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पीतांबरा पीठ: ‘राजसत्ता' की वह देवी जहां लगता है नेताओं का रेला

Pitambara Peeth: देश में ऐसे मंदिरों की कमी नहीं है जो अपनी चमत्कारिक शक्तियों के चलते श्रद्धा का केंद्र बने हुए हैं। मध्य प्रदेश के दतिया में प्रतिष्ठित माँ पीतांबरा शक्तिपीठ भी ऐसा ही श्रद्धा का केंद्र है जो राजनीतिक व्यक्तित्वों की महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति, उच्च पद प्राप्ति एवं गुप्त तथा राजनैतिक शत्रुओं के उच्चाटन के लिए विश्व-विख्यात है।

पार्षद, विधायक, सांसद, मंत्री तो क्या इस शक्तिपीठ में राजपरिवार, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री से लेकर शीर्ष स्तर के राजनेता 'राजसत्ता' की आस में माँ की आराधना के लिए आते रहे हैं।

Pitambara Peeth Story

दरअसल, माँ पीतांबरा को 'राजसत्ता' की देवी माना जाता है और भक्त इसी रूप में उनकी अर्चना करते हैं। यहां वर्षभर गुप्त हवन, यज्ञ, अनुष्ठान चलते रहते हैं। भारत में माँ बगलामुखी के तीन प्रमुख ऐतिहासिक मंदिर और शक्तिपीठ माने गए हैं जो दतिया (मध्यप्रदेश), कांगड़ा (हिमाचल) तथा नलखेड़ा, जिला शाजापुर (मध्यप्रदेश) में हैं और तीनों शक्तिपीठों का अपना महत्व है।

पीतांबरा पीठ पर 10 महाविद्याओं में से एक माँ बगलामुखी एवं द्वितीय माँ धूमावती साक्षात विराजमान हैं और पीले वस्त्र धारण करने के कारण इन्हें 'पीतांबरा माई' कहा जाता है। 1935 में एक सिद्ध संत "स्वामीजी महाराज" ने पीतांबरा पीठ पर माँ बगलामुखी देवी की स्थापना की थी तब यह स्थल जंगल था और यहाँ आने से स्थानीय लोग भी डरते थे क्योंकि यहाँ शमशान हुआ करता था।

जनश्रुति है कि यहाँ पांडवकालीन 'वन खंडेश्वर महादेव' मंदिर भी है जिसकी पूजा करने प्रतिदिन स्वयं अश्वत्थामा आते हैं। यह भी विशिष्ट है कि मंदिर के गर्भगृह में किसी को प्रवेश नहीं मिलता है। एक छोटी सी खिड़की से माँ के दर्शन किए जाते हैं। मान्यता है कि माँ पीतांबरा देवी दिन में तीन बार अपना रूप बदलती हैं।

यहाँ एक और अनोखी बात है कि भक्तों को माँ धूमावती के दर्शन आरती के समय ही होते हैं। शेष समय मंदिर के कपाट बंद रहते हैं। माँ पीतांबरा को शत्रु नाश की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। माँ की मूर्ति में भी माता शत्रु की जिव्हा पकड़े हैं। शास्त्रों के अनुसार भगवान परशुराम ने माँ की उपासना की थी जिसके पश्चात उन्हें शत्रुओं पर विजय प्राप्त हुई थी।

1962 में चीन युद्ध में 'शत्रुहंता' कहलाई शक्तिपीठ

दतिया स्थित माँ पीतांबरा शक्तिपीठ की विश्वव्यापी ख्याति 1962 में हुई और यहां की चमत्कारिक शक्तियों को 'शत्रुहंता' एवं 'राजसत्ता' की मान्यता प्राप्त हुई। दरअसल, 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया था। बिना किसी सामरिक तैयारी के सेना के जवानों के समक्ष चीन की चुनौती से पार पाना कठिन होता जा रहा था। विश्व के शक्तिशाली राष्ट्रों ने भी भारत-चीन युद्ध में हस्तक्षेप न करने की नीति बना ली थी।

प्रथम प्रधानमंत्री स्व. पंडित जवाहरलाल नेहरू इस स्थिति के चलते बड़े दु:खी थे। तभी उनके किसी विश्वासपात्र ने उन्हें सलाह दी कि वे इस शक्तिपीठ में हवन-अनुष्ठान इत्यादि करवाएं। धर्म-निरपेक्षता को मानने वाले नेहरू ने हताशा में ही सही, किंतु स्वामीजी से अनुष्ठान का अनुरोध किया और स्वामीजी ने देश की रक्षा के लिए 51 कुंडीय महायज्ञ का आयोजन किया। चमत्कार भी देखिए कि यज्ञ के 11वें दिन जब यज्ञकुंड में पूर्णाहूति डाली जा रही थी, चीन भारतीय सीमा से अपनी सेनाओं को वापस बुला रहा था।

उस कालखंड की यज्ञशाला आज भी मंदिर प्रांगण में है और उस पर लिखे शिलालेख में इस घटना का वर्णन भी है। इस घटना ने माँ पीतांबरा शक्तिपीठ को शत्रु-संकट के समय गोपनीय अनुष्ठानों का गढ़ बना दिया। 1965 और 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान भी यहां विशेष अनुष्ठान किए गए थे। स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने भी करगिल युद्ध के दौरान प्रधानमंत्री रहते हुए यहां यज्ञ-अनुष्ठान कराए थे। मंदिर समिति की मानें तो यहां भी यज्ञ की अंतिम आहुति के दिन पाकिस्तान पीछे हटने पर मजबूर हो गया था।

'राजसत्ता' की देवी माना जाता है माँ पीतांबरा को

राजनीतिक हस्तियों का माँ पीतांबरा शक्तिपीठ में आकर राजनीति में शीर्ष पर जाने की कामना करना और उसे प्राप्त भी करना कोई नई बात नहीं है। पहले गांधी परिवार और उसके बाद सिंधिया राजपरिवार ने यहां आकर राजनीति में शीर्ष पद प्राप्त किया, जिसके बाद राजनीति में सफल होने की कामना रखने वाले राजनेताओं के लिए यह शक्तिपीठ 'राजसत्ता' के केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित हो गया।

इंदिरा गांधी ने आपातकाल हटने के बाद 1979 में, 1980 में आम चुनाव के पहले तथा चुनाव जीतने और प्रधानमंत्री बनने के पश्चात माँ पीतांबरा के दर्शन किए थे। इससे पूर्व 1964 में स्व. जवाहरलाल नेहरू का स्वास्थ्य बिगड़ने के पश्चात वरिष्ठ कांग्रेसी नेता स्व. कमलापति त्रिपाठी ने उनके निमित्त विशेष अनुष्ठान करवाया था। 1985 में स्व. राजीव गांधी ने भी प्रधानमंत्री बनने के पश्चात इस शक्तिपीठ के दर्शन किए थे। 2018 में मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पूर्व राहुल गांधी भी यहां दर्शन कर चुके हैं।

सिंधिया राजपरिवार से राजमाता स्व. विजया राजे सिंधिया का जुड़ाव इस शक्तिपीठ से अनोखा था। सिंधिया राजपरिवार से जुड़े लोग बताते हैं कि विजया राजे सिंधिया नवरात्रि के 9 दिनों में यहां साधना करती थीं। सिंधिया राजपरिवार के लिए मंदिर परिसर में ही आवास केंद्र भी बना है। वर्तमान में सिंधिया परिवार मंदिर का ट्रस्टी भी है।
राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी नवरात्रि में नियमित तौर पर इसी शक्तिपीठ में आकर रहती हैं और आराधना करती हैं। स्व. माधवराव सिंधिया से लेकर ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके पुत्र महा आर्यमान सिंधिया की मां पीतांबरा देवी में असीम श्रद्धा है।

पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व राष्ट्रपति स्व. प्रणब मुखर्जी, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, गृहमंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती, शिवराज सिंह चौहान, स्व. अर्जुन सिंह, दिग्विजय सिंह ने राजनीतिक शिखर को छूने के लिए माँ पीतांबरा की आराधना की है। यहां आने वाले अन्य राजनेताओं की सूची तो और अधिक लंबी है। मुंबई बम विस्फोट कांड में नाम आने और केस चलने के दौरान अभिनेता संजय दत्त ने भी यहां माँ के दरबार में मत्था टेका था।

देश-प्रदेश का संभवतः ऐसा कोई चुनाव नहीं है जिसके लिए राजनीतिक दलों के मुख्य व्यक्तित्वों ने यहां पहुंचकर जीत का आशीर्वाद न मांगा हो। जिन नेताओं को देवी की कृपा से 'राजसत्ता' प्राप्त हुई है, उनके द्वारा समय-समय पर गुप्त अनुष्ठान भी करवाए जाते हैं। नेताओं की इसी आस्था के चलते माँ पीतांबरा पीठ को 'राजसत्ता की देवी' कहा जाता है और यहां आने वाले नेताओं