Road Safety: सड़क दुर्घटनाएं रोकने में नाकाम क्यों हैं हम
Road Safety: दिल्ली से एक और दर्दनाक सड़क हादसा सामने आया है जिसमें एक नौजवान पीयूष पाल की जान चली गयी। 30 साल का पीयूष अपनी मोटरसाइकिल से साउथ दिल्ली से गुजर रहा था जहां रात के 10 बजे उसको एक दूसरी मोटरसाइकिल ने टक्कर मार दी। वह लगभग आधे घण्टे तक वहीं सड़क पर पड़ा रहा और अत्यधिक खून बहने के कारण उसकी जान चली गयी।
वैसे तो दिल्ली में सड़क हादसे मीडिया की कोई खबर भी नहीं बनते लेकिन इस नौजवान के हादसे की खबर संभवत: इसलिए बनी क्योंकि वहां से गुजरनेवाले लोग उसकी मदद करने के बजाय मोबाइल से वीडियो बनाने में व्यस्त रहे। जब तक पुलिस पहुंचती और उसे अस्पताल पहुंचाती, उस नौजवान के प्राण पखेरू उड़ गये।

दिल्ली में होनेवाले रोड एक्सीडेन्ट में सबसे बड़ी संख्या मोटरसाइकिल सवारों की ही होती है। इसलिए ऐसी स्थिति में कारवाला रूके न रुके, मोटरसाइकिल सवार तो मदद करने के लिए आगे आते ही हैं। पुलिस को जब तक फोन पहुंचता है या उनकी सर्विलेन्स से उन्हें पता चलता है तब तक कई बार काफी देर हो जाती है। इसका नतीजा यह होता है कि समय रहते जिनको अस्पताल पहुंचाकर बचाया जा सकता है, वो भी कई बार नहीं बच पाते हैं।
दिल्ली में आमतौर पर सड़क दुर्घटना का शिकार मोटरसाइकिल सवार कई बार इसलिए भी मर जाता है कि क्योंकि समय रहते उसको मदद नहीं मिल पाती। सड़क से गुजरते लोग बहुत हुआ तो 100 नंबर पर पुलिस को फोन कर देते हैं लेकिन पुलिस भी आनन फानन में वहां नहीं पहुंच पाती है। पुलिस के घटनास्थल पर पहुंचने और घायल को अस्पताल पहुंचने का कोई नियत समयसीमा भी नहीं है जिसे प्रशासनिक मशीनरी द्वारा फॉलो किया जाता हो। ऐसे में कई बार सड़क दुर्घटना में जिन घायलों को बचाया जा सकता है वो भी सड़क किनारे पड़े पड़े दम तोड़ देते हैं।
लेकिन यह तो देश की राजधानी दिल्ली का हाल है जहां चप्पे चप्पे पर पीसीआर वैन तैनात है। सीसीटीवी कैमरे लगे हैं। पुलिस चौकियां बनी है। तब भी वहां यह स्थिति पैदा हो जाती है। दिल्ली पुलिस की पीसीआर वैन डिविजन का दावा है कि वह औसत 80 घायलों को प्रतिदिन अस्पताल पहुंचाती है। लेकिन देश के दूर दराज के इलाकों में जहां कई कई किलोमीटर तक वीरान सड़कें हैं, या फिर ग्रामीण इलाकों में जो एक्सीडेन्ट होते हैं उन्हें कितना रिपोर्ट किया जाता है और उनके साथ क्या होता है यह तो भगवान ही जानता होगा।
जैसे जैसे सड़कों का विस्तार हो रहा है, मोटर गाड़ियों की बिक्री बढ़ रही है वैसे वैसे सड़क दुर्घटनाएं और उसमें मरनेवाले लोगों की संख्या भी बढ़ रही है। ताजा आंकड़ा यह है कि वर्ष 2022 में 4 लाख 61 हजार 312 दुर्घटनाएं सरकारी रिकार्ड में दर्ज की गयीं जिसमें 1,68,491 लोग मारे गये और 4 लाख 43 हजार 366 लोग घायल हुए। स्वाभाविक है ये आंकड़े वो हैं जिसमें जनहानि हुई और उसकी शिकायत पुलिस में भी दर्ज की गयी। पुलिस रिकार्ड से परे जाने पर सड़क दुर्घटनाओं की संख्या शायद इससे अधिक हो जिसमें मरनेवाले और घायल होनेवाले लोगों की संख्या भी।
लंबी चौड़ी और सरपट भागनेवाली सड़कें अगर विकास ला रही हैं तो विकास के इस सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि सड़कें कुछ जिन्दगियों में विनाश भी ला रही हैं। वित्त वर्ष 2013-14 में भारत में नेशनल हाइवे की लंबाई 91 हजार किलोमीटर थी। आज नेशनल हाइवे की लंबाई बढकर 1 लाख 45 हजार किलोमीटर हो गयी है। यानी अकेले मोदी सरकार में नेशनल हाइवे की लंबाई में 59 प्रतिशत की बढ़त हुई है।
