Modi and Rajasthan: राजस्थान में रैलियों द्वारा मोदी की नजर लोकसभा की कमजोर सीटों पर
इसी साल होने वाले विधानसभा चुनाव और उसके कुछ महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव को देखते हुए नरेंद्र मोदी राजस्थान को लेकर विशेष रूप से चिंतित पर हैं।

Modi and Rajasthan: राजस्थान में विधानसभा चुनाव के काफी पहले से नरेन्द्र मोदी सक्रिय हो गये हैं। बीते साल सितंबर से ही वो प्रदेश भाजपा की कमजोरी का ध्यान रखते हुए राजस्थान का दौरा कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि पिछले पांच वर्षों में हुए लगभग सभी उप चुनावों में भाजपा को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है। कई जगह तो भाजपा के उम्मीदवार तीसरे और चौथे स्थान पर रहे और जमानत भी नहीं बचा सके। मोदी को डर है कि प्रदेश संगठन की कमजोरी के कारण विधानसभा के साथ साथ कहीं लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को कुछ सीटों का नुकसान न हो जाए।
प्रधानमंत्री पिछले वर्ष 30 सितंबर को आबूरोड के मानपुर, उसके बाद 1 नवंबर को बांसवाड़ा के मानगढ धाम, 28 जनवरी को आसींद, तथा फरवरी में पूर्वी राजस्थान को साधने के लिए दौसा एक्सप्रेसवे का उद्घाटन करने दौसा के धनावड़ में आए थे। मोदी पिछले चार महीनों में चार बार राजस्थान के उन क्षेत्रों में उद्घाटन या रैली कर चुके हैं जो लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए कमजोर माने जा रहे हैं।
गौरतलब है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार का प्रमुख कारण पूर्वी राजस्थान में बुरा प्रदर्शन था। मीणा, गुर्जर, एससी और ओबीसी बहुल पूर्वी राजस्थान में दौसा, करौली, भरतपुर, टोंक, जयपुर, अलवर, सवाई माधोपुर, धौलपुर जिले की 58 विधानसभा सीटें आती हैं। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले हुए 2013 के विधानसभा चुनाव में इन 8 जिलों में भाजपा ने 44 सीटें जीती थीं, लेकिन मोदी सरकार के दौरान हुए 2018 के चुनाव में उसे सिर्फ 11 सीटों पर ही जीत मिल सकी और 2013 के मुकाबले 33 सीटें गंवा दी। इस कारण भाजपा को राजस्थान में सत्ता से हाथ धोना पड़ा। जातिगत और सियासी समीकरणों के हिसाब से पूर्वी राजस्थान में कांग्रेस के अलावा बसपा का भी अपना प्रभाव है। भाजपा को इस बात का अच्छे से अंदाज है कि अगर राजस्थान में सरकार बनानी है तो राजस्थान के इन 8 जिलों में में 2013 का प्रदर्शन फिर से दोहराना होगा।
दौसा, भरतपुर और सवाई माधोपुर में भाजपा
2018 के विधानसभा चुनाव में मोदी के धुआंधार प्रचार अभियान के बाद भी दौसा, भरतपुर और सवाई माधोपुर में भाजपा एक भी विधानसभा सीट नहीं जीत पाई थी। धौलपुर की 4 में से सिर्फ 1 सीट पर भाजपा जीती थी। यहां से भाजपा की एकमात्र विधायक बनी शोभारानी ने राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग कर दी थी, जिसके कारण भाजपा ने इस विधायक को पार्टी से निकाल दिया था। अलवर में 11 सीटों में से मात्र 2 सीट भाजपा के पास है। टोंक और करौली में सिर्फ एक-एक सीट भाजपा के कब्जे में है।
बीजेपी से जुड़े वरिष्ठ नेता और जानकार बताते हैं कि 2023 चुनाव को लेकर पीएम मोदी बीजेपी की रणनीति का अहम हिस्सा हैं। यह चर्चा है कि बीजेपी इस चुनाव में बगैर चेहरे के मैदान में उतरेगी। ऐसे में राजस्थान के जिन हिस्सों में बीजेपी कमजोर है, वहां मोदी खुद प्रचार की कमान संभालेंगे। खासतौर से पूर्वी राजस्थान, उत्तरी-पश्चिमी राजस्थान, दक्षिणी राजस्थान की आदिवासी सीटों पर यह देखने को मिलेगा। इन सीटों पर प्रचार के बहाने मोदी लोकसभा चुनाव की तैयारी भी कर लेंगे।
इसीलिए मोदी अब तक राजस्थान में अपने दौरों से 15 जिलों की लगभग 100 विधानसभा सीटों और 10 लोकसभा सीटों को छू चुके हैं। माना जा रहा है कि विधानसभा चुनाव तक उनकी राजस्थान में 20 से ज्यादा सभाएं होंगी। ऐसे में मोदी का फोकस प्रदेश की सभी विधानसभा सीटों के साथ-साथ लोकसभा सीटों को साधने पर भी होगा।
लोकसभा चुनाव पर है नजर
पीएम मोदी के राजस्थान में हो रहे ताबड़तोड़ दौरों के पीछे राजस्थान भाजपा के नेता विधानसभा चुनाव के साथ साथ लोकसभा चुनाव को भी बता रहे हैं। मोदी इस बार भी राजस्थान की सभी 25 लोकसभा सीटें जीतना चाहते हैं। 2019 में भाजपा को 25 में से 24 सीटें मिली थी। एक सीट आरएलपी के पास है जिनके साथ बीजेपी ने राजस्थान में गठबंधन किया था। हालांकि अब वह गठबंधन टूट चुका है। ऐसे में अब बीजेपी 2024 में एक बार फिर राजस्थान की इन सभी सीटों पर कब्जा करना चाहती है।
भाजपा दौसा और नागौर दो सीटों को खास तौर पर चुनौती के रूप में देख रही है। दौसा में सचिन पायलट और नागौर में हनुमान बेनीवाल का जातिगत प्रभाव है। दौसा में जहां गुर्जर वोटरों का बाहुल्य है वहीं नागौर में बेनीवाल समर्थक जाट वोटर बड़ी संख्या में हैं। दौसा में पिछली बार राजस्थान में सबसे कम मार्जिन से भाजपा जीती थी। सिर्फ 78 हजार वोटों के अंतर से जीत के कारण भाजपा यहां पहले से ही इस तैयारी में है कि जातीय समीकरणों को साधकर इसे मजबूत किया जा सके। 2014 में भी यहां भाजपा सिर्फ 45 हजार वोट से जीती थी। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा दौसा की पांच में से एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। इस लिहाज से भी पार्टी के लिए दौसा की लोकसभा सीट चिंता का विषय बनी हुई है।
राजस्थान में सरकार बनाने और 2024 के लोकसभा चुनाव में फिर से सभी 25 सीटें जीतने के लिए मोदी राजस्थान का दौरा कर मतदाताओं को साधने पर फोकस कर रहे हैं। इसके लिए भाजपा बड़े वोट बैंक वाली जातियों, जैसे जाट, मीणा, गुर्जर, एससी, आदिवासी इत्यादि को हर हाल में खुश रखना चाहती है।
आदिवासी और गुर्जर पर विशेष फोकस
राजस्थान में 25 विधानसभा सीटें आदिवासी बाहुल्य हैं। वैसे ये सीटें भाजपा के लिए आसान रही हैं लेकिन वर्तमान में इन 25 में से सिर्फ 8 सीटों पर ही बीजेपी के विधायक हैं। ये सभी दक्षिणी राजस्थान की सीटें हैं। यही वजह है कि बीजेपी और पीएम दोनों का फोकस आदिवासी सीटों पर है। इसी वजह से पीएम का मानगढ़ दौरा राजस्थान में महत्वपूर्ण माना गया है।
इसी तरह राजस्थान में गुर्जर वोटर भी भाजपा के लिए कमजोर कड़ी बना हुआ है। 2018 के विधानसभा चुनाव में सचिन पायलट के प्रभाव में आकर गुर्जरो ने कांग्रेस के लिए जमकर मतदान किया था। राजस्थान में 8 गुर्जर विधायक हैं, जिसमें से सात कांग्रेस के और एक निर्दलीय है। भाजपा के पास एक भी गुर्जर विधायक नहीं है। इसी कारण मोदी ने गुर्जर समुदाय को साधने के लिए 28 जनवरी को गुर्जरों के आराध्य स्थल मालासेरी डूंगरी में सभा करके उनको साधने की कोशिश की।
भगवान देवनारायण के 1,111वें प्रकट उत्सव के मौके पर यह सभा हुई थी। अपने भाषण में मोदी ने गुर्जरों को कमल के फूल से जोड़ा। गुर्जरों के साथ पुराने रिश्ते की बात कही। सचिन पायलट और अशोक गहलोत में मची खींचतान के बाद भाजपा को उम्मीद है कि आने वाले विधानसभा चुनाव में गुर्जर भाजपा को वोट करेंगे।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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