Gehlot vs Pilot: कांग्रेस का 'घाव' जो नासूर बन चुका है
राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच लंबे समय से खटपट चल रही है। लेकिन कांग्रेस हाईकमान ने उनकी खटपट पर ध्यान देना बंद कर दिया है जिसके कारण दोनों का झगड़ा कांग्रेस पार्टी का नासूर बन गया है।

Gehlot vs Pilot: कांग्रेस के असंतुष्ट नेता सचिन पायलट के नेतृत्व में 11 मई को अजमेर से निकली जन संघर्ष यात्रा 125 किमी की यात्रा पूरी करके जयपुर पहुंची। पांच दिनों की इस यात्रा का समापन 15 मई को हुआ। यात्रा के अंतिम दिन सचिन ने साफ साफ कह दिया कि यदि उनकी मांगे 30 मई तक नहीं मानी गई तो वे गांधीवादी रास्ता छोड़कर सड़क पर उतरेंगे और अपनी मांगों के पक्ष में तीव्र आंदोलन चलाएंगे।
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यात्रा के अंतिम दिन जयपुर में गुर्जर नेता को समर्थन देने के लिए उनके समर्थकों की खूब भीड़ उमड़ी। यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि कांग्रेस साफ कर चुकी है कि सचिन पायलट की जन संघर्ष यात्रा से पार्टी का कुछ लेना देना नहीं है। इसका अर्थ यह हुआ कि जो भीड़ पायलट के साथ सड़क पर उतर आई है, वह कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं की भीड़ नहीं थी। वह गहलोत सरकार से रूष्ट युवाओं की भीड़ है।
सचिन पायलट की जन संघर्ष यात्रा के मंच से बसपा के टिकट पर विधायक बनने के बाद गहलोत सरकार को समर्थन देकर मंत्री बने राजेन्द्र गुढ़ा ने अपनी ही सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा दिए। गुढ़ा ने कहा कि राजस्थान सरकार ने भ्रष्टाचार की सारी सीमाएं पार कर ली हैं। उनके पास इस बात के सुबूत हैं कि गहलोत ने बीजेपी के विधायकों को खरीदने के लिए बीस बीस करोड़ दिए। राजस्थान में गुढ़ा अपने विवादास्पद बयानों के लिए चर्चा में रहते हैं और शायद उन्हें भी तरह तरह के बयान देकर खबरों में बने रहना पसंद है।
बीते तीन सालों में राजस्थान की राजनीति ने कई उतार चढ़ाव देखे। मुख्यमंत्री बनने की इच्छा पूरी न हो पाने पर रूष्ट सचिन पायलट द्वारा मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के विरुद्ध खोले गए मोर्चे को देखकर राजनीति के जानकार लोगों को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। सचिन पायलट की अनुभवहीनता और उतावलेपन को जानने वाले लोगों को पता था कि वे अपने आपको मुख्यमंत्री ही नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री बनने योग्य नेता मानते हैं। इसलिए सचिन की महत्त्वाकांक्षा के चलते यह तय था कि 2023 के चुनाव से पहले राजस्थान कांग्रेस दो धड़ों में बंटेगी।
राजेश पायलट के पुत्र होने के नाते 45 वर्षीय सचिन पायलट गुर्जर समाज के नेता हैं। कम उम्र में बड़े बड़े पद मिल जाने के उपरांत भी उन्हें मुख्यमंत्री बनने की हड़बड़ी है। अपने स्वजातीय समर्थकों के हुजूम के दम पर पायलट को लगता है कि उनमें भारत का भावी नेता बनने की योग्यता है। वहीं 50 वर्षों से राजस्थान कांग्रेस की राजनीति कर रहे अशोक गहलोत के सामने ठीक चुनावी साल में पार्टी के अंदर से हुई बगावत एक बार फिर से बड़ी मुसीबत बनकर खड़ी है।
राजनीति में तेजी से आगे बढ़ने की चाह में कोरोना संकट के दौरान सचिन पायलट अपने समर्थक 19 विधायकों को लेकर हरियाणा के मानेसर में एक रिसॉर्ट में जाकर बैठ गए थे। उन्हें आशा था कि उनके समर्थन में 50 से ज्यादा कांग्रेस विधायक रहेंगे और भाजपा के समर्थन से वे मुख्यमंत्री बन जायेंगे लेकिन वे 20 विधायक भी नहीं जुटा पाए और उप मुख्यमंत्री के साथ साथ प्रदेश अध्यक्ष का महत्त्वपूर्ण पद भी खो बैठे।