सरकारी सूचना विभाग के जनवरी में जारी आकड़ों के अनुसार देश में कुल 63 लाख 73 हजार किलोमीटर लंबी सड़के हैं। इसमें 1 लाख 45 हजार किलोमीटर के नेशनल हाईवे तथा 1 लाख 86 हजार किलोमीटर के स्टेट हाईवे मुख्य मार्ग हैं। इसके अलावा राज्यों के संपर्क मार्ग, ग्रामीण मार्ग तथा एक्सप्रेसवे हैं। महानगरों को छोड़ दें तो इनमें सर्वाधिक दुर्घटनाएं नेशनल हाईवे, स्टेट हाईवे पर ही होती हैं जिसका एक बड़ा कारण डिजाइन में दोष रहा है।
हालांकि जब से नितिन गड़करी को सड़क परिवहन मंत्रालय मिला है इस दिशा में काफी सुधार हुआ है लेकिन अब यह सुधार ही सड़क दुर्घटनाओं का कारण बनता जा रहा है। सड़कें सुधरीं तो चलनेवाली गाड़ियों की गति भी बढ़ी। गाड़ियों की गति बढ़ी तो दुर्घटनाओं की संख्या भी बढ़ी। सड़क परिवहन मंत्री नितिन गड़करी का इन दुर्घटनाओं पर कहना है कि "सड़कों को सुरक्षित बनाने की जिम्मेवारी केवल सरकार और संबंधित अधिकारियों की नहीं है। यह जिम्मेवारी राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति की है।"
गड़करी गलत नहीं कह रहे हैं। भारत में गाड़ियों की बिक्री भी बढ़ी और सड़कों भी स्थिति बेहतर हुई हैं लेकिन सच्चाई यह है कि देश की राजधानी में भी ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करना शान समझा जाता है। सिग्नल का उल्लंघन हो या फिर सड़कों पर बनी लेन के नियमों का उल्लंघन, आमतौर पर भारतीय ड्राइवर या तो उसके बारे में जानते नहीं हैं या अगर जानते भी हैं उसका उल्लंघन करना अपनी शान समझते हैं। संभवत: इसीलिए नितिन गड़करी ने यह कहा है कि सड़क दुर्घटनाओं को कम करना यह सड़क पर सफर करनेवाले हर नागरिक की जिम्मेवारी है।
अगर इस दिशा में लोगों का नागरिक बोध बढ़ता है तो बहुत सारी जिंदगियां और उन पर आश्रित परिवार असमय उजड़ने से बच जाएंगे। अभी तो हालात ऐसे हैं कि कौन कब कहां रोड एक्सीडेन्ट का शिकार हो जाएगा, कहा नहीं जा सकता। जरूरी नहीं कि हर उस व्यक्ति की गलती हो जो ऐसी दुर्घटनाओं का शिकार होता है। कई बार किसी अन्य की गलतियों की सजा कोई और पा जाता है। ऐसे में सड़क दुर्घटनाओं को कम करने की जिम्मेवारी जितनी नागरिकों की है उतनी ही सरकारों की भी है।
भले ही जगह जगह सड़क के किनारे यह लिखा रहता हो कि दुर्घटना से देर भली लेकिन यह संदेश नागरिकों पर तो लागू हो सकता है, सरकार पर नहीं। दुर्घटनाओं को रोकने या दुर्घटना की स्थिति में मदद पहुंचानेवाली व्यवस्था में देर बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। भले ही परिवहन मंत्री नितिन गड़करी यह कहते हों कि दुर्घटनाओं को रोकना अकेले सरकार के हाथ में नहीं है, लेकिन दुर्घटना के बाद मदद पहुंचानेवाली व्यवस्था को चुस्त दुरुस्त करना तो सरकार के हाथ में है। अगर सड़कें यूरोपीय और अमेरिकी मानक पर बन सकती है तो दुर्घटना की स्थिति में अमेरिकी और यूरोपीय मानकों पर मदद क्यों नहीं पहुंचाई जा सकती?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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