Karnataka Elections: कर्नाटक की गद्दी पर भाजपा का दांव फिर से 'येद्दि' के भरोसे

कर्नाटक भाजपा ने भले ही येदियुरप्पा को रिटायर करके बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बना दिया हो लेकिन राजनीतिक सच्चाई यही है कि आज भी कर्नाटक में भाजपा बुजुर्ग येद्दि पर निर्भर है।

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Karnataka Elections: अप्रैल-मई में प्रस्तावित कर्नाटक विधानसभा चुनाव से राज्य का सियासी पारा उफान पर है। दक्षिण के प्रवेश द्वार को बचाने की जद्दोजहद में जुटी भाजपा को 80 वर्षीय पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा का सहारा है, वहीं कांग्रेस को प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार और जनता दल (एस) को पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा से चमत्कार की आस है।

यह राजनीति की अजीब विडंबना है कि जिस बेंगलुरु को युवाओं का शहर कहा जाता है, वहां स्थित विधानसभा भवन में 'सरकार' बनवाने की जिम्मेदारी बुजुर्गों के जिम्मे है। हाल के वर्षों में राजनीतिक रूप से अस्थिर कर्नाटक में साख के संकट के साथ ही भ्रष्टाचार बड़ा सियासी मुद्दा है। प्रदेश में भविष्य का नेतृत्व तैयार करने के लिए भाजपा अलाकमान ने येदियुरप्पा को 26 जुलाई, 2021 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया था और जनता दल (एस) सरकार में मुख्यमंत्री रहे एसआर बोम्मई के पुत्र बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बनाया गया।

कर्नाटक में येदियुरप्पा से बड़ा लिंगायत नेता नहीं है इसलिए उनके स्थान पर बोम्मई को लिंगायत नेता होने के कारण 'कुर्सी' मिली जिसका भाजपा में अंदरखाने विरोध भी हुआ। विरोध तो येदियुरप्पा का भी था और भाजपा विधायक बसनगौड़ा पाटिल यतनाल, पर्यटन मंत्री सीपी योगेश्‍वर, विधायक अरविंद बेल्‍लाद ने खुलकर केंद्रीय नेतृत्व के समक्ष अपनी नाराजगी भी प्रकट की। वहीं पूर्व मुख्‍यमंत्री सदानंद गौड़ा से भी येदियुरप्पा को अंदरूनी विरोध का सामना करना पड़ा।

ताजा मामला यह है कि येदियुरप्पा से नाराज चल रहे भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव सीटी रवि ने येदियुरप्पा द्वारा अपने बेटे के लिए शिकारीपुरा विधानसभा सीट खाली करने की घोषणा पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि विधानसभा चुनाव का टिकट देने का फैसला उनके घर या किचन में नही हो सकता।

किन्तु इसे भाजपा की मजबूरी कहें या येदियुरप्पा का 'सियासी कद', केंद्रीय नेतृत्व को इस बार भी येदियुरप्पा की ताकत के सहारे ही चुनावी वैतरणी पार करने का भरोसा है। यही कारण है कि अपने दक्षिणी दुर्ग को बचाने और दक्षिण भारत में पैठ बढ़ाने के मकसद से भाजपा येदियुरप्पा को 'आइकॉन' बनाकर पेश करने की योजना पर काम कर रही है। यह ठीक वैसा ही है जैसे तमिलनाडु में एमजी रामचंद्रन तथा आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव को 'आइकॉन' का दर्जा प्राप्त है। अब भाजपा का यह प्रयास वोटों में कितना तब्दील हो पाता है, यह आने वाला चुनाव परिणाम बता देगा।

राज्यभर में छाएंगे येदियुरप्पा

इस वर्ष प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कर्नाटक में चुनाव प्रचार की शुरुआत करते हुए एक जनसभा में न तो मुख्यमंत्री का नाम लिया और न ही प्रदेश अध्यक्ष को महत्त्व दिया किन्तु येदियुरप्पा को मंच से जो सम्मान मिला उसने इस बात पर मुहर लगा दी कि 'येदि' के बिना आज भी भाजपा कर्नाटक में चल नहीं सकती। यह ठीक वैसा ही है जैसे दादा अपने बेटे को अब भी चलना सिखा रहे हों।

प्रधानमंत्री द्वारा उद्धघाटित नव-निर्मित शिमोगा एयरपोर्ट की सड़क का नाम बीएस येदियुरप्पा मार्ग रखा गया है। राज्य की मीडिया की मानें तो कर्नाटक के स्कूली कोर्स में येदियुरप्पा की जीवनी पढ़ाये जाने पर विचार चल रहा है वहीं उनके निर्वाचन क्षेत्र शिकारीपुरा और विधानसभा में उनकी प्रतिमा लगाने पर भी सहमति बन गई है। राज्य भर में उनके नाम पर पुस्तकालय, किसान योजना, अस्पताल के नाम रखने की तैयारी चल रही है।

आखिर 'येद्दि' इतने ताकतवर कैसे?

दरअसल, कर्नाटक में येदियुरप्पा के कद का नेता भाजपा तो क्या विरोधी दलों में भी नहीं है। भले ही उनका अंदरखाने विरोध होता हो और विरोध के स्वर भी मुखर हुए हों किन्तु चुनाव आते ही विरोधी भी उनकी सियासी ताकत के आगे नतमस्तक हो जाते हैं। उनका विरोध मुख्यमंत्री बनने पर जरूर रहा किन्तु इस बार येदियुरप्पा न तो मुख्यमंत्री बनेंगे और न ही किसी संवैधानिक पद को सुशोभित करेंगे। हां, इतना तय है कि यदि कर्नाटक में भाजपा की सरकार तमाम विरोधों के बाद भी वापसी करती है तो 'येद्दि' ही बॉस की भूमिका में होंगे। उन्हें नकार पाना किसी के बस में नहीं है।

येदियुरप्पा को इतनी ताकत उनके लिंगायत होने तथा कर्नाटक की राजनीतिक दशा-दिशा बदल चुके 'मठों' से उनके संबंधों से प्राप्त होती है। जब उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ी थी तो मठों के जोरदार विरोध ने भाजपा नेतृत्व की पेशानी पर बल ला दिए थे। अंततः केंद्रीय नेतृत्व को येदियुरप्पा को मनाकर उन्हीं से मठों के विरोध को समाप्त करवाना पड़ा था।

पूर्व में जब येदियुरप्पा ने भाजपा छोड़ी थी तो चुनाव में उसे कड़ा संघर्ष करना पड़ा और नेतृत्व को भी येदियुरप्पा की सियासी अहमियत का अंदाजा हो गया था। जिस लिंगायत समुदाय से येदियुरप्पा आते हैं, राज्य में उसकी संख्या 17 प्रतिशत से अधिक है और 90 से 100 सीटों पर लिंगायत समुदाय हार-जीत में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसी लिंगायत समुदाय ने कर्नाटक को 10 मुख्यमंत्री दिए हैं।

भाजपा की तैयारी पूरी, पर बना हुआ है संशय

कर्नाटक में विधानसभा की 224 सीटें हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर भी सरकार बनाने से चूक गई थी। भाजपा को 108 सीटें मिली थीं किन्तु वह बहुमत के आंकड़े से 9 सीटें कम प्राप्त कर पाई थी जिसके बाद 80 सीटें जीतने वाली कांग्रेस और 37 सीटें पाने वाली जनता दल (एस) ने मिलकर सरकार बना ली थी।

हालांकि यह गठबंधन लंबा नहीं चल पाया और पुनः भाजपा की सरकार बन गई किन्तु शहरी इलाकों में पैठ रखने वाली भाजपा को 2018 के चुनाव में राजधानी बेंगलुरु में तगड़ा झटका लगा था। वह जिले की 32 सीटों में से मात्र 11 सीटें ही जीत पाई थी। इसके अलावा बेलगाम, बीदर, बेल्लारी जिलों से भी पार्टी को तगड़ा झटका लगा था। इस बार पार्टी का विशेष फोकस उन जिलों पर है जहां 70 से अधिक विधानसभा सीटें आती हैं। इसके अलावा भाजपा नेतृत्व ने चुनाव प्रचार समिति की कमान मुख्यमंत्री बोम्मई को तथा चुनाव प्रबंधक समिति की कमान येद्दि की करीबी शोभा करंदलाजे को सौंपी है। बोम्मई जहां लिंगायत समुदाय को साधने का काम करेंगे वहीं शोभा के जिम्मे वोक्कालिगा समुदाय की जवाबदेही होगी। येदियुरप्पा को 'फ्री हैंड' दिया गया है और उनकी पसंद-नापसंद ही उम्मीदवारों का निर्णय करेगी।

इसके अलावा हाल ही में प्रस्तुत राज्य के बजट में भी सभी वर्गों को साधने का प्रयास किया गया है किन्तु तब भी राज्य में भाजपा सरकार की वापसी पर संशय है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध जीरो टोरलेंस की नीति के बाद भी राज्य में भाजपा नेताओं के हाथ भ्रष्टाचार से रंगे हुए हैं और हाल ही में करोड़ों के धन की जब्ती भी हुई है। विपक्ष इस मुद्दे को जमकर भुना रहा है और जनता में भी एंटीइन्कंबेंसी के साथ भ्रष्टाचार भी भाजपा की परेशानियां बढ़ा रहा है।

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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