INDIA: आपसी मतभेद कम कर लेना ही 'इंडिया' की सफलता होगी
18वीं लोकसभा की 543 सीटों पर चुनाव अभी महीनों दूर हैं। कायदे से सरकार और विपक्ष को अभी चुनाव आचार संहिता लागू होने तक संसदीय दायरे में ही अपने दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए।
पर लोकतंत्र में बारहों मास चुनाव का भूत सवार रहता है। इसी भूत ने कल सत्तारूढ़ दलों और विपक्षी दलों को फिर से पुनर्गठित होने और नए सिरे से मोर्चेबन्दी के लिए बाध्य किया।

सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन अपने पुराने नाम के साथ ही 38 दलों का एक मोर्चा घोषित हो चुका है तो विपक्षी 26 दलों ने 'इंडिया' के नए और अधिक आकर्षक नाम के साथ खम ठोक दिया है। 'इंडिया' अंग्रेजी के इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इनक्लूसिव अलायन्स का संक्षेपाक्षर है।
इसी के साथ कई चीजें साफ हो गयी हैं। एक तो यह कि कांग्रेस भारत जोड़ो यात्रा की अच्छी कामयाबी और कर्नाटक की भारी जीत के बावजूद अकेले चुनावों में उतरने की सोच भी नहीं पा रही है। पर यदि 'इंडिया' को जीत हासिल करनी है तो इसके घटक दलों में सबसे ज्यादा होमवर्क और प्रदर्शन कांग्रेस को ही करना है। कांग्रेस को अपनी सीटों को कम-से-कम तिगुना करना होगा। अगर कांग्रेस 2024 में अपने आप को साबित करना चाहती है तो भाजपा से कम-से-कम सौ से अधिक सीटें अकेले कांग्रेस को छीननी होंगी।
दूसरी बात जो साफ हुई है वह यह कि भाजपा 303 सीटें जीतने के बावजूद 2024 में पूर्ण बहुमत को लेकर आशंकित है। इसलिए वह 38 दलों को जोड़ रही है। अकेले लड़ने से वह भी घबरा रही है। 38 में से अधिकांश दलों के पास लोकसभा में कोई सीट नहीं है और न उनके जीतने की संभावना है फिर भी ऐसे अधिक से अधिक दलों को भाजपा अपने साथ रखना चाहती है तो इससे उसकी समझदारी का पता चलता है। सूक्ष्म चुनावी प्रबंधन पर बल देने के कारण ही भाजपा ऐसा कर रही है।
एक और चीज जो साफ हो गयी है कि मोदी सरकार के खिलाफ मजबूत विपक्षी गठबन्धन खड़ा हो चुका है। कुछ महीनों पहले तक यह कयास लगाना मुश्किल था कि 26 दल एक साथ आ जाएंगे और एक चुनाव पूर्व गठबन्धन बना पाएंगे। एक तो मोदी-कोप से कई छोटे दलों के नेताओं में भयमिश्रित असमंजस था तो दूसरा यह कि इन दलों में से कई राज्यों में एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं।
केरल इसमें सबसे रोचक है जहाँ मुख्य मुकाबला 'इंडिया' के घटक दलों- कांग्रेस और सीपीएम- के बीच ही है। यहाँ का मामला इतना रोचक है कि यहां भाजपा विरोध का कोई अर्थ ही नहीं है। यहाँ कांग्रेस को सीपीएम का विरोध करना है और सीपीएम को कांग्रेस का। एक बार को बंगाल में भी सीपीएम, कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के साथ आकर भाजपा के खिलाफ लड़ने की संभावना बन सकती है लेकिन केरल में नहीं।
'इंडिया' गठबन्धन को केरल-कोण से देखें तो यह स्पष्ट होता है कि 'इंडिया' को केवल भाजपा से ही संघर्ष नहीं करना है बल्कि आंतरिक संघर्ष भी बहुत ज्यादा करना है। आंतरिक संघर्ष को न्यूनतम रखना ही 'इंडिया' की सफलता की पूर्व शर्त है। इस आंतरिक संघर्ष को न्यूनतम करने के लिए उसके पास दो रास्ते हैं। एक तो गठबन्धन को चुनिंदा राज्यों में चुनाव बाद फलित किया जाय। बाकी जिन राज्यों में मुख्य मुकाबला बीजेपी से है उन राज्यों में चुनाव पूर्व गठबन्धन किया जाय।