इस घटनाक्रम के बाद कुछ समय तक गांधी नेहरू परिवार द्वारा गहलोत और पायलट के बीच सुलह करवाने की कोशिश हुई फिर दोनों की आपसी कड़वाहट को देखते हुए उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया गया। समय के साथ यह कड़वाहट बढ़ती गई। एक घाव सही समय पर देखभाल ना मिलने की वजह से नासूर बन गया। जब भी सचिन पायलट के तेवर थोड़े बगावत वाले नजर आए, उन्हें राहुल और प्रियंका द्वारा आश्वासन देकर मना लिया गया। लेकिन सोनिया गांधी को हमेशा गहलोत पर ही भरोसा रहा। इसलिए राहुल और प्रियंका चाहकर भी सचिन को दिए आश्वासन पूरे नहीं कर पाए। अपनी ही पार्टी की सरकार गिराने की कोशिश असफल हो जाने के बाद राजस्थान कांग्रेस में सचिन पायलट के लिए अवसर सीमित ही बचे हैं। इसलिए चुनावों से पहले उन्हें अपनी ताकत का प्रदर्शन करना जरूरी हो गया है। कांग्रेस में उनको पहले जैसा महत्व मिले तो ठीक, नहीं तो वे अपनी अलग राह पकड़ने के लिए भूमिका बना रहे हैं। इसी उद्देश्य से वे पिछले कुछ समय से अशोक गहलोत के साथ साथ भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर भी आरोप लगाकर अपने आप को दोनों के विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
यह चर्चा आम है कि सचिन पायलट के बारे में निर्णय करते समय कांग्रेस नेतृत्व अशोक गहलोत के दबाव में आ जाता है। कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए पिछले साल अशोक गहलोत का नाम सामने आया था। उसी वक्त यह स्पष्ट हो गया था कि दिल्ली कांग्रेस पर गहलोत का दबाव काम कर रहा है। गहलोत अपनी शर्तों पर कांग्रेस का अध्यक्ष पद चाहते थे। उनकी शर्त थी कि राजस्थान की कमान उनके किसी विश्वासपात्र के पास ही रहेगी। लेकिन प्रियंका वाड्रा सचिन पायलट को तुरंत मुख्यमंत्री बनाना चाहती थी। उनके इशारे पर पार्टी महासचिव अजय माकन ने विधायकों की राय जानने के बहाने पायलट की ताजपोशी करवाने का प्रयास किया। उसी दौरान गहलोत के समर्थक विधायकों की बगावत वाला घटनाक्रम चला। बाहरी तौर पर दिख रहा था कि यह साफ तौर पर गांधी परिवार के खिलाफ खुला विद्रोह था, लेकिन सोनिया गांधी के करीबी लोगों का कहना था कि गहलोत सब कुछ उनकी स्वीकृति से कर रहे थे। सोनिया और गहलोत की अंडरस्टैंडिंग काम कर गयी और प्रियंका चाहकर भी पायलट को मुख्यमंत्री नहीं बना सकी। गहलोत ने चालाकी दिखाते हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से इंकार कर दिया और राहुल व प्रियंका के दवाब के बावजूद मुख्यमंत्री बने रहे।
सचिन पायलट अप्रैल माह की 11 तारीख को एक दिन के लिए अनशन पर बैठे थे। कांग्रेस नेतृत्व नहीं चाहता था कि वे ऐसा करें। क्योंकि उन्होंने अनशन अपनी ही सरकार की नाकामियों के खिलाफ रखा था। उनके अनशन पर राजस्थान के कांग्रेस नेता सुखजिन्दर सिंह रंधावा का ट्वीट आया कि उनका यह अनशन एंटी पार्टी एक्टिविटी माना जाएगा। वे जो मुद्दे मीडिया और जनता के बीच उठा रहे हैं, उन्हें पार्टी फोरम पर उठाना चाहिए। रंधावा ने लिखा कि वे पिछले पांच महीने से राजस्थान के इंचार्ज हैं लेकिन उनसे कभी इस संबंध में चर्चा नहीं की गई। यह सारी बातें एक तरफ पार्टी द्वारा लिखी और समझाई जा रहीं थी। दूसरी तरफ एक सच यह भी था कि प्रियंका का वरदहस्त होने के कारण कांग्रेस पार्टी ना सचिन पायलट पर कार्रवाई करने की स्थिति में थी और गहलोत की पीठ पर सोनिया का हाथ होने के कारण पायलट को पुनः सत्ता में हिस्सा देने की स्थिति में भी नहीं थी।
बहरहाल, अशोक गहलोत सरकार से नाराज युवाओं का जिस प्रकार सचिन पायलट की यात्रा को साथ मिला है, वह कांग्रेस को परेशानी में डालने वाला है। यह स्पष्ट है कि गहलोत किसी कीमत पर पायलट को फिर से स्थापित होने नहीं देंगे और पायलट भरसक प्रयास करेंगे कि गहलोत फिर से सत्ता में न लौट पाएं। कुल मिलाकर दोनों में कटुता इतनी बढ़ चुकी है कि पार्टी नेतृत्व द्वारा किसी तरह के सीजफायर करवाने का भी कोई सार्थक परिणाम नहीं निकलेगा। राजस्थान कांग्रेस भी पंजाब की तरह आपसी कलह की शिकार होकर सत्ता से बाहर होने की कगार पर है। देखना यह है कि क्या इसका लाभ भाजपा को मिलेगा, या सचिन पायलट अन्य कुछ जातिवादी संगठनों के साथ तीसरा मोर्चा बनाकर चुनाव के बाद राजस्थान में निर्णायक भूमिका में आ पाएंगे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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