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कांग्रेस की कार्यसंस्कृति बदल रही हैं प्रियंका, उदाहरण बनी 16 घंटे रातभर मेहनत

नई दिल्ली। प्रियंका गांधी से कांग्रेस के राजनीतिक विरोधी क्यों डरते हैं? ऐसा क्या है प्रियंका में जो उन्हें दूसरे नेताओं से अलग करता है? धुर विरोधी बीजेपी हो या फिर विपक्ष के बीच भी सम्भावित सहयोगी- सबके लिए प्रियंका इतनी अहम क्यों हो गयी हैं? इन सवालों का जवाब तलाशने के लिए कुछ बातों पर गौर करना होगा। ताजा तरीन उदाहरण है प्रियंका का लगातार 16 घंटे तक रात भर जागते हुए अपने कार्यकर्ताओं के साथ मंथन करना। इससे पहले दिन भर चले रोड शो के बाद अगली सुबह पति रॉबर्ट वाड्रा के साथ जयपुर में रहकर लौटीं प्रियंका को फिर सुबह पति के साथ जयपुर के लिए रवाना होना था। कांग्रेस में इतनी मेहनत करने का जज्बा इंदिरा गांधी के बाद प्रियंका गांधी में ही दिखता है। कांग्रेस ही क्यों, दूसरे दलों में भी ऐसा जज्बा दिखाने वाले नेता कहां मिलते हैं।

बेहतरीन खिलाड़ी की तरह हैं प्रियंका में है पॉलिटिकल इनोवेशन

बेहतरीन खिलाड़ी की तरह हैं प्रियंका में है पॉलिटिकल इनोवेशन

प्रियंका राजनीति में औपचारिक रूप से अभी आई हैं मगर सक्रिय बहुत पहले से हैं। वह अपनी मां की राजनीतिक मेंटर हैं तो अपने भाई राहुल की भी मददगार रही हैं। चुनाव प्रचार करते हुए जिन्होंने प्रियंका गांधी को देखा है, समझा है वो जानते हैं और मानते हैं कि प्रियंका आम लोगों से घुलने-मिलने और उनका दिल जीतने में महारत हासिल रखती हैं। यह वह पृष्ठभूमि है जिसकी वजह से राजनीतिक महकमे में प्रियंका के कदम रखते ही भूचाल आ गया।

प्रियंका गांधी की तुलना आप उस खिलाड़ी से कर सकते हैं जिसके पास आक्रमण करने और रक्षा करने के इनोवेटिव तरीके होते हैं। ऐसे खिलाड़ी न सिर्फ अपनी टीम को मजबूती देते हैं बल्कि विरोधी टीम को तहस-नहस भी कर देते हैं। यही वजह है कि ऐसे खिलाड़ी के लिए अलग से रणनीति बनाने की जरूरत पड़ती है। बीजेपी में नरेंद्र मोदी ऐसे खिलाड़ी रहे हैं जिनके लिए समूचा विपक्ष रणनीति बनाता आया है। प्रियंका में भी वही बात दिखती है। आप गौर करें। प्रियंका के 16 घंटे तक कार्यकर्ताओँ के साथ रात भर के कार्यक्रम को अलग रखते हैं, तो दूसरा ताजा उदाहरण है उनका ट्विटर पर आना। अभी प्रियंका गांधी ने कोई ट्वीट नहीं किया है, मगर उनके फॉलोअर की संख्या जा पहुंची है 1 लाख 80 हज़ार और वह भी महज तीन दिन में। ट्विटर हैंडल खोलने का फैसला और इसका उपयोग किस तरह किया जाए जिससे अधिकतम फायदा हो, यह प्रियंका की रणनीति का हिस्सा है। जिस दिन वह ट्विटर पर कुछ लिखेंगी, उस दिन भी वह सुर्खियों में रहेंगी।

प्रियंका का ईजाद रहा है रोड शो

प्रियंका का ईजाद रहा है रोड शो

प्रियंका ने रोड शो के जरिए राजनीति में कदम रखा। उस रोड शो के जरिए जिसे उन्होंने खुद राजनीति में तब इजाद किया था जब उनकी मां सोनिया गांधी ने राजनीति में कदम रखा था। उन्हें हिन्दी नहीं आती थी। तब संवाद के लिए प्रियंका ने यह अनोखा रास्ता दिखाया था। आज अपने उसी इनोवेशन को प्रियंका राजनीति में अपने लिए इस्तेमाल कर रही हैं। इसका व्यापक असर देखने को मिला। लखनऊ में कांग्रेस का इतना बड़ा रोड शो हो सकता है, इस बारे में लोगों ने सोचना बंद कर दिया था।

प्रियंका के नाम पर प्रियंका सेना का बनना लगभग उस घटना की पुनरावृत्ति है जो कभी इंदिरा गांधी के जमाने में हुई थी। पिंक कलर का टी शर्ट पहने हुए इस सेना के लोगों ने प्रियंका का लखनऊ में स्वागत किया। इसी तर्ज पर महिलाओं की भी विंग जिन्दा होंगी। यानी प्रियंका के आने मात्र से वो पुरानी चीजें भी जीवित हो रही हैं जो कांग्रेस में लुप्तप्राय हो गयी थीं। कांग्रेस सेवा दल जैसा संगठन अब निष्क्रिय है। प्रियंका के आने से उम्मीद की जा सकती है कि इस संगठन का भी कायाकल्प होगा।

प्रियंका वोट बैंक साधने की कला में निपुण

प्रियंका वोट बैंक साधने की कला में निपुण

चुनाव में वोट बैंक को साधने की कला प्रियंका में आती है और अपने इनोवेशन में वह इसका ख्याल रखती हैं। सांगठनिक ही नहीं, राजनीतिक रूप से भी प्रियंका इनोवेशन करती दिख रही हैं। ख़बर है कि एसपी-बीएसपी को नये सिरे से वह महागठबंधन बनाने के लिए राजी करने जा रही हैं। अगर ऐसा होता है तो यूपी का राजनीतिक परिदृश्य ही बदल जाएगा। जो कांग्रेस हाशिए पर नज़र आ रही थी वह अचानक यूपी की सियासत में महत्वपूर्ण खम्भा बनी दिखेगी। इसका श्रेय पूरी तरह से प्रियंका गांधी को मिलेगा। ऊपर जिन बातों की चर्चा हुई हैं वह चंद खूबियां हैं जो प्रियंका में हैं और जिनका इस्तेमाल कर वह राजनीति में मजबूती से आगे बढ़ने वाली हैं। इन्हीं खूबियों की वजह से प्रियंका की धमक राजनीति में महसूस की जा रही है। बीजेपी में जो प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं या जिस तरीके से प्रियंका को निशाना बनाया जा रहा है वह उस प्रभाव की प्रतिक्रिया है। अब बात समझ में आ रही होगी कि विरोधी तो विरोधी, सहयोगी भी प्रियंका गांधी को क्यों गम्भीरता से क्यों ले रहे हैं।

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