चुनाव पूर्व और चुनाव पश्चात के लफड़े में पड़ने से अधिक इसके लिए एक सीट पर एक उम्मीदवार की युक्ति कारगर होगी। यदि ऐसा हो पाता है तो 'इंडिया' बंगाल, दिल्ली, पंजाब, तमिलनाडु, केरल की लगभग सभी सीटें तथा बिहार और महाराष्ट्र में अभूतपूर्व प्रदर्शन कर सकता है। यही नहीं 26 दलों के नेता जब उन राज्यों में भी प्रचार के लिए दौड़ेंगे तब जनता उनकी बातें सुन सकती है जहाँ भाजपा को सबसे अधिक उम्मीदें हैं।
गठबन्धनों के चुनावी संघर्ष का स्वरूप चाहे जो भी हो लेकिन आगामी आमचुनाव में मुख्य रणबांकुरे कांग्रेस और भाजपा को ही रहना है। धन, प्रचार और कार्यकर्ता सभी दृष्टि से भाजपा मजबूत तो है ही। इसके अलावा इसमें भी कोई संदेह नहीं कि चुनाव बाद बुरी-से-बुरी हालत में भी वह सबसे बड़ा दल बनकर उभरेगी। परन्तु यदि कांग्रेस उससे राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में ठीक से भिड़े और लोकसभा की 70% से अधिक सीटें जीत ले, तो मोदी के लिए जरूर मुश्किल पैदा हो जाएगी।
यह कांग्रेस के लिए बड़ा लक्ष्य हो सकता है लेकिन असम्भव नहीं। इन राज्यों में उसका संगठन भी सुदृढ़ है और नेतृत्व भी लोकप्रिय है। 10 सालों की केंद्रीय सत्ता विरोधी लहर यदि ज़रा भी चल गई तो कांग्रेस अचंभा कर सकती है। इसी अचंभे पर 'इंडिया' में उसकी नेतृत्वकारी भूमिका व हैसियत भी तय होगी और केंद्र में सरकार गठन का मार्ग भी प्रशस्त होगा। यानी 2024 का निर्णय मूलतः कांग्रेस और भाजपा के बीच ही होगा।
यह कैसे हो सकता है? इसका आकलन सरल है। यदि कांग्रेस भाजपा से 100 के आसपास सीटें छीनकर अपनी संख्या 150 के आसपास कर पाती है और भाजपा 200 पर थम जाती है तो राजनीतिक हालात को देखते हुए कहा जा सकता है कि चुनाव के बाद कांग्रेस को भाजपा से ज्यादा सहायक दल मिलेंगे। 'इंडिया' में शामिल दलों के अलावा अन्य दलों का भी उसे समर्थन मिल सकता है। कुछ सरकार में शामिल हो सकते हैं और कुछ बाहर से समर्थन दे सकते हैं।
एनडीए बनाम 'इंडिया' की बाइनरी तो अब स्पष्ट हो चुकी है। एनडीए का भीतरी-बाहरी समीकरण भी स्पष्ट है। उसके नेता मोदी होंगे। घटक दलों को भाजपा के नेतृत्व में ही सब कुछ हासिल करना है। भाजपा सागर है तो वे उसकी बूंदें हैं। परन्तु, 'इंडिया' में सब कुछ तय नहीं है। कौन नेता होगा? इस पर खुली घोषणा नहीं हुई है। शुरू में नीतीश कुमार पर चर्चा केंद्रित थी। पर जब से लालू प्रसाद यादव ने राहुल गांधी की 'बारात' में शामिल होने की इच्छा जताई है, तब से यह कयास लगाया जा रहा है कि राजद को राहुल गांधी का नेतृत्व स्वीकार है।
इसके अलावा सीपीएम, डीएमके, एनसीपी, माले, एसपी को भी कोई खास समस्या नहीं होगी। ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल और नीतीश कुमार हो सकता है चुनाव तक नेता घोषित किये जाने के पक्ष में न हों और बाद में अपने पक्ष में समीकरण बन जाने की कल्पना करते हों, पर नवम्बर-दिसंबर तक भारत जोड़ो यात्रा के संभावित दूसरे चरण के पूरा होते-होते यदि इंडिया मजबूत होता दिखता है तो उनके लिए परिस्थितियां अनुकूल हो सकती हैं।
परन्तु राहुल गांधी की राजनीति पर बारीक नजर रखने वाले जानते हैं कि राहुल गांधी की महत्वाकांक्षा किसी तरह प्रधानमंत्री बन जाने की नहीं है। उन्हें प्रधानमंत्री बनने से परहेज नहीं है, हो सकता है उनके सहयोगी दलों को भी न हो, पर 200 से कम सीटें लाने वाली कांग्रेस के प्रधानमंत्री वे नहीं होना चाहेंगे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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