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Rabies Free Goa: गोवा ने दिखाई रेबीज से निपटने की राह

पर्यटन के लिए मशहूर गोवा ने पिछले हफ्ते एक नई पहचान हासिल की है। अब वह देश का पहला रेबीज मुक्त राज्य बन गया है। पिछले पांच सालों में वहां रेबीज का एक भी केस सामने नहीं आया है।

Rabies Free Goa become the first rabies free state in the country

Rabies Free Goa: शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो रेबीज के बारे में न जानता हो। लेकिन, दो ऐसी बातें हैं, जो सबको पता होनी चाहिए, पर बहुत कम लोग जानते हैं। एक, संक्रामक बीमारियों की वजह से होने वाली मौतों में सबसे ज्यादा रेबीज की वजह से होती हैं। और दूसरी यह कि अगर किसी को एक बार रेबीज हो जाए तो फिर दुनिया का कोई डॉक्टर उसे ठीक नहीं कर सकता।

इस बीमारी का इतिहास करीब साढ़े चार हजार साल पुराना है। लेकिन अभी तक मेडिकल साइंस इसका इलाज नहीं खोज पाया है। हर दस मिनट में दुनिया में एक व्यक्ति की जान ले रही, रेबीज कितनी खतरनाक है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया भर में हर साल करीब 59 हजार लोग रेबीज़ की वजह से दम तोड़ देते हैं। इनमें एक तिहाई से ज्यादा मौतें सिर्फ भारत में होती हैं। इनमें भी सबसे बड़ी संख्या 15 वर्ष से कम उम्र वाले बच्चों की होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार मनुष्यों में रेबीज के 99 प्रतिशत मामले कुत्तों के काटने की वजह से होते हैं। बाकी एक प्रतिशत बिल्ली या अन्य जानवरों के काटने की वजह से।

हर सौ मनुष्यों के पीछे एक कुत्ता

भारत की आबादी करीब 140 करोड़ है और हमारे देश में आवारा कुत्तों की संख्या 1.53 करोड़ से ज्यादा। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि एक कुत्ता कितने सारे इंसानों को रेबीज के जोखिम में डाल सकता है। और यह जोखिम कोई सांख्यिकीय अध्ययन से निकाला गया एक अनुमान नहीं है। बल्कि, एक खतरनाक सच्चाई है। 2019 से जुलाई 2022 तक, साढ़े तीन सालों में करीब 1.5 करोड़ लोग कुत्ते के काटने का शिकार हुए हैं। पिछले साल जनवरी से जुलाई तक देश में करीब 14.5 लाख लोगों को कुत्तों ने काटा। इनमें एक तिहाई से अधिक घटनाएं, सिर्फ तमिलनाडु और महाराष्ट्र (क्रमश: 2,51,510 व 2,31,531), इन दो राज्यों में हुई। जबकि कुत्तों की आबादी के लिहाज से शीर्ष पर उत्तर प्रदेश (2,059,261) और उड़ीसा (17,34,399) हैं।

जिस गोवा को रेबीज मुक्त राज्य होने का गौरव हासिल हुआ है, वहाँ कुत्तों की कुल संख्या 1,37,350 के आसपास है। यह पूरे देश की श्वान आबादी के एक प्रतिशत से भी कम है। इसलिए एक राष्ट्र की हैसियत से गोवा की यह उपलब्धि हमारे लिए संतोष या गर्व का विषय नहीं हो सकती। अलबत्ता, प्रेरणा का विषय जरूर हो सकती है।

सर्वव्यापी है रेबीज का वायरस

अंटार्कटिका को छोड़ कर, पृथ्वी के हर हिस्से में रेबीज का वायरस मौजूद है। इससे बचने के लिए हर साल अरबों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन इसका इलाज नहीं खोजा जा सका है। रेबीज जिस विषाणु परिवार का हिस्सा है, उसे लिसावायरस कहते हैं। इसमें इसके जैसे करीब एक दर्जन वायरस होते हैं।

रेबीज का वायरस संक्रमित जानवर की लार ग्रंथियों में मौजूद होता है। जब यह किसी को काटता है तो वायरस घाव के जरिये लार के साथ शिकार के शरीर में पहुँच जाता है।वायरस का असर होने के बाद शिकार व्यक्ति को पानी से डर लगने लगता है। उसके गले की मांसपेशियों को लकवा मार जाता है। फिर वायरस, सेंट्रल नर्वस सिस्टम पर अटैक करता है और मस्तिष्क और स्पाइनल कॉर्ड में पहुंच जाता है।

