राहुल गांधी ने कन्याकुमारी में एकनाथ रानाडे को भूलकर बड़ी गलती कर दी
तीन हजार पांच सौ सत्तर किलोमीटर चलने की ठान लेना। संकल्प पर अमल करने के लिए पैदल निकल पड़ना। पांच महीनों तक घर की छत से दूर कंटेनर में सोना जागना। आम लोगों के बीच रहना-खाना-पीना और भीड़ के साथ जीना। यह कोई गुड्डे गुड़ियों का खेल नहीं। इस लिहाज से राहुल गांधी ने बड़ा काम किया है। वह फिटनेस के मापदंड पर सटीक बैठते हैं। फिटनेस टेस्ट में उनको सौ में सौ नंबर मिलना चाहिए। आज की तारीख में उनके कद का कोई और राजनेता नहीं जो इस काम में उनकी दृढता के आसपास ठहरता हो।

उनकी इस महत्वपूर्ण तपस्या का नाम भारत जोड़ो यात्रा दिया गया है, जो फिलहाल तमिलनाडु की दो दिनों की दूरी पाटकर केरल पहुंच गया है। लेकिन यात्रा के आरंभ में ही राहुल गांधी से एक बड़ी चूक हो गई है। उसका जिक्र जरुरी है। वह कन्याकुमारी में माननीय एकनाथ रानाडे को याद करना भूल गए। भारतीयता के लिए माननीय रानाडे का किया काम आम नहीं बल्कि बेहद खास है। कन्याकुमारी के संदर्भ में तो वह कालजयी हैं। राहुल गांधी की ओर से उनका जिक्र तक नहीं किया गया। पदयात्रा करते हुए राहुल गांधी कन्याकुमारी से इतना आगे निकल गए हैं कि अब लौटकर भूल सुधार भी नहीं कर सकते।
यह बात अलग है कि भारत जोड़ो यात्रा के आरंभ में स्वामी विवेकानंद को ही भूल जाने का सोशल मीडिया पर केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी का गलत आरोप वायरल हुआ है। अब उनकी किरकिरी हो रही है। कांग्रेस पार्टी ने त्वरित जवाब में राहुल गांधी के हाथों स्वामी विवेकानंद की पूजा और प्रतिमा के प्रदक्षिणा का वीडियो जारी किया है। पूजा उपासना का वीडियो बता रहा है कि वह उतने कच्चे नहीं जितना कुछ लोग समझ लिया करते हैं। कन्याकुमारी के धार्मिक रीति रिवाज में उनसे कहीं कोई गड़बड़ी नहीं हुई है।
लेकिन सवाल है कि वह इस मौके पर माननीय एकनाथ रानाडे को कैसे और क्यों भूल गए या जानबूझकर भुलवा दिए गए? रानाडे के प्रति कृतज्ञ भाव दर्शाकर वह बड़ी राजनीतिक लकीर खींच सकते थे, जिसकी कमी यात्रा के बिगड़ते नैरेटिव को देखकर लग रही है। रानाडे के प्रति दर्शाए गए कृतज्ञता से शानदार संदेश निकलता। राष्ट्रीय एकता का प्रयास सधता। भारत जोड़ने का उद्देश्य ज्यादा प्रतिफलित होता।
एकनाथ रानाडे का संकल्प और इंदिरा गांधी का योगदान
स्वतंत्र भारत में जब कभी राष्ट्रीय एकता के प्रतीक और प्रतिमानों को समर्पित भाव से गढने वालों का जिक्र आता है, तो एकनाथ रानाडे का नाम सबसे आगे रखा जाता है। कन्याकुमारी के प्रतिस्थापना में उनका अनन्य योगदान है। वह स्वामी विवेकानंद में पूरी तरह से रम गए थे। रानाडे के प्रयासों का लोहा राहुल गांधी की दादी व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक ने सम्मानजनक तरीके से माना। फिर राहुल गांधी से रानाडे को भूलने की ग़ड़बड़ी कैसे हो गयी?
रानाडे का संकल्प था कि वो भारत के आखिरी छोर कन्याकुमारी में स्वामी विवेकानंद की मूर्ति लगायेंगे। इसे आज विवेकानंद रॉक मेमोरियल कहा जाता है। रानाडे के इस संकल्प को पूरा करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राजकीय कोष से पचास लाख रुपए का योगदान दिया था। कांग्रेस के पास 'भारत जोड़ो यात्रा' के आरंभ की घोषणा के समय इसे भुनाने का शानदार मौका था, जिसे गंवा दिया गया।
रानाडे ने कन्याकुमारी के विवेकानंद रॉक पर स्वामी विवेकानंद की भव्य प्रतिमा खड़ी करने के लिए प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के अलावा उस समय विभिन्न विचारधाराओं में गढ़े विपरीत राजनीतिक ध्रुव पर खड़े सभी महत्वपूर्ण लोगों से सहयोग राशि हासिल की थी। रानाडे के मिशन से प्रभावित होकर सहर्ष सहयोग करने वालों में जम्मू कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला भी शामिल थे।
राजनीतिक कटुता को भुलाकर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री कॉमरेड ज्योति बसु की धर्मपत्नी ने अपने खाते से इस काम के लिए सहयोग राशि दिया था। तमिलनाडु के डीएमके प्रमुख एम करुणानिधि तक ने राष्ट्रीय एकता के प्रतिमान गढने वाले राणाडे के ध्येय में शामिल होना सहर्ष स्वीकार किया। सभी विचारधारा और वर्गों को समाहित कर राष्ट्रीय एकता को प्रदर्शित करने वाला उन जैसा कोई दूजा तपस्वी आज तक नहीं हुआ है।
कन्याकुमारी और स्वामी विवेकानंद
तीन समुद्र से घिरे भारत की तलहटी में मौजूद भारतीय राष्ट्रीय बोध के लिए कन्याकुमारी का खास महत्व है। कन्याकुमारी हिन्द महासागर, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर का संगम स्थल है। तीन भिन्न सागर अपने विभिन्न रंगो से मनोरम छटा बिखेरती हैं। स्वामी विवेकानंद ने शिकागो धर्म संसद के ओजस्वी संबोधन से पहले 1862 में कन्याकुमारी की जिस शिला तक तैरकर पहुंचे और तीन दिनों की अनवरत साधना से ज्ञान प्राप्त किया वहां आज भव्य स्मारक है।
महामना एकनाथ रानाडे के अहिर्निश प्रयास से वहां बने भव्य विवेकानंद शिला स्मारक का उद्धाटन 2 सितंबर 1970 को राष्ट्रपति वी.वी. गिरी ने किया था। संयोग से राहुल गांधी के भारत जोड़ो यात्रा के आरंभ की तिथि स्मारक अनावरण के 52 वीं जयंती के आसपास की ही थी। इसी तारीख को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी विवेकानंद शिला स्मारक के अवलोकनार्थ क्न्याकुमारी आई थी। फिर भी सामान्य बुद्धि तक का इस्तेमाल कर राजनीतिक तौर पर इसका जिक्र क्यों नहीं किया गया, यह समझ से परे है।
जानबूझकर की गयी चूक?
हालांकि कांग्रेस के अंदरखाने की खबर रखने वालों की समझ है कि इस तिथि को भुनाने की कोशिश जानबूझकर नजरअंदाज की गई है। इसके पीछे राहुल गांधी की यात्रा के सूत्रधारों की वामपंथी सोच है। कांग्रेस को मध्यमार्गी समझने वालों में इस गड्डमड्ड की चर्चा आम है। कांग्रेस के पुराने खुर्राट नेता मानते हैं कि पार्टी की मौजूदा गतिविधियों की बागडोर वामपंथी समझ वाले सलाहकारों के हाथों में बंधी है। उससे कांग्रेस पार्टी को कई नई दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। वामपंथ जब दुनिया भर में हाशिए पर धकेला जा चुका हो, तब कांग्रेस में उसके प्रति बढता रुझान नुकसान का नया संकेत दे रहा है।
भाजपा ने 2014 में सत्ता में आने के लिए कांग्रेस मुक्त भारत का नारा गढा था। अब उसी से सीख लेते हुए आरएसएस मुक्त भारत की अवधारणा के साथ राजनीतिक सीढियां चढ़ना आसान नहीं है। कांग्रेस से ही निकले हुए केशव बलिराम हेगडेवार के हाथों गढा गया संगठन भारतीय समाज में गहरी पैठ बना चुका है। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की ओर से बार बार दावा किया जाता है कि वह कोई राजनीतिक नहीं बल्कि राष्ट्रवादी संगठन है। लिहाजा, भारतीय जनता पार्टी ही नही बल्कि संघ की राष्ट्रीयता के प्रशिक्षित लोग विभिन्न राजनीतिक दलों और वैचारिक समूहों में मौजूद हैं।
संघ 2025 में सौ साल पूरा करने वाला है। स्वर्ण जयंती वर्ष को शानदार तरीके से मनाने की तैयारी अभी से आरंभ है। ऐसे में संघमुक्त भारत की परिकल्पना उतनी ही खोखली है जितनी कि भारतीय जनता पार्टी की ओर से कांग्रेस मुक्त भारत की बात करना।
कौन थे एकनाथ रानाडे?
राहुल गांधी की यात्रा के आरंभ बिंदु कन्याकुमारी से एकनाथ रानाडे का अनन्य संबंध रहा है। वह आजादी के बाद भारतीयों में राष्ट्रीयता की बोध भरने वाले बेमिसाल पुजारी रहे। उनके राजनीतिक सफर का आरंभ भले ही राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़ा रहा पर देहावसान नागपुर से दूर वर्षों चेन्नई में रहकर हुआ। आपातकाल के दिनों में वह राजनीतिक बहस प्रतिबहस से अलग हटकर चुपचाप कन्याकुमारी में आकर बस गए। अपने व्यक्तित्व को इतना गोपनीय बना लिया कि सन् 1982 में उनकी मृत्यु के समय उनकी उपलब्धियों की तस्वीर उनके आसपास मौजूद लोगों के पास तक नहीं थी।
रानाडे मां भारती के बेजोड़ उपासक रहे। उन्होंने राष्ट्रीय एकता के लिए स्वामी विवेकानंद में पूरी तरह से रम जाने का निर्णय लिया। मां भारती के उपासक बने। देशव्यापी आह्वान करने में लग गए कि भारतीयों के मन में अब अन्य देवियों को किनारे रखकर एकमात्र मां भारती की ही जगह होनी चाहिए। उनकी प्रेरणा से देशभर में मां भारती के मंदिर बनने लगे।
ऐसे में अगर राहुल गांधी विवेकानंद रॉक मेमोरियल पर एकनाथ रानाडे का जिक्र भर कर लेते, तो उनके खिलाफ राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ समर्थकों के लिए हमला पाना आसान नहीं होता। लेकिन राहुल गांधी की टीम द्वारा की जा रही भूलों के कारण शुरु होने के साथ ही भारत जोड़ो यात्रा का मुद्दा राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ बनाम कांग्रेस पर सिमट गया है। जो कांग्रेस की समावेशी सोच के लिए शुभ संकेत नहीं है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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