इंडिया गेट से: राज्यपाल की शक्तियों को सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर चुनौती
उद्धव ठाकरे खुद इस्तीफा देने के बाद भी हार नहीं मान रहे। वह यह कहते हुए फिर सुप्रीमकोर्ट पहुंच गए हैं कि राज्यपाल ने एकनाथ शिंदे को शपथ कैसे दिलाई और जल्दबाजी में सदन में स्पीकर का चुनाव और बहुमत साबित कैसे करवाया। कुल मिला कर राज्यपाल के अधिकारों को चुनौती दी गई है।

आज से 33 साल पहले भी राज्यपाल के अधिकारों को चुनौती दी गई थी। तब सुप्रीमकोर्ट को केस की सुनवाई में पांच साल लग गए थे और अंतत जो फैसला आया था, उस में राज्यपाल ही नहीं, राष्ट्रपति और यहाँ तक कि संसद के अधिकार भी सीमित हो गए थे।
तब हुआ यह था कि 1989 में कर्नाटक में एस. आर. बोम्मई के नेतृत्व में जनता दल की सरकार थी। विधायकों ने बड़े पैमाने पर दलबदल किया था, जिस पर राज्यपाल पी.वेंकटसुबैया ने सरकार भंग करके राष्ट्रपति शासन लगा दिया था। एस.आर. बोम्मई ने राज्यपाल को एक चिठ्ठी सौंपी थी, जिसमें विधायक दल की बैठक में उन्हें समर्थन दिया गया था। बोम्मई ने राज्यपाल से कहा था कि उन्हें सदन में बहुमत साबित करने का मौक़ा दिया जाए, लेकिन राज्यपाल ने उन्हें बर्खास्त कर दिया था।
बोम्मई ने राज्यपाल के फैसले को पहले हाईकोर्ट और फिर सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीमकोर्ट की 9 सदस्यीय संविधान पीठ ने पांच साल तक सुनवाई की। सुनवाई के दौरान 1988 में नगालैंड और 1991 में मेघालय सरकारों को बर्खास्त किए जाने की समीक्षा भी हुई। लोकतांत्रिक भारत में तब तक 82 मौकों पर राज्यपालों ने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करके चुनी हुई सरकारें भंग की थीं। इसलिए यह एक अहम संवैधानिक मसला था कि आखिर राज्यपाल चुनी हुई सरकारों को मनमर्जी से भंग कैसे कर सकता है। असल में केंद्र सरकारें अपने राज्यपालों का विरोधी दल की राज्य सरकारों को भंग करवाने के लिए बेजा इस्तेमाल कर रहीं थी।
तब सुप्रीमकोर्ट ने अपने फैसले में मौटे तौर पर चार बातें कहीं थी। पहली - सरकार के बहुमत का फैसला सदन में ही होगा, राजभवन में नहीं। दूसरी - राज्यपाल की सिफारिश पर राष्ट्रपति किसी विधानसभा को भंग नहीं कर सकते। तीसरी - जब तक संसद राज्यपाल की सिफारिश पर मुहर नहीं लगाती, तब तक विधानसभा निलंबित रखी जा सकती है। चौथी - संसद से दो महीनों के भीतर विधानसभा भंग करने का प्रस्ताव पास होना चाहिए, अगर दो महीने में प्रस्ताव पास नहीं होता, तो विधानसभा और पुरानी सरकार बहाल हो जाएगी। यानि राज्यपाल, राष्ट्रपति और संसद के अधिकार सीमित कर दिए गए।
लेकिन महाराष्ट्र का ताजा मामला एकदम अलग है। 22 जून को शिवसेना के 30 विधायकों और चार शिवसेना समर्थक निर्दलीय विधायकों ने राज्यपाल और डिप्टी स्पीकर को चिठ्ठी भेजी थी, जिस में कहा गया था कि 31 अक्टूबर 2019 को एकनाथ शिंदे को शिवसेना विधायक दल का सर्वसम्मत नेता चुना गया था और वे आज भी विधायक दल के नेता हैं। इस चिठ्ठी में उद्धव सरकार से समर्थन वापसी की बात नहीं लिखी गई थी, सिर्फ यह कहा गया था कि सरकार शिवसेना के सिद्धांतों के खिलाफ काम कर रही है।
यह एक तरह से शिवसेना में फूट का संकेत था। भाजपा के नेता देवेन्द्र फडनवीस ने बाकायदा राज्यपाल से मिल कर सरकार को अल्पमत में बताया और मुख्यमंत्री को बहुमत साबित करने के लिए कहने का आग्रह किया। इस पर राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को 30 जून को सदन में बहुमत साबित करने के लिए कहा था। मुख्यमंत्री ने बहुमत साबित करने की बजाए खुद इस्तीफा दे दिया।
अब राज्यपाल के पास नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू करने के सिवा कोई विकल्प नहीं था। यह बिलकुल वैसे ही था, जैसे नई विधानसभा का गठन हुआ हो। एकनाथ शिंदे ने शिवसेना के 39 और 10 निर्दलियों के समर्थन की चिठ्ठी राज्यपाल को सौंपी थी। फिर भाजपा के देवेन्द्र फडनवीस और एकनाथ शिंदे ने साझा सरकार बनाने का दावा पेश किया। दोनों का संख्या बल 155 बनता है, जो बहुमत से 11 ज्यादा था। राज्यपाल के पास उन्हें सरकार बनाने का न्योता देने के सिवा कोई और विकल्प नहीं था।
अगर विधानसभा में किसी दल को स्पष्ट बहुमत हो, तो राज्यपाल की शक्तियाँ सीमित हैं। उसे विधायक दल के नेता को ही मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलानी होगी। लेकिन अगर किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं हो, तो उसे अपने विवेक का इस्तेमाल करना होता है। इससे पहले के कुछ उदाहरण हमारे सामने हैं।
कुछ राज्यों के राज्यपालों ने विधानसभा में किसी दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने की स्थिति में विधानसभा में सबसे बड़े दल के नेता को सरकार बनाने के लिए आमन्त्रित किया है। कुछ राज्यों के राज्यपालों ने विधानसभा में सबसे बड़े दल के नेता को सरकार बनाने का आमन्त्रण न देकर उस व्यक्ति या गुट या संयुक्त मोर्चे के नेता को आमंत्रित किया है, जो विधानसभा में बहुमत जुटाने और उसे प्रत्यक्षतः दर्शाने में सक्षम हो। कुछ राज्यों के राज्यपालों ने चुनाव पूर्व के गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया है।
इस संबंध में 1998 में के. आर. नारायण ने एक मानक तय किया, जब उन्होंने खुद राजनीतिक दलों के नेताओं से बात कर के खुद यह पड़ताल कर ली कि वाजपेयी सदन में बहुमत साबित करने की स्थिति में हैं, तब उन्होंने वाजपेयी को सरकार बनाने का न्योता दिया। अब हम 2005 की घटना को याद करते हैं, जब बिहार विधानसभा के नतीजे किसी के पक्ष में नहीं थे। सत्ता का संतुलन राम विलास पासवान के पास था, जो केंद्र की यूपीए सरकार में मंत्री थे, लेकिन उनकी शर्तें ऐसी थीं कि कोई मानने को तैयार नहीं था। उनके विधायकों में फूट पड़ गई और आधे से ज्यादा विधायक राम विलास पासवान की इच्छा के खिलाफ एनडीए के नेता नीतीश कुमार को समर्थन देने को तैयार हो गए।
नीतीश कुमार 24 मई 2005 को सुबह सरकार बनाने का दावा पेश करने वाले थे कि राज्यपाल बूटा सिंह ने 23 मई 2005 की आधी रात के बाद विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर दी। केंद्र सरकार ने इसे मान लिया और विधानसभा भंग कर दी। बाद में सुप्रीमकोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने बूटा सिंह को फटकार लगाई थी और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। इस पृष्ठभूमि में क्या महाराष्ट्र के राज्यपाल एकनाथ शिंदे को सरकार बनाने का न्योता देने से इनकार कर सकते थे, खासकर तब जब शिंदे शिवसेना विधायक दल के चुने हुए नेता थे, शिवसेना के दो तिहाई विधायकों ने उन के समर्थन में चिठ्ठी सौंपी थी, भाजपा ने भी उन्हें समर्थन दिया था और शिवसेना भाजपा का चुनाव पूर्व का गठबंधन भी था। देखते हैं कि सुप्रीमकोर्ट अब नई परिस्थिति पर क्या निर्णय सुनाएगा।
(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)












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