Republic Day Parade: राजपथ से कर्तव्य पथ की यात्रा का सफर
अलग अलग राज्यों और विभागों की झांकियों में मंदिरों, नृत्य परम्पराओं, उपासना पद्धतियों, आस्थाओं, आत्मविश्वास से लबरेज उपलब्धियों, नारी सशक्तीकरण के प्रयासों का चित्रण एक नए भारत के उदय का संकेत है।

Republic Day Parade: राज शब्द से सिर्फ राजकाज का बोध होता है। राजकाज अर्थात राजा, दण्ड, नियम, विधान और हुक्मरानों के अधिकार। जब राजकाज के इस भाव को भारत की लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर लागू करते हैं तो यह बहुत एकतरफा लगता है। लोकतंत्र यानि जनता की, जनता द्वारा, जनता के लिए रची गयी व्यवस्था। राज में सिर्फ शासन की धमक सुनाई पड़ती है, इसके उल्टा कर्तव्य में राजा और प्रजा दोनों की ही समग्र कार्यप्रणाली की ध्वनि आती है। किसी भी राष्ट्र की लोकतांत्रिक व्यवस्था वहाँ रहने वालों की आकांक्षाओं, उसकी विरासत, उसका इतिहास, उसकी संस्कृति और उसकी परम्पराओं के बिना अधूरी ही होती है। वह सिर्फ राज तक कैसे सीमित होकर रह सकती है ?
1950 से ही दिल्ली में 26 जनवरी को गणत्रंत्र दिवस परेड का आयोजन होता रहा है। 1950 से 1954 तक यह परेड अलग अलग स्थानों पर आयोजित की गई। लेकिन 1955 से यह परेड रायसीना की पहाड़ी पर स्थित राष्ट्रपति भवन, जो पहले वायसराय का घर होता था, से शुरू होकर लालकिले पर संपन्न होती रही है। अंग्रेज़ों के बनाये भवन से मुगलों के बनाए किले तक की ये परेड एक तरह से हमारे उस इतिहास की और संकेत करती रही है जब ये देश विदेशियों के अधीन था। कोई भी अधीनता सिर्फ सैन्य, राजनीतिक और प्रशासनिक ही नहीं होती। उसमें विचार, संस्कृति, मान्यताओं, परम्पराओं, से जुड़े भावों की कई परतें होती है।
किसी भी राष्ट्र के लिए राजनैतिक आज़ादी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है लेकिन यही किसी राष्ट्र का एकमात्र और अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकता। पैरों में पड़ी राजनैतिक गुलामी की जंजीरें तोड़ने के बाद ही समग्र स्वतंत्रता का समर शुरू होता है। यह संग्राम होता है अधीनता की उन उलझी परतों को एक एक करके बंधनमुक्त करना जो लम्बी दासता के बाद किसी भी समाज की भावभूमि में घर बना बैठी हों। इस मायने में राजनैतिक और प्रशासनिक स्वतंत्रता तो आने वाली एक लम्बी यात्रा की एक महत्वपूर्ण सीढ़ी ही कही जा सकती है। भारत की यह यात्रा 1947 में शुरू हुई। आज़ादी के अमृतकाल में इसके अमृत की बूंदों का असर राष्ट्रजीवन के हर पहलू पर दिखाई दे रहा है।
इसमें संदेह नहीं कि 2014 के बाद से इसने एक नयी छलांग लगाईं है। राजपथ से कर्तव्यपथ की इस अनूठी लोकतान्त्रिक यात्रा में देश ने 75 वर्ष ले लिए हैं। इस साल गणत्रंत्र दिवस की परेड में अलग अलग राज्यों से आई झांकियों में इस यात्रा की पूरी तस्वीर सामने आई। परेड में आत्मनिर्भरता की ओर तेज़ी से कदम रखते हमारे सैन्य बलों के विश्वास और होसलों का प्रदर्शन तो था ही। अलग अलग राज्यों और विभागों की झांकियों में मंदिरों, नृत्य परम्पराओं, उपासना पद्धतियों, आस्थाओं, आत्मविश्वास से लबरेज उपलब्धियों, नारी सशक्तीकरण के प्रयासों का चित्रण एक नए भारत के उदय का संकेत है। अयोध्या की देव दीपावली से लेकर कश्मीर के अमरनाथ तक भारत के जनमानस की आस्था के केंद्रों का ऐसा विशद चित्रण अब से पहले 26 जनवरी की परेड में कभी नहीं हुआ।
आप बहस कर सकते हैं कि आत्मबोध की इस यात्रा में लिया गया यह समय कम है या ज़्यादा। आप चाहे तो इसका विश्लेषण पार्टीगत राजनीति और विचारधारात्मक आधार पर भी कर सकते हैं। मगर इसे सिर्फ इन संकीर्ण नज़रिये से देखना एक गंभीर भूल होगी। ऐसा करते हुए याद रखने की बात है कि झारखण्ड, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु राज्यों में बीजेपी की सरकारें नहीं हैं। झारखण्ड की झांकी में बाबा बैजनाथ, पश्चिम बंगाल की झांकी में दुर्गा पूजा और तमिलनाडु की झांकी में अव्वैयाऱ की प्रतिमा के साथ तंजौर का बृहदेश्वर मंदिर दर्शाया जाना यों ही नहीं है। भारत निश्चय ही बदल रहा है।
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ये बात सही है कि इस बार छब्बीस जनवरी की परेड में धुंध के कारण वायुसेना का फ्लाईपास्ट उस तरीके से नहीं हो सका जैसा हर साल होता आया है। पर यकीन मानिये तमाम आशंकाओं, घात प्रतिघातों, कुचेष्टाओं और षड्यंत्रों के बादलों के पीछे से एक आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर, साहसी और समृद्ध भारत का सूर्य अपनी दिव्य आभा के साथ विश्व के फलक पर चमकना शुरू हो गया है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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