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इंडिया गेट से: मंझधार में फंसे यशवंत सिन्हा

राष्ट्रपति चुनाव में बीजू जनता दल और वाईएसआर कांग्रेस का एनडीए के उम्मीदवार को समर्थन देना पहले से तय था। अगर एनडीए की प्रत्याशी द्रोपदी मुर्मू न भी होती तो भी इन दोनों दलों का एनडीए को समर्थन मिलना था। ये दोनों पार्टियां केंद्र सरकार के साथ किसी तरह का कोई टकराव नहीं चाहती। एनडीए प्रत्याशी की जीत तय थी, क्योंकि उन्हें सिर्फ 15000 अतिरिक्त मतों की जरूरत थी।

president election Yashwant Sinha stuck in political turmoil

ऐसे में विपक्ष को सर्वसम्मत तरीके से राष्ट्रपति चुनने का रास्ता साफ़ करना चाहिए था। कांग्रेस इस मनोस्थिति में थी। शुरुआती बातचीत के बाद कांग्रेस की भीतरी बैठकों में यह बात उभर कर सामने आ रही थी कि विपक्ष को उम्मीदवार नहीं उतारना चाहिए। शरद पवार, फारूख अब्दुल्ला और गोपाल कृष्ण गांधी ने भी इसीलिए हाथ पीछे खिंच लिए थे। शरद पवार ने खुद नवीन पटनायक और जगन मोहन रेड्डी से बात कर के उन्हें भांप लिया था। पवार ने यह बात कम्युनिस्ट नेताओं सीताराम येचुरी और राजा को बताई थी, जब वे उन्हें मिलने गए थे। ममता बनर्जी इस गलत फहमी में थी कि नवीन पटनायक और जग्गन मोहन रेड्डी से व्यक्तिगत संबंधों के चलते शरद पवार उन्हें अपने पक्ष में कर लेंगे।

शरद पवार ने जब विपक्ष का उम्मीदवार बनने से इनकार किया था, तब उन्होंने यह बात ममता बनर्जी को भी बताई थी कि राष्ट्रपति चुनाव में प्रत्याशी खड़ा करने का कोई फायदा नहीं। फारूख अब्दुल्ला भी अपने राजनीतिक अनुभव से जानते थे कि उन के उम्मीदवार बनने से विपक्ष में ही फूट पड जाएगी। गोपाल कृष्ण गांधी ने भी मना कर दिया था। जब ये सभी उम्मीदवार बनने से मना कर रहे थे, ठीक उसी समय भाजपा ने ममता बनर्जी समेत विपक्ष के सभी नेताओं से संपर्क कर के सर्वसम्मत प्रत्याशी की गुजारिश की थी।

तब भी विपक्ष के पास यह मौक़ा था कि वह भाजपा से सर्वसम्मत नाम पर चर्चा शुरू कर सकता था। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने राजनाथ सिंह से कहा था कि कांग्रेस तो प्रत्याशी खड़ा करने के मूड में नहीं है, लेकिन ममता बनर्जी नहीं मान रही। ममता बनर्जी के घोर मोदी विरोध ने विपक्ष को आज ऐसी जगह पर ला कर खड़ा कर दिया है, जहां से वह वापस भी नहीं जा सकती।

भाजपा ने द्रोपदी मुर्मू का नाम यशवंत सिन्हा के नाम की घोषणा से पहले ही घोषित कर दिया था। इसलिए पहली जुलाई को ममता बनर्जी का यह कहना बिलकुल गलत है कि अगर भाजपा अपने उम्मीदवार का नाम पहले बता देती, तो सर्वसम्मती से चुनाव हो सकता था। ममता बनर्जी अब अपनी झेंप मिटाने के लिए इस तरह की बात कह रही हैं। बीजू जनता दल और वाईएसआर तो राजनीतिक दृष्टी से केंद्र सरकार के साथ ही थी। द्रोपदी मुर्मू के आदिवासी होने से यूपीए में शामिल झारखंड मुक्ति मोर्चा और छतीसगढ़ की कांग्रेस पार्टी में खलबली मची है। झारखंड मुक्ति मोर्चा भले ही घोषणा न करे, लेकिन उसके विधायक और सांसद एनडीए उम्मीदवार को ही वोट देंगे। यह उसी समय स्पष्ट हो गया, जब यूपीए के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने रांची पहुंची मुर्मू का जोरदार स्वागत किया।

ढाई साल तक यूपीए में रही शिवसेना ने भी अपने सांसदों के दबाव में एनडीए प्रत्याशी के समर्थन का एलान कर दिया है। हालांकि जब राजनाथ सिंह ने उद्धव ठाकरे को मुर्मू के लिए समर्थन मांगने के लिए फोन किया था, तो दोनों में तल्खी हो गई थी क्योंकि राजनाथ सिंह ने उन्हें जानबूझ कर "सलाम वालेकुम" बोल दिया था। लेकिन अब मजबूरी में उद्धव ठाकरे को एनडीए प्रत्याशी का समर्थन करना पड़ा। सोमवार को शिवसेना के 18 में से 13 सांसद उद्धव की ओर से बुलाई गई बैठक में गए थे, इनमें से 11 ने उद्धव ठाकरे को उन के मुहं पर कह दिया कि वे एनडीए प्रत्याशी को वोट करेंगे। जबकि बैठक में नहीं गए पांच सांसद शिंदे गुट में होने के कारण पहले से ही द्रोपदी मुर्मू के समर्थन में थे। उद्धव गुट और शिंदे गुट के सभी शिव सेना सांसद और विधायक एनडीए उम्मीदवार को वोट करेंगे।

भले ही अब शिवसेना के सांसद संजय राउत यह कहें कि एनडीए में रहते हुए भी शिवसेना ने प्रणब मुखर्जी के मुकाबले में खड़े हुए एनडीए के उम्मीदवार पी.ए. संगमा का समर्थन नहीं किया था, इसी तरह एनडीए में रहते हुए ही भैरोंसिंह शेखावत की बजाए प्रतिभा पाटिल को समर्थन किया था, इसलिए शिवसेना का यूपीए में रहते हुए एनडीए प्रत्याशी मुर्मू का समर्थन करने का मतलब यह नहीं है कि शिवसेना यूपीए छोड़ रहा है। लेकिन नये राजनीतिक हालात में शिवसेना ने राष्ट्रपति चुनाव की दिशा तय कर दी है। अब द्रोपदी मुर्मू की दो तिहाही वोटों से जीत पक्की हो गयी है।

इस पूरे प्रकरण में अगर किसी की किरकिरी होनी है तो वो है पूर्व भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री रहे यशवंत सिन्हा की। राष्ट्रपति चुनाव में अब शायद इतना वोट भी हासिल नहीं कर पायेंगे कि उनकी उम्मीदवारी को सम्मानजनक लड़ाई कहा जा सके। ममता बनर्जी ने अपनी मोदी विरोध की जिद में यशवंत सिन्हा को ही महत्त्वहीन कर दिया है। अब वो ऐसे राजनीतिक मंझधार में फंस गये हैं, जिसमें डूब तो सकते हैं लेकिन तैर कर पार नहीं हो सकते।

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(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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