरकार केंद्रीय सत्ता में वापस लौट नहीं पाई थी। इसके बाद मनमोहन सिंह की अगुआई में जो सरकार बनी, उसके मानव संसाधन विकास मंत्री थे अर्जुन सिंह। अर्जुन सिंह ने सत्ता संभालते ही मध्य प्रदेश कैडर के अपने चहेते अफसर सुदीप बनर्जी को मानव संसाधन विकास मंत्रालय में सचिव बनाया और पूर्ववर्ती भारतीय जनता पार्टी की सरकार द्वारा तैयार पाठ्यक्रम और किताबों को बदलने का जिम्मा दे दिया।
उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षाशास्त्री कृष्णकुमार को राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद का निदेशक बनाया। उसके बाद पाठ्यक्रम बदलने और नई किताबें बनाने के लिए जो समिति बनी, उसमें जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के हिंदी के प्रोफेसर पुरूषोत्तम अग्रवाल के साथ एक समाजशास्त्री को जिम्मा दिया। वह समाजशास्त्री थे योगेंद्र यादव। वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी की केंद्र में सरकार बने आठ साल हो गए और अब तक कांग्रेस राज की किताबें बदली नहीं जा सकीं हैं। लेकिन अर्जुन सिंह की उस टीम ने एक-डेढ़ साल में ही तकरीबन समूची किताबें बदल डाली थीं। इन अर्थों में देखिए तो योगेंद्र यादव भी कांग्रेसी सर्किल के आदमी रहे हैं।
भारत जोड़ो यात्रा में आने वाले लोग वही हैं, जिनकी ख्याति सिर्फ और सिर्फ नरेंद्र मोदी का विरोध रहा है। नरेंद्र मोदी के विरोध के लिए इन लोगों को तर्क की जरूरत नहीं होती, किसी भी मसले पर वे मोदी की मुखालफत कर सकते हैं। इसे समझने के लिए आप देखिए, राहुल गांधी की भारत यात्रा में उनसे कौन मिल रहा है?
अभिनेत्री स्वरा भास्कर, जिन्हें अपने अभिनय से ज्यादा मोदी का विरोध करना कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण लगता है। अभिनेत्री पूजा भट्ट भी भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी से मिलीं और स्वरा की तरह ट्वीट के जरिए इसे प्रचारित भी किया। पूजा के पिता महेश भट्ट की कहानियां और कांग्रेस से नजदीकी छिपी नहीं है। महेश भट्ट कश्मीरी मूल के फिल्म निर्माता और कश्मीरी पंडित नानूभाई भट्ट और मुस्लिम मां की संतान हैं जो अपने आप को बाप से अधिक मां के करीब पाते हैं। इसलिए कभी आतंकवाद के खिलाफ उनकी मुखर जुबान खुलते नहीं सुनी गई। बल्कि मुंबई में हुए आतंकी हमले में अपने बेटे की भूमिका की जानकारी होते हुए भी महेश भट्ट उसे आरएसएस की साजिश बताने का प्रोपेगंडा फैलाते रहे।
स्टार प्लस पर कुछ वर्षों पहले तक एक धारावाहिक आता था...बनूं मैं तेरी दुल्हन..उसमें सिंदूरा नामक खलनायिका का किरदार निभाने वाली काम्या पंजाबी भी मोदी विरोधियों में ही शुमार हैं। उन्होंने भी राहुल गांधी से मुलाकात की। इसके अलावा मोदी विरोधी पत्रकार सबा नकवी ने भी राहुल गांधी से यात्रा के दौरान मुलाकात की है।
दक्षिण की फिल्मों के दो मशहूर कलाकार भी कट्टर मोदी विरोधी के रूप में जाने जाते हैं। ये हैं कमल हासल और प्रकाश राज। इन दोनों ने भी राहुल से भेंट की और अपने तरीके से भारत जोड़ने की कोशिश की। स्टैंडअप कॉमेडियन राजीव धवन भी भारत जोड़ने के लिए राहुल गांधी के कंधे को सहारा देने आए।
रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी दिसंबर महीने में राहुल गांधी से भारत जोड़ो यात्रा के दौरान मुलाकात की। इस मुलाकात में राहुल गांधी ने रघुराम राजन का इंटरव्यू किया या फिर राजन ने राहुल गांधी का इंटरव्यू किया, यह तो समझ नहीं आया, लेकिन दोनों की बातचीत को कांग्रेस ने अपने सोशल मीडिया हैंडलों से इस अंदाज में जारी किया, जैसे बस भारत में सब कुछ खत्म होने वाला है और रघुराम राजन को इसकी आशंका है। रघुराम राजन वही अर्थशास्त्री हैं, जो अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं। इन्हें मनमोहन सिंह सरकार ने साल 2013 में रिजर्व बैंक का गवर्नर बनाया था।
शुरूआत में ही भारत जोड़ो यात्रा में जो दो लोग शामिल हुए थे, उससे विवाद हो गया था। तमिलनाडु में जार्ज पोन्नैया नाम के एक पादरी ने राहुल गांधी से मुलाकात की थी। बीते साल नौ अक्टूबर को मिले पोन्नैया अपने विवादित बयानों और गैर ईसाई धर्मों पर बयानबाजी के लिए जाने जाते हैं। जब यात्रा केरल पहुंची तो राहुल गांधी से उस राजी मुकुती ने मुलाकात की थी, जिन्होंने मोदी सरकार के विरोध में सरेआम केरल की एक सड़क पर गाय के बछड़े का कत्ल किया था और बीफ खाने वालों के समर्थन में उसे बनाकर खाया और अपने समर्थकों को खिलाया था।
शायद ये लोग भी भारत जोड़ने में इसी तरह से योगदान देने की कोशिश में हैं। भारत जोड़ने में एक और नौकरशाह आगे आए हैं। रॉ के प्रमुख रहे ए एस दुलत। दुल्लत साहब के आईजी रहते ही कश्मीर घाटी में आतंकवाद पसरा था। दुलत ने पाकिस्तान की आईएसआई के लेफ्टिनेंट जनरल असद दुर्रानी के साथ मिलकर किताब भी लिखी है। दुलत की ख्याति गांधी-नेहरू परिवार से नजदीकी की रही है। माना तो यही जा रहा है कि राहुल से दुलत की मुलाकात का मकसद अपने संबंधों को ही विस्तार देना है।
राहुल गांधी भले ही बात भारत जोड़ो की करते हैं लेकिन सच्चाई यह है कि वो पूरी यात्रा में हिंदुत्व विचारधारा से नफरत करने वाले लोगों के घेरे से बाहर नहीं निकल पाये हैं। राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा की सफलता तब मानी जाती, जब समाज के विभिन्न वर्गों के लोग, विभिन्न विचारधाराओं के लोग बिना किसी आग्रह-पूर्वाग्रह के आगे आते और कहते कि राहुल का कदम भावी भारत को बेहतर बनाने का बेहतरीन कदम है।
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राहुल से मिलने वाले लोगों को देखकर कहा जा सकता है कि भारत जोड़ो यात्रा सिर्फ और सिर्फ उन मोदी विरोधी लोगों को जोड़ना भर है, जो कांग्रेसी सर्किल के पहचाने चेहरे हैं। जिनसे गांधी-नेहरू परिवार के समर्थन के अलावा कोई और उम्मीद नहीं की जा सकती।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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