कबीर की मजार, क्या मोदी को कराएगी 2019 की नैया पार?
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुरुवार को उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर के मगहर में पहुंचे और कबीर की मजार पर चादर चढ़ाई। पीएम मोदी ने इस मौके पर कबीर अकादमी का शिलान्यास किया और उसके बाद चिरपरिचित अंदाज में रैली को संबोधित किया। सद्भाव और समरसता की बातों के साथ पीएम मोदी ने यहां एनडीए सरकार की उपलब्धियां गिनाने के साथ ही विपक्ष पर भी जमकर हल्ला बोला। कबीर के दर पर पीएम मोदी की इस दस्तक को एक प्रकार से बीजेपी के 2019 चुनावी अभियान का आगाज माना जा रहा है। 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश से पीएम मोदी का चुनावी बिगुल बजाना कोई खास हैरानी की बात नहीं है, लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि आखिर कबीर की ही शरण में क्यों? राम-राम जपने वाली बीजेपी कबीर की मजार पर कौन सी दुआ मांग रही है? क्या कबीर की मोक्षस्थली मगहर से पीएम मोदी के मिशन 2019 का बेड़ा पार हो सकेगा? आइए डालते हैं इन्हीं सब समीकरणों पर एक नजर:

कबीर के जरिए ओबीसी वोटरों को हथियार बनाने की तैयारी
कबीर दलित, पिछड़े, शोषित और सामाजिक सौहार्द्र के सबसे बड़े मसीहा हैं। उपचुनावों में लगातार मिली हार के आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि बीजेपी से यही लोग नाराज हैं, क्योंकि 2014 लोकसभा चुनाव और 2017 विधानसभा चुनाव में मोदी का चेहरे देखने के बाद इन्हीं जातियों के लोगों ने माया-मुलायम को खारिज कर बीजेपी का दामन थामा था। दूसरी ओर यूपी में अब बुआ मायावती, भतीजे अखिलेश के साथ नया चुनावी गणित रचने जा रही हैं। यूपी में बनने जा रहे महागठबंधन की काट के लिए बीजेपी पिछड़े-दलितों पर दांव लगाना चाहती है। सत्ता के गलियारों में खबर यहां तक है कि बीजेपी ज्यादा से ज्यादा ओबीसी नेताओं को पार्टी में शामिल करने की तैयारी में जुटी है। इसी क्रम में यूपी में बसपा के बालचंद्र यादव के बीजेपी ज्वॉइन करने की भी चर्चा गरम है।

पीएम मोदी के नाम पर पिछड़ों को लुभाने की तैयारी में अमित शाह
पीएम मोदी अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से आते हैं। 2014 लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय पटल पर आने से पहले कोई सोच भी नहीं सकता था कि पिछड़ी जातियां, बीजेपी के समर्थन में आ सकती हैं, लेकिन नरेंद्र मोदी जैसे ही बीजेपी का सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरे, कहानी पलट गई। परिणाम यह हुआ कि यूपी में बीजेपी को बंपर सीटें मिलीं। 80 में से बीजेपी+सहयोगी को 73 सीटों पर विजय प्राप्त हुई। क्या मायावती और क्या मुलायम दलित और पिछड़ों की राजनीति करने वालों के आंगन सूने पड़ गए। इसके बाद 2017 यूपी विधानसभा चुनाव आए और बीजेपी पर एक बार फिर बंपर वोटों की बरसात हुई। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि मोदी का चेहरा दिखाकर अमित शाह ने दलित और पिछड़ों के बीच पैठ बनाई, लेकिन एक साल के भीतर-भीतर बीजेपी से वोटर रूठने लगा और गोरखपुर, फूलपुर, कैराना लोकसभा उपचुनाव में उसे करारी हार का सामना करना पड़ा। आखिर एक साल के अंदर ऐसा क्या हो गया कि जो वोटर बीजेपी के साथ आया, वो अचानक छिटक कैसे गया? तो जवाब है सीएम भगवाधारी योगी आदित्यनाथ।

योगी आदित्यनाथ की इन दो गलतियों के कारण यूपी में बार-बार हारी बीजेपी
योगी आदित्यनाथ के सत्ता में आने के बाद बीजेपी ने पंचायत चुनाव तो जैसे-तैसे जीते, लेकिन हर बड़े उपचुनाव में उसे हार का सामना करना पड़ा। इसके पीछे दो मुख्य वजह हैं- योगी आदित्यनाथ उन पिछड़ों को एड्रेस करते नहीं दिखे जो नए-नए बीजेपी के साथ जुड़े थे। वे मोदी का चेहरा देखकर बीजेपी के करीब आए थे, लेकिन भगवाधारी योगी उन्हें आकर्षित नहीं करते दिखे। दूसरी बड़ी वजह है- योगी आदित्यनाथ के नाम पर पार्टी में कलह। यूपी में एक सीएम और दो डिप्टी सीएम हैं। पार्टी के अंदर खींचतान है, इसी वजह से गोरखपुर, फूलपुर और कैराना में कम मतदान हुआ, जो बीजेपी की हार का बड़ा कारण बना। ऐसे में कहना गलत न होगा कि जमीन से जुड़े पार्टी के कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने में योगी अब तक तो नाकाम ही रहे हैं।

अब सही लाइन पर आ रहे हैं सीएम योगी आदित्यनाथ
पीएम मोदी ने पिछड़ी जाति के चायवाले की जिस छवि को अब तक भुनाया, योगी आदित्यनाथ उस चमक को और चमकाना तो दूर, उसे बरकरार भी नहीं रख सके। यही वजह है पीएम मोदी अब खुद यूपी के मैदान में उतरे हैं। उन्होंने अटल-आडवाणी और कल्याण सिंह की तरह राम नाम जपना समझना ठीक नहीं समझा, बल्कि यूपी में बनने जा रहे महागठबंधन की काट के लिए कबीर का सहारा लिया। सीएम योगी को भी अब निर्देश स्पष्ट है कि आखिर करना क्या है? इसकी बानगी हाल में तब देखने को मिली जब पिछले दिनों योगी ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और जामिया मिलिया विश्वविद्यालय में दलितों को आरक्षण न मिलने पर सवाल खड़ा किया।

मगहर के मेले में सियासी रंग घोलने इसी समय क्यों पहुंचे नरेंद्र मोदी
पीएम मोदी का कबीर के दर पर दस्तक देना, सीधे तौर पर करीब-करीब ढाई करोड़ कबीरपंथियों के दरवाजे खटखटाना है। बीजेपी इस सोशल इंजीनियरिंग में कितनी सफल रहती है, यह तो भविष्य बताएगा, लेकिन यह सच है कि बीजेपी ने 2019 का यूपी फार्मूला तैयार कर लिया है और पहला एक्शन कबीर की मजार से हो गया है। इस समय संत कबीर नगर के मगहर में कबीर दास का 620वां प्राकट्य दिवस समारोह चल रहा है। कबीर के दर्शन को समझने के लिए उनके अनुयायी नेपाल, पूर्वोत्तर के सिक्किम से लेकर उत्तर भारत के पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी प्रांत गुजरात, दिल्ली, जम्मू, छत्तीसगढ़, और मध्य प्रदेश सहित अन्य राज्यों से मगहर पहुंचे हुए हैं। ऐसे समय पर पीएम मोदी के कार्यक्रम का आयोजन बीजेपी के संदेश को दूर तक फैलाएगा। कबीरपंथियों में सबसे ज्यादा दलित और पिछड़े समुदाय के लोग शामिल हैं। मुसलमानों की भी एक बड़ी आबादी कबीर को मानती है और जुलाहा समाज इनके साथ जुड़ा है। गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों में भी कबीर पंथ का प्रभाव है। इसके अलावा छत्तीसगढ़, राजस्थान आदि जगहों पर भी कबीर का प्रभाव है।

इन आंकड़ों के चलते कबीर की शरण में जाने को मजबूर हुई बीजेपी
उत्तर प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव में बंपर वोट पाने के बाद एक के बाद एक उपचुनावों में पार्टी को हार मिली। कारण- पिछड़े-मुस्लिम मतलब सपा और दलित मतलब बसपा का साथ आ जाना। इन्हीं कारणों के चलते बीजेपी को गोरखपुर, फूलपुर और कैराना लोकसभा सीट गंवानी पड़ी। आंकड़े बताते हैं कि अगर कबीर का आशीर्वाद होता तो ये तीनों सीटें बीजेपी जीत सकती थी। डालें वोटों के गणित पर एक नजर:
गोरखपुर लोकसभा सीट: यहां 19.5 लाख वोटरों में से 3.5 लाख वोटर निषाद, करीब साढ़े तीन लाख मुस्लिम, दो लाख दलित, दो लाख यादव और डेढ़ लाख पासवान मतदाता हैं।
फूलपुर लोकसभा सीट: यहां 18 लाख वोटरों में से 17 प्रतिशत मतदाता पटेल (कुर्मी) समुदाय से आते हैं। इस संसदीय क्षेत्र में सबसे ज्यादा पटेल मतदाता हैं, जिनकी संख्या करीब सवा दो लाख है। मुस्लिम, यादव और कायस्थ मतदाताओं की संख्या भी लगभग इतनी ही है। लगभग डेढ़ लाख ब्राह्मण और एक लाख से अधिक अनुसूचित जाति के मतदाता हैं।
कैराना लोकसभा सीट: यहां करीब 17 लाख वोटर हैं, जिनमें मुस्लिमों की संख्या 5 लाख है, जबकि जाटों की करीब 2 लाख। दलितों वोटर लगभग 2 लाख हैं और ओबीसी भी करीब दो लाख हैं, इनमें गुर्जर, कश्यप और प्रजापति शामिल हैं।












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