RBI Repo Rate: नहीं बढ़ी ईएमआई लेकिन मंहगाई को लेकर चिंता बरकरार
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महंगाई की ख़बरों के बीच रेपो रेट नहीं बढ़ती है तो लोन की किस्तें भरने वाले सभी लोगों के लिए राहत की खबर होती है। इस बार आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति बैठक में एक बार फिर से रेपो रेट को 6.5 प्रतिशत पर ही स्थिर रखने का फैसला लिया गया। ऐसा लगातार तीसरी बार है जब मौद्रिक नीति समिति बैठक में रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इससे पहले भी दो बार अप्रैल और जून में हुई बैठक में रेपो रेट को स्थिर रखा गया था।
गौरतलब है कि 6 सदस्य वाली मौद्रिक समीक्षा कमेटी (एमपीसी) के सामने रेपो रेट के अलावा वैश्विक हालात, देश में बढ़ रही महंगाई, अर्थव्यवस्था इत्यादि जैसे तमाम मुद्दे थे। ऐसे में देश टकटकी लगाये बैठा था जिस कारण इस बार 10 अगस्त की बैठक काफी महत्वपूर्ण थी। बैठक में रेपो रेट स्थिर रखने के फैसले के बाद अब आम आदमी को कम से कम यह सूकून है कि उसके घर या गाड़ी के लोन की किस्त बढ़ने की फिलहाल कोई सम्भावना नहीं है।

हालांकि रिजर्व बैंक ने इस बार वित्तीय वर्ष 2024 के लिए भी महंगाई का अनुमान बढ़ाया है। इसे 5.1 फीसदी से बढ़ाकर 5.4 फीसदी कर दिया है। आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने चेताया है कि असमान बारिश और सब्जियों की बढ़ती कीमतों के कारण जुलाई और अगस्त महीने में महंगाई बढ़ने की आशंका अभी भी बरकरार है।
आपने अक्सर देखा होगा कि रिजर्व बैंक रेपो रेट को महंगाई से लड़ने के एक शक्तिशाली टूल के रूप में इस्तेमाल करता है। जब भी महंगाई बढ़ती है तो आरबीआई रेपो रेट बढ़ाकर अर्थव्यवस्था में नकदी प्रवाह को कम कर देता है ताकि मुद्रा स्फीति की दर धीमी हो जाये, मांग में कमी आये और महंगाई घट जाए। इसी तरह जब इकोनॉमी का बुरा दौर होता है तो ब्याज दर घटाकर बाजार में नगदी प्रवाह बढ़ा देती है।
इस बार रेपो दर स्थिर रखने के बाद भी शक्तिकांत दास का मानना है की महंगाई को लेकर चिंता और अनिश्चितता अभी भी बरकरार रहेगी और यह वित्त वर्ष 2023-24 में 4 फीसदी के ऊपर रहेगी। जून में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.81 फीसदी पर आ गई थी जबकि मई में यह 4.25 फीसदी थी। इसका प्रमुख कारण बारिश के मौसम में असमान मानसूनी बारिश था।
अब किसी के भी मन में यह शंका होगी कि जब महंगाई बढ़ रही है तो रिजर्व बैंक ने रेपो रेट का चाबुक क्यों नहीं चलाया, तो इसके पीछे कारण है। पहला कारण, सरकार महंगाई रोकने के लिए रेपो रेट से इतर अन्य विकल्पों पर भी काम कर रही है। जैसे गैर बासमती चावल के निर्यात पर रोक लगा दी गई है। मतलब देश में चावल का भरपूर स्टॉक होने के बावजूद सरकार भविष्य में या कभी भी कृत्रिम कारणों से भी चावल के दाम को चिंताजनक स्तर पर नहीं ले जाना चाहती है और वो भी तब जब चुनाव बहुत नजदीक हों।
इसी तरह आटे के आयात में आयात शुल्क में छूट की घोषणा की गई है। मतलब सरकार रेपो रेट के उपाय के अलावा चावल आटे इत्यादि के आयात निर्यात के नियमों में बदलाव कर मूल्य को स्थिर या कम करना चाहती है, ताकि महंगाई को काउंटर बैलेंस किया जा सके। इन बेसिक चीजों का दाम भी ज्यादा ना बढ़े और लोगों की किस्त भी ना बढ़े। सरकार कुल मिलाकर इस मामले में कई मोर्चों पर काम कर रही है।
भारत सरकार ने जुलाई माह में चावल की कीमतों में तेजी को देखते हुए और आने वाले त्यौहारी सीजन के दौरान घरेलू आपूर्ति को बढ़ावा देने और खुदरा कीमतों पर नियंत्रण रखने के लिए पिछले माह ही गैर-बासमती सफेद चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया है। देश से निर्यात होने वाले कुल चावल में गैर-बासमती सफेद चावल की हिस्सेदारी करीब 25 फीसदी है। साल 2022-23 में चावल के कुल वैश्विक निर्यात में भारत का हिस्सा 40 प्रतिशत था। सरकार के फैसले से चावल का निर्यात प्रभावित हो सकता है और गैर बासमती चावल के उत्पादक किसान भी प्रभावित होंगे। हालांकि इस कदम से देश में तो चावल की कीमत में गिरावट आएगी लेकिन दुनियाभर में चावल की कीमतों को लेकर हाहाकार मच सकता है, क्यूंकि भारत दुनिया में चावल का सबसे बड़ा निर्यातक देश है।
रूस यूक्रेन युद्ध के कारण गेंहू के मुद्दे पर दुनिया वैसे ही जूझ रही थी ऐसे में भारत के इस कदम से यदि ग्लोबल लेवल पर चावल के भी दाम बढ़ने लगे तो भारत बहुत दिनों तक इसके चक्रीय प्रभाव से बच नहीं सकता। विदेशों के केंद्रीय बैंक खासकर यूरोप और अमेरिका के केंद्रीय बैंक अपने यहां आई इस महंगाई से लड़ने के लिए फिर उसी संस्थागत टूल का इस्तेमाल करेंगे जिसे ब्याजदर कहते हैं। वह अपना ब्याजदर बढ़ाएंगे ताकि उनकी महंगाई नियंत्रित हो, फिर डॉलर एसेट बढ़ेगा, और डॉलर निवेश फिर भारत से बाहर जायेगा।
ऐसे में भारत इस चक्रीय प्रभाव से कितना बचता है यह देखना पड़ेगा। चूँकि चावल, आटे एवं अन्य आयात निर्यात के निर्णय अभी लिए गए हैं ऐसे में विश्व की महंगाई और इसके केंद्रीय बैंक क्या प्रतिक्रिया देते हैं और उसकी प्रतिक्रिया में अपना रिजर्व बैंक क्या करता है वह मौद्रिक नीति के लिए अगली बैठक में पता चलेगा। फिलहाल तब तक के लिए आम आदमी राहत की सांस ले सकता है कि उसकी ना तो किस्त बढ़ी और न ही चावल आटे का दाम ज्यादा बढ़ने की संभावना है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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