बढ़ती महंगाई से बेहाल होता शहरी मध्य वर्ग
आजकल महंगाई से हर कोई परेशान है। रिजर्व बैंक इसे नियंत्रित करने के लिये ब्याज दर बढ़ाता है, इसके परिणाम में मध्यवर्ग की ईएमआई किश्त बढ़ जाती है। पैसा एक तरफ से कम होता है तो दूसरी तरफ बढ़ जाता है। ऐसे में हर शहरी मध्यवर्ग परिवार चाह रहा है कि महंगाई और किश्त के मोर्चे पर कुछ राहत मिले।

भारत में महंगाई नापने के दो तरीके हैं: पहला, रिटेल या खुदरा महंगाई दर और दूसरा, थोक महंगाई दर। खुदरा महंगाई, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि यह वह दर होती है जो अंतिम ग्राहकों और दुकानदार के बीच मूल्य की बात करती है। इसे कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स भी कहते हैं। जबकि थोक महंगाई का मतलब उस महंगाई से होता है जिसमें एक कारोबारी दूसरे कारोबारी या खुदरा व्यापारी थोक व्यापारी को वस्तुओं या सेवाओं का मूल्य भुगतान करता है, ये साधारणतया संगठित तौर पर होता है। सरल भाषा में कहें तो थोक मूल्य फैक्ट्री से निकल रहे उत्पाद का मूल्य है और खुदरा मूल्य उसी उत्पाद को ग्राहक किस कीमत पर खरीद रहा है, वह है।
दोनों तरह की महंगाई दर को मापने के लिए अलग-अलग उत्पाद समूह को शामिल किया जाता है, इसलिए दोनों की दर के मायने भी अलग अलग होते हैं। हमने देखा कि मई महीने में महंगाई पर एक बड़ी विचित्र रिपोर्ट दिखाई दी, थोक महंगाई तो काफी बढ़ी थी लेकिन खुदरा महंगाई दर घट गई, जबकि साधारणतया थोक महंगाई दर से ज्यादा तेज दर से खुदरा महंगाई बढ़ती है क्यूंकि इसकी प्राइसिंग एमआरपी वाले सामान को छोड़कर संगठित नहीं है क्योंकि खुदरा दुकानदार अपने हिसाब से कीमत लगाता है।
मई माह में थोक महंगाई लगातार 14वें महीने डबल डिजिट में 15.88 फीसदी पर पहुंच गई जबकि पिछले माहों में यह क्रमशः 15.08 और 14.55 फीसदी थी। थोक बाजार में सब्जियों समेत अन्य चीजों के दाम बढ़ने से थोक महंगाई बढ़ी है। हालांकि इसके उलट मई महीने की खुदरा महंगाई दर अप्रैल महीने से कम हुई है, जैसे कि अप्रैल में 7.79 फीसदी, मई में 7.04 फीसदी, जून में 7.01 फीसदी एवं जुलाई में 6.71 फीसदी।
ये आंकड़े राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी किये गए थे जिनसे पता चलता है कि अप्रैल में महंगाई 95 महीने के उच्च स्तर 7.79 प्रतिशत तक बढ़ने के बाद, जुलाई में खुदरा मुद्रास्फीति की दर कम होकर 6.71 प्रतिशत हो गई हालांकि खुदरा मुद्रास्फीति दर लगातार आरबीआई के मध्यम अवधि मुद्रास्फीति लक्ष्य के सहिष्णुता स्तर 6 प्रतिशत से ऊपर बनी हुई है। रिज़र्व बैंक अपनी तरफ से मौद्रिक समीक्षा के प्रयास कर रहा है लेकिन यह सिर्फ अकेले वित्त मंत्रालय या रिज़र्व बैंक का काम नहीं है। युद्ध स्तर पर कई मंत्रालयों को काम करना होगा जिसमें सबसे महत्वपूर्ण है वाणिज्य मंत्रालय।
अब आंकड़ों से इतर वास्तविकता की बात करते हैं। थोक दर और खुदरा दर की इस लुकाछिपी से शहरी वर्ग परेशान है और खुदरा दर के आंकड़ों में गिरावट के बाद भी महंगाई की मार उसे पड़ रही है। खाने के तेल से लेकर दालों तक के दाम उसके लिये अभी भी भारी पड़ रहें हैं। बीते एक साल के दौरान अरहर और चना दाल के भाव में रिकॉर्ड इजाफा हुआ है।
देश का शहरी वर्ग इसलिये भी बड़ा परेशान है क्योंकि उसे हर चीज खरीद कर खाना है, गांव की तरह उसके पास यह सुविधा नहीं है कि वह प्राथमिक उत्पादक से खरीद कर कुछ समय के लिये काम चला ले। गेंहू खरीद कर आटा पिसवाये, तेल के लिए सरसो पेरा कर तेल निकलवाये, खुद के कोले या छत पर फैले कोहड़े, लौकी की सब्जी और साग से काम चला ले। घर या तो किराये पर है और यदि अपना है तो ईएमआई है, पेट्रोल, डीजल, गाड़ी की किश्त समेत चावल, आटा, तेल, सब्जी सब कुछ खरीद कर खाना है। ऐसे में जब चारों तरफ कीमतों में आग लग गई हो तो शहरी वर्ग का हैरान और परेशान होना स्वाभाविक है।
शहरी वर्ग सब्जी को लेकर भी बड़ा परेशान रहता है, जो सब्जी थोक मंडी में 20 रूपये किलो बिकती है वही सब्जी मंडी से उसके दरवाजे तक आते आते 60 से 70 रूपये हो जा रही है। थोक बाजार और फुटकर बाजार का जो इतना बड़ा गैप है वह भी उसे परेशान कर रहा है। रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी की वजह से लोगों की खरीद क्षमता कम होने लगी है।
शहरी आम आदमी को आकंड़ों से कोई मतलब नहीं रह गया है कि खुदरा सूचकांक घट गया या थोक सूचकांक बढ़ गया। उसे तो बस यही दिखाई दे रहा है कि बढ़ती महंगाई के कारण उसकी वास्तविक आय प्रतिदिन कम हो रही है और उसके प्रतिमाह के खर्च बढ़ रहे हैं।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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