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Road Accidents: क्यों कम नहीं हो रही सड़क दुर्घटनाएं?

Road Accidents: बढ़ती सड़क दुर्घटनाएं पूरी दुनिया के‍ लिए गंभीर चिंता का विषय है। ये व्‍यक्ति, परिवार, सार्वजनिक सुरक्षा, समाज और अर्थव्‍यवस्‍था, सभी के लिए घातक हैं। उन्‍नत प्रौद्योगिकी, इन्फ्रास्‍ट्रक्‍चर में सुधार और जागरूकता अभियानों के चलते सड़क दुर्घटनाओं की संख्या में कमी जरूर आई है, लेकिन सिर्फ अमीर देशों में। वर्ना तो यह आलम है कि दुनिया में हो रहे हर दस सड़क हादसों में से नौ, कम व मध्‍य आय वाले देशों में ही होते हैं।

पिछले सप्‍ताह विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने सड़क सुरक्षा की वैश्विक स्थिति पर अपनी रिपोर्ट जारी की। दुनिया के लिहाज से देखा जाए तो आश्वस्ति का अहसास हो सकता है, लेकिन अगर भारत की बात करें तो आंकड़े चिंतित करने वाले हैं। जहॉं विश्‍व भर में सड़क दुर्घटनाएं कम हुई हैं, हमारे यहॉं दुर्घटनाओं, उनमें होने वाली मौतों और हताहतों की संख्‍या लगातार बढ़ रही है।

road accidents data in india Why are road accidents not decreasing?

उल्‍लेखनीय है कि डब्‍ल्‍यूएचओ ने 2021-2030 की अवधि को सड़क सुरक्षा कार्रवाई दशक घोषित किया है। वर्ष 2030 तक दुनिया भर में सड़क हादसों की संख्‍या आधी करने के लक्ष्य को लेकर, डब्‍ल्‍यूएचओ द्वारा सौ से अधिक देशों में 2010 से 2021 तक सड़क परिवहन की स्थिति का अध्‍ययन किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक अध्‍ययन अवधि के दौरान वैश्विक स्‍तर पर सड़क हादसों की संख्‍या में 5% की गिरावट आई है, लेकिन भारत में दुर्घटनाओं की संख्‍या में 15% की वृद्धि दर्ज की गई है।

यह एक दशक भारत में वाहनों और हादसों की बढ़ती संख्‍या की एक चौंकाने वाली कहानी बयां करता है। 21 करोड़ दोपहिया और 7 करोड़ कारों सहित देश में करीब 36 करोड़ वाहन हो चुके हैं। हमारी आबादी के हिसाब से देखें तो इसका अर्थ यह निकाला जा सकता है कि औसतन हर चार लोगों के पीछे एक वाहन है। यह संख्‍या कोई कम नहीं है, फिर भी हमारी वाहन आकांक्षाएं लगातार बढ़ रही हैं और गाडि़यों की संख्‍या भी। अध्‍ययन अवधि के दौरान वैश्विक स्‍तर पर वाहनों की संख्‍या में 160% की वृद्धि हुई है और भारत में 250% की। बेशक अभी भी, हमारे यहॉं विश्‍व के सिर्फ एक प्रतिशत वाहन ही हैं। लेकिन, सड़क हादसों की वैश्विक संख्‍या में हमारी हिस्‍सेदारी 11% है।

पिछले महीने जारी केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की ओर से जारी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2022 के दौरान कुल 4,61,312 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गईं, इनमें 1,68,491 लोगों की मौत हो गई और 4,43,366 लोग घायल हुए। यह वर्ष 2021 की तुलना में 11.9 फीसदी अधिक है। इससे पता चलता है कि सड़क हादसों में बीते साल जितनी जानें पूरे यूरोप में गईं, उससे ढाई गुना से ज्‍यादा अकेले भारत में गई हैं।

सख्‍त यातायात नियम, भारी भरकम जुर्माने और लंबी जेल के प्रावधानों से लेकर जागरुकता अभियानों तक, हमारे यहां सारे उपाय आजमाए जा चुके हैं, लेकिन हादसे हैं कि कम होने का नाम ही नहीं ले रहे। इन दुर्घटनाओं को लेकर बहुत सारे अध्‍ययन होते हैं, बहुत सारे निष्‍कर्ष और समाधान प्रस्‍तुत किए जाते हैं। इन्‍हीं में अनेक अवधारणाएं ऐसी भी हैं, जो प्रचलन में तो हैं, लेकिन सही नहीं जान पड़ती हैं। जैसे कि हादसों के लिए अक्‍सर वाहनों की बढ़ती संख्‍या को जिम्‍मेदार ठहराया जाता है। लेकिन, जैसा कि हम विश्‍व और भारत में गाडि़यों की संख्‍या व दुर्घटनाओं के अनुपात को देखकर समझ सकते हैं, यह कारण बहुत ज्‍यादा ठोस नहीं प्रतीत होता। विश्‍व क्‍या, खुद भारतीय राज्‍यों की स्थिति को ही देख लीजिए। वाहनों की संख्‍या के हिसाब से सर्वाधिक वाहन वाले राज्‍यों में शीर्ष पर हैं उत्‍तर प्रदेश, महाराष्‍ट्र, तमिलनाडु व कर्नाटक, लेकिन अगर हम सड़क दुर्घटनाओं की बात करें तो तमिलनाडु पहले स्‍थान पर खड़ा है और उत्‍तर प्रदेश चौथे पर।

इसी तरह की एक और गलत धारणा यह है कि सड़कों का संकरा होना हादसे बढ़ाता है। तंग सड़कें ट्र‍ैफिक जाम या प्रदूषण की वजह बन सकती हैं। गाड़ियों द्वारा एक-दूसरे को ठोक देने की घटनाएं हो सकती हैं, गाड़ी सवारों के बीच मारपीट, गालीगलौज आदि के प्रसंग ज्‍यादा हो सकते हैं, लेकिन, जानलेवा या गंभीर दुर्घटनाओं की आशंका संकरी सड़कों पर अपेक्षाकृत कम ही होती है, क्‍योंकि इन पर गाड़ियां एक सीमा से अधिक तेज नहीं चल पातीं। टूटी-फूटी सड़कों को भी बढ़ते हादसों के लिए जिम्‍मेदार ठहराया जाता है। यह बात कुछ हद तक सही है, लेकिन पूरी तरह नहीं।

इसे इस तथ्‍य से समझ सकते हैं कि अमेरिका के बाद भारत ही है, जहॉं सबसे लंबा रोड नेटवर्क है। 63 लाख किलोमीटर से ज्‍यादा विस्‍तार वाले इस नेटवर्क में नेशनल हाईवेज की हिस्‍सेदारी है महज 2.7 फीसदी, करीब 1.41 लाख किलोमीटर। पिछले वर्ष यानि 2022 में कुल 4.6 लाख सड़क हादसे हुए, जिनमें 1,68,491 लोगों ने जान गंवाई। राष्‍ट्रीय राजमार्ग, इनमें करीब 36.2% मौतों के लिए जिम्‍मेदार बने और 24.3% के लिए स्‍टेट हाइवे। यानि हादसों में होने वाली साठ फीसदी से ज्‍यादा मौते लगभग पॉंच फीसदी सड़कों पर हुईं। जबकि नेशनल या स्‍टेट हाइवे अमूमन बेहद चौड़े होते हैं और अपेक्षाकृत काफी अच्‍छी स्थिति में भी।

फिर क्‍या वजह है कि विश्‍व का दूसरा सबसे बड़ा यह सड़क नेटवर्क दुनिया के एक प्रतिशत वाहनों को भी सु‍रक्षित ढंग से नहीं संभाल पा रहा है। अगर हम गंभीरता से विचार करें तो अधिकतर जानलेवा हादसों के लिए कहीं न कहीं हमारी अपनी लापरवाही या हठधर्मिता ही मौजूद पाएंगे। राष्‍ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्‍यूरो के गत वर्ष के आंकड़ों पर नजर ड‍ालें तो पता चलता है कि 72% दुर्घटनाओं की वजह ओवर स्‍पीड थी। इसके बाद रॉन्‍ग साइड ड्राइविंग, ड्रंक एंड ड्राइव और ड्राइव करते समय मोबाइल पर बात करना था।

बाइक या स्‍कूटर चलाते हुए हेलमेट न पहनना, कार में सीट बेल्‍ट का इस्‍तेमाल न करना...अगर हम अपनी आदतें सुधार लें तो सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों की संख्या, हर घंटे करीब 20 तक कम की जा सकती है। पिछले साल लगभग 70 हजार लोग सिर्फ इसलिए मारे गए कि उन्‍होंने बुनियादी सड़क सुरक्षा मानदंडों का पालन नहीं किया या जान-बूझ कर उल्लंघन किया। इनमें 17 हजार की जान सीटबेल्ट न पहनने की वजह से गई थी और करीब 50 हजार की हेलमेट न पहनने के कारण। अगर सिर्फ इन दो चीजों में ही हमने ट्रैफिक सेंस से काम लिया होता तो इन मौतों की संख्‍या एक लाख के आसपास सिमट गई होती।

लेकिन, यह भी सच है कि बढ़ते हादसों के लिए सिर्फ ट्रैफिक सेंस की कमी को ही जिम्‍मेदार नहीं ठहराया जा सकता। समस्‍या का एक और पक्ष यह भी है कि कहीं न कहीं सड़कों की खराब गुणवत्‍ता और दोषपूर्ण डिजाइन, उचित साइनेज व प्रकाश व्‍यवस्‍था की कमी, यातायात विभाग में हर स्‍तर पर व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार भी कुछ ऐसे महत्‍वपूर्ण कारक हैं, जिन पर गंभीरता से ध्‍यान दिए जाने की जरूरत है। नॉर्वे और जापान जैसे करीब दस देशों ने समुचित ध्यान दिया, जिसका नतीजा सड़क हादसों की संख्‍या में पचास फीसदी की कमी के रूप में सामने आया।

नीदरलैंड और स्वीडन जैसे देशों ने सड़क सुरक्षा बुनियादी ढांचे पर ध्यान देते हुए बेहतर सड़क डिजाइन में निवेश किया और विभिन्न प्रकार के वाहनों के लिए अलग-अलग लेन, बेहतर पैदल यात्री क्रॉसिंग और प्रभावी साइनेज आदि की व्‍यवस्‍था की, जिसने बेहद सकारात्मक परिणाम दिए हैं। जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में वाहनों के लिए सख्त सुरक्षा मानकों को स्थापित करने और लागू करने से दुर्घटना से होने वाली मौतों में काफी कमी आई है। नॉर्वे और ऑस्ट्रेलिया में यातायात नियमों के उल्लंघन के लिए गंभीर दंड के साथ सख्त यातायात कानून हैं, जिनका पालन भी किया और करवाया जाता है। इससे जोखिम भरे व्यवहार में गिरावट आई है।

भारत इनके अनुभवों से प्रे‍रणा ले सकता है और सड़क दुर्घटनाओं को कम करने और जीवन बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति कर सकता है। यह आर्थिक दृष्टि से भी लाभप्रद है। विश्‍व बैंक के अनुसार, अगर भारत में सड़क हादसों पर लगाम लगाई जा सके तो इससे देश की जीडीपी दो से पाँच प्रतिशत बढ़ सकती है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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