Rajasthan OBC: राजस्थान में सबसे बड़ा मुद्दा बना ओबीसी आरक्षण
Rajasthan OBC: राजस्थान की राजनीति में इस बार भ्रष्टाचार से ज्यादा ओबीसी आरक्षण मुद्दा बन रहा है। इस कारण भाजपा और कांग्रेस दोनो प्रमुख दल ओबीसी आरक्षण को लेकर अपने अपने दावे कर रहे हैं। विपक्ष में बैठी भारतीय जनता पार्टी ओबीसी आरक्षण के मुद्दे पर सत्ता में वापसी की उम्मीद कर रही है, वहीं कांग्रेस जातिगत जनगणना की मोदी से मांग कर अपने को ओबीसी जातियों का सबसे बड़ा हितैषी बताने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है।
भारतीय जनता पार्टी ने घोषणा की है कि राजस्थान में सत्ता आने पर राजस्थान के आठ आदिवासी जिलों में आरक्षण से वंचित 93 जातियों को आरक्षण दिया जाएगा। दरअसल भाजपा का मकसद राजस्थान की उन 90 से ज्यादा जातियों को साधना है जो ओबीसी वर्ग से आती हैं। भाजपा राजस्थान में ओबीसी वर्ग को अपने पाले मे लाने के लिए आरक्षण के मामले को तूल देने की रणनीति पर काम कर रही है। राजस्थान की आबादी में 55 प्रतिशत से ज्यादा आबादी ओबीसी समुदाय की है। ओबीसी समुदाय का कम ज्यादा प्रभाव राजस्थान की लगभग सभी लोकसभा और विधानसभा सीटों पर है। सामान्य ही नहीं एससी-एसटी के लिए आरक्षित ज्यादातर सीटों पर भी ओबीसी मतदाता ही निर्णायक भूमिका में है।

दूसरी ओर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत राजस्थान के मतदाताओं को याद दिला रहे हैं कि 1998 में जब वह पहली बार मुख्यमंत्री बने थे, तब ओबीसी का आरक्षण 21 फीसदी था। उन्होंने ही अनुसूचित जाति का आरक्षण 8 से बढ़ाकर 16 फीसदी किया और अनुसूचित जनजाति का आरक्षण 6 से बढ़ाकर 12 फीसदी किया था। गहलोत राजस्थान के ओबीसी मतदाताओं को यह भी भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे है कि कांंग्रेस की सरकार दोबारा बनने पर वह ओबीसी के लिए आरक्षण 21 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का हरसंभव प्रयास करेंगे। भाजपा भी ओबीसी आरक्षण बढ़ाने का भरोसा राजस्थान के ओबीसी मतदाताओ को दे रही है।
ऐसे में इस बात की पूरी संभावना है कि इस विधानसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों अपने घोषणा पत्र में ओबीसी आरक्षण को बढ़ाने का वादा करेंगे। अभी कुछ दिन पहले ही कांग्रेस विधायक हरीश चौधरी ने अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग को ज्ञापन सौंपकर ओबीसी आरक्षण को 21 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने की मांग की है। इसके साथ ही कांग्रेस विधायक ने अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री को चेतावनी दी है कि ओबीसी आरक्षण को लेकर कोई निर्णय नहीं लिया तो कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। अशोक गहलोत भी राज्य में ओबीसी वोटर्स की ताकत को समझ रहे हैं इसलिए अशोक गहलोत ने कहा है कि ओबीसी जाति के हर पहलू पर वह बारीकी से विचार कर रहे हैं और कोशिश कर रहे हैं कि ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण हो। अशोक गहलोत ने कहा है कि वो इस प्रयास में हैं कि ओबीसी का आरक्षण भी बढ़ जाए और अन्य वर्गो में असमानता का भाव भी न उत्पन्न हो।
इस बीच राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने अपनी रिपोर्ट में यह कहकर राजस्थान की कांग्रेस सरकार की समस्या और बढ़ा दिया है कि राजस्थान में ओबीसी वर्ग को आरक्षण देने में अनियमितता बरती जा रही है। इस रिपोर्ट के आने के बाद बीजेपी के तमाम वरिष्ठ नेताओं ने गहलोत सरकार पर निशाना साध कर ओबीसी वर्ग से भेदभाव के आरोप लगाए हैं।
राजस्थान में आदिवासी बहुल इलाकों के 8 जिले डूंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, पाली और सिरोही ट्राइबल सब-प्लान (टीएसपी) में शामिल है। टीएसपी क्षेत्र की जनसंख्या करीब एक करोड़ के आसपास है। इन क्षेत्रों में सरकारी नौकरियों के लिए अलग से आरक्षण व्यवस्था लागू है। यहां एसटी को सबसे ज्यादा 45 प्रतिशत और एससी वर्ग को 5 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है। इन इलाकों में ओबीसी वर्ग के लोग भी रहते हैं लेकिन उनको टीएसपी आरक्षण के अंतर्गत ओबीसी आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा है। आदिवासी बहुल इलाके के 8 जिलों में ओबीसी के लिए आरक्षण लागू नहीं होने को बीजेपी मुद्दा बना रही है और दावा कर रही है कि सरकार आने पर आदिवासी बहुल आठ जिलों में ओबीसी जातियों को आरक्षण देंगे। ओबीसी और आरक्षित इलाके भाजपा के लिए कितने महत्व के हैं, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी पिछले छह महीने में इस क्षेत्र में तीन रैलियां कर चुके हैं।
राजस्थान की 200 विधानसभा सीटों में से 59 सीटें रिजर्व हैं। लेकिन ज्यादातर सीटों पर चुनाव में ओबीसी वर्ग के वोटर ही निर्णायक स्थिति में हैं। ओबीसी वर्ग का वोट एकतरफा जिस पार्टी को पड़ता है, जीत उसी की होती है। यही कारण है कि इस बार के चुनाव में सबसे ज्यादा गूंज ओबीसी आरक्षण की सुनाई दे रही है। 2018 के चुनाव में बीजेपी को 38 रिजर्व सीटों पर हार के कारण सत्ता से बाहर होना पड़ गया था। 2013 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने एससी और एसटी के लिए रिजर्व 59 विधानसभा सीटों में से 50 सीटों पर जीत दर्ज की थी लेकिन 2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 59 में से केवल 21 सीटों पर ही जीत मिली। 2018 के चुनाव में बीजेपी ने एससी रिजर्व सीटों में से सिर्फ 12 और एसटी रिजर्व सीटों में सिर्फ 9 सीटों पर जीत दर्ज की। जबकि कांग्रेस ने एससी की 19 और एसटी की 12 सीटों पर जीत हासिल की।
राज्य में अनुसूचित जाति वर्ग से 34 विधायक और 4 सांसद तथा अनुसूचित जनजाति वर्ग से 33 विधायक और 3 सांसद हैं। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग को लोकसभा और विधानसभा के साथ नगरीय निकाय और पंचायतराज संस्थानों में आरक्षण हासिल है। ओबीसी वर्ग को नगरीय निकाय और पंचायतीराज चुनावों में 21 फीसदी आरक्षण मिला हुआ है जबकि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में इस वर्ग के लिए सीटें आरक्षित नहीं हैं। अति पिछड़ा वर्ग (एमबीसी) को नगरीय निकायों और पंचायतराज संस्थाओं में एक प्रतिशत आरक्षण दिया गया है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सरकारी नौकरियों में ओबीसी आरक्षण 21 से 27 प्रतिशत किया जाता है तो यह मामला सुप्रीम कोर्ट में जाएगा और रद्द हो जाएगा। वह इसलिए क्योंकि महाराष्ट्र और तमिलनाडु के मामले में सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि आरक्षण तय सीमा से ज्यादा नहीं दिया जा सकता। भारत में राज्यों के आरक्षण प्रतिशत को देखें तो 64 फीसदी आरक्षण के साथ राजस्थान फेहरिस्त में तीसरे नंबर पर है। इस लिस्ट में पहले स्थान पर मध्य प्रदेश (73 फीसदी आरक्षण) और दूसरे स्थान पर तमिलनाडु (69 फीसदी आरक्षण) है। राजस्थान की सरकारी नौकरियों में फिलहाल अन्य पिछड़ा वर्ग को 21, अनुसूचित जाति को 16, अनुसूचित जनजाति को 12 फीसदी और गुर्जर सहित पांच जातियों को मोस्ट बैकवर्ड क्लास (एमबीसी) श्रेणी में 5 फीसद आरक्षण मिलता है। इसके साथ ही आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों के लिए 10 फीसदी आरक्षण का प्रावधान है।
राजस्थान में सबसे बड़ी सियासी ताकत ओबीसी वर्ग की है। ऐसे में अगर वह सरकारी नौकरियों में आरक्षण के मुद्दे पर अड़ जाती है तो दोनों ही दलों को मुश्किल होनेवाली है। इसी मुश्किल को कम करने के लिए कांग्रेस और भाजपा दोनों अपने अपने तरीके से अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं को अपनी ओर लाने के वादे कर रहे हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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