Rahul Gandhi Case: 'मोदी समुदाय' की मानहानि और राहुल गांधी का मुकदमा
Rahul Gandhi Case: 23 जुलाई को गुजरात उच्च न्यायालय ने राहुल गांधी की उस पुनर्विचार याचिका को अस्वीकार कर दिया जिसमें उन्होंने मानहानि के मामले में दी गयी सजा पर रोक लगाने की अपील की थी। गुजरात उच्च न्यायालय ने याचिका पर सुनवाई के बाद यह कहा कि 'ऐसा कोई कारण नहीं है जिसकी वजह से यह माना जाये कि याचिकाकर्ता के प्रति अधीनस्थ न्यायालय के फैसले पर रोक न लगाने से कोई अन्याय होगा।' फिलहाल यह मुकदमा कानूनी पेचीदगी और प्रक्रिया के हवाले है। अब इस पर फैसला उच्चतम न्यायालय से ही संभावित है।
इस मामले को समग्रता में समझने की जिज्ञासा और जरूरत स्वाभाविक है। यहाँ हम समझने की कोशिश करते हैं कि भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 499 (मानहानि) के प्रावधानों के तहत मानहानि का मुकदमा किन शर्तों के पूरा होने पर बन सकता है। साथ ही राहुल गांधी पर लगे आरोपों पर संहिता के प्रावधानों के तहत विचार भी करते हैं।

13 अप्रैल, 2019 को कर्नाटक के कोलार में एक चुनावी सभा में राहुल गांधी के भाषण के एक अंश को लेकर उसी वर्ष यह मुकदमा दर्ज हुआ था। उन्होंने कहा था, "मेरे मन में एक सवाल है। इन सभी चोरों के नाम मोदी, मोदी, मोदी क्यों हैं? नीरव मोदी, ललित मोदी, नरेंद्र मोदी। थोड़ा और खोजने पर और भी बहुत सारे मोदी निकलेंगे।" उसके बाद सूरत पश्चिम से भाजपा विधायक पूर्णेश मोदी ने सूरत में आपराधिक मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया था। अपनी शिकायत में उन्होंने दावा किया कि राहुल गांधी के इस कथन से 'मोदी समुदाय की मानहानि हुई है।'
अब देखने की जरूरत है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 499 (मानहानि) के तहत क्या यह मुकदमा बनता है? शिकायतकर्ता ने कहा है कि इससे मोदी समाज की मानहानि हुई है। जबकि उक्त धारा में समुदाय, जाति या सम्प्रदाय का जिक्र न होकर 'व्यक्ति' की मानहानि का जिक्र है। धारा के अध्ययन से पता चलता है कि मानहानि किसी व्यक्ति की ही हो सकती है। यदि किसी व्यक्ति के कथन से किसी समुदाय की मानहानि हो तो उसके लिए दूसरे आरोप लगाये जा सकते हैं। कांग्रेस भी यह कहती रही है कि इस आधार पर मुकदमा बनता ही नहीं है। इसी से जुड़ा तर्क यह भी दिया जा रहा है कि जब उक्त भाषण में पूर्णेश मोदी का नाम नहीं लिया गया तो उनके नाम से शिकायत कैसे दर्ज हो सकती है?
यदि समुदाय की मानहानि का मामला बनता भी हो तो उक्त भाषण से 'सारे मोदी चोर हैं' का आशय निकालना भाषाई दृष्टि से विवेकपूर्ण नहीं है। भाषण के अंश में आये शब्द 'बहुत सारे मोदी और निकलेंगे' से भी 'सारे मोदी' का अर्थ नहीं निकलता है। राहुल गांधी ने सूरत कोर्ट में दर्ज कराए अपने बयान में यही स्पष्टीकरण दिया था कि उनके बयान का मतलब पूरे मोदी समुदाय से नहीं था।
मानहानि मुकदमे से जुड़ा एक तथ्य और है कि कानून के मुताबिक किसी व्यक्ति पर लगाया गया आरोप 'झूठा' हो तभी मानहानि का मुकदमा चलाया जा सकता है। नीरव मोदी, ललित मोदी पर तो हजारों करोड़ रुपये लेकर देश से भाग जाने के तथ्य सम्मत आरोप हैं। इसे कैसे 'झूठा' कहा जा सकता है? नरेंद्र मोदी पर तो उस समय राफेल डील को लेकर 'चौकीदार चोर है' के नारे खुलेआम राहुल गांधी लगा रहे थे। यदि मुकदमा इस सन्दर्भ में चला होता तो चल सकता था पर जिस मामले के जरिए राहुल गांधी पर मुकदमा चलाया गया वह तथ्यात्मक रूप से 'पूरे मोदी समुदाय' की मानहानि कैसे साबित होती है?
कानूनन मानहानि का आरोप तभी स्वीकार्य हो सकता है जब वह एक 'कथन' के रूप में रखा जाय, 'मेरी राय है' के रुप में नहीं। राहुल गांधी ने कोई 'कथन' न देकर एक सवाल की शक्ल में बात रखी थी। इस आधार पर भी मुकदमा चलाने की बात पर आम राय नहीं है, और विधिक बहसों में रियायत की जगह बन सकती है। इसके अलावा मानहानि के मामले में आरोपी के खिलाफ मामला चलाने की एक शर्त यह है कि ऐसा करते समय आरोपी की मंशा खराब हो। राहुल गांधी की मोदी समुदाय की प्रतिष्ठा को हानि पहुंचाने की कोई मंशा हो सकती हो, और उससे उन्हें कोई लाभ हो सकता हो, यह बात भी अब तक साबित नहीं हुई है। अतीत में मोदी समुदाय को लेकर ऐसा कोई पूर्वाग्रह उन्होंने कहीं प्रकट किया हो, ऐसा देखने में नहीं आया है।
मानहानि के मुकदमें में भारतीय दंड संहिता में यह व्यवस्था भी की गई है कि आरोपी तीन प्रावधानों के तहत अपने को बरी करने की मांग कर सकता है। पहला, सम्बंधित व्यक्ति पर की गई टिप्पणी प्रकाशित और सत्य हो, दूसरा, टिप्पणी जनहित में की गई हो और सत्य हो, तीसरा टिप्पणी करने वाला व्यक्ति जज या सांसद जैसा विशेषाधिकार प्राप्त हो। राहुल गांधी के मामले में देखें तो उन्हें उक्त प्रावधानों के तहत राहत मिल सकती है। तीसरा प्रावधान थोड़ा व्याख्या की मांग करता है जो इस प्रकार हो सकती है : संसदीय नियम है कि एक सांसद को संसद में बोलने पर कोई मुकदमा नहीं दर्ज हो सकता है। उक्त भाषण के समय राहुल गांधी सांसद थे पर भाषण संसद से बाहर था। यही भाषण यदि उन्होंने संसद में दिया होता तो कोई मामला नहीं बनता।
अब जबकि संसद की कार्यवाही का लाइव प्रसारण किया जाता है तो एक सांसद के संसद में बोलने या संसद के बाहर बोलने में कोई अंतर करना तर्कसंगत नहीं प्रतीत होता है। दोनों ही स्थितियों में उसके वक्तव्य लोकमानस तक पहुंचते हैं। ऐसे में संसद में बोलने से बात और उसका असर वही होता है जो संसद के बाहर बोलने से होता है। सुप्रीम कोर्ट में अगर ऐसे तर्क राहुल गांधी के वकील पेश करते हैं और उनके विशेषाधिकार पर बल देते हैं तो उन्हें रियायत की संभावना बन सकती है।
पर अब तो निचली अदालत और हाईकोर्ट का फैसला आ चुका है। भारतीय न्यायालय के फैसले ही अंत में निर्णायक होते हैं। उन्हें सबको स्वीकार करना पड़ता है। निश्चय ही राहुल गांधी को भी स्वीकार करना पड़ेगा। परन्तु सूरत के अधीनस्थ न्यायालय के फैसले और उस पर उच्च न्यायालय की मुहर के बाद भी मामले को केवल न्यायायिक रूप में नहीं देखा जा रहा है। यह फैसला विधिवेत्ताओं के साथ साथ राजनीतिक टीकाकारों द्वारा भी देखा जा रहा है। जो भी हो, यह मामला उतना छोटा सिद्ध नहीं होगा; न राजनीति के विद्यार्थियों के लिए और न ही कानून के विद्यार्थियों के लिए, जितना कि हाल के दिनों में मानहानि के मुकदमे देखे गए हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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