इसके बाद यह तेजी से बढ़ने लगता है और फिर मरीज की हालत तेजी से बिगड़ने लगती है। उसे पैरालाइसिस हो सकता है, वह कोमा में जा सकता है। और अंत में उसकी मृत्यु हो जाती है।

संक्रमण के चार से छह हफ्ते के भीतर इस बीमारी के विकसित होने का खतरा ज्यादा होता है। वैसे यह बीमारी काटने के दस दिन बाद से अगले आठ महीने के भीतर कभी भी हो सकती है। इस अवधि को इनक्यूबेशन पीरियड कहा जाता है। यह अवधि घाव के आकार, काटने वाले जानवर और शिकार व्यक्ति की इम्यूनिटी के हिसाब से अलग अलग हो सकती है। लेकिन, अगर जानवर के काटने के बाद अगले 24 घंटों के भीतर रेबीज रोधी इंजेक्शन लगवा लिया जाये तो इसके संक्रमण से बचा जा सकता है।

रेबीज के खिलाफ जारी है वैश्विक जंग

रेबीज की गंभीरता और असाध्यता और व्यापकता को देखते हुए उसके विरुद्ध वैश्विक अभियान जारी है। वर्ष 2007 से रेबीज के बारे में जन-जागरूकता उत्पन्न करने के लिए विश्व भर में 28 सितंबर को वर्ल्ड रेबीज डे' मनाया जाता है।

'मिशन रेबीज' इस खतरनाक वायरस के खिलाफ एक सशक्त पहल है। इसकी शुरुआत दस साल पहले यूके की चैरिटी संस्था 'वर्ल्ड वाइड वेटेरिनरी सर्विस' द्वारा की गयी थी। इस मिशन का उद्देश्य कुत्तों के काटने से होने वाले रेबीज संक्रमण को रोकना है। इसने सितंबर 2013 में भारत में पचास हजार कुत्तों को रेबीज रोधी टीका लगाने का लक्ष्य रखा था। पर यह कार्यक्रम आगे बढ़ता गया। और तब से अब तक यह संस्था साढ़े नौ लाख से ज्यादा कुत्तों को टीके लगा चुकी है। और 23 लाख से ज्यादा बच्चों को कुत्तों के काटने से बचने के लिए प्रशिक्षित किया है।

गोवा को रेबीज मुक्त राज्य का दर्जा दिलाने का काफी श्रेय मिशन रेबीज को भी जाता है। इसने 2014 में वहाँ अपना काम शुरू किया था और तीन साल के भीतर राज्य के सत्तर प्रतिशत श्वानों के टीकाकरण में सफलता हासिल की। साथ ही इसके द्वारा, समाज में, खासकर बच्चों में, इस बीमारी के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने के लिए कार्यक्रम चलाए गए। राज्य भर के स्कूलों में बच्चों को बताया जाता है कि कुत्तों से कैसे बचें और कुत्ता काट ले तो क्या करें।

2018 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 'एक रेबीज मुक्त विश्व' का लक्ष्य निर्धारित किया था। इसके अनुरूप अक्टूबर 2021 में भारत ने भी वर्ष 2030 तक देश में रेबीज से होने वाली मौतों को रोकने के लिए एक 'नेशनल इनिशिएटिव' लॉन्च किया है। इसमें पशु, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य को समग्रता में देखा जाता है। इसके मूल में यह विचार है कि अगर कुत्तों में रेबीज पर काबू पा लिया जाता है तो मनुष्यों में रेबीज अपने आप ही खत्म हो जाएगी। लेकिन इसके लिए कम से कम 70 फीसदी कुत्तों को टीका लगाना जरूरी है, ताकि हर्ड इम्युनिटी डेवलप हो सके और बीमारी को फैलने से रोका जा सके।

हालांकि देश में मौजूद डेढ़ करोड़ से ज्यादा श्वानों के बीच यह इम्युनिटी हासिल करने के लिए काफी श्रम, समय और सबसे बढ़कर राजनीतिक इच्छा शक्ति की जरूरत पड़ेगी। गोवा ने एक राह दिखाई है। आशा की जानी चाहिए कि बाकी राज्य भी इससे प्रेरणा लेकर भारत को रेबीज मुक्त बनाने में अपनी भूमिका ईमानदारी से निभायेंगे।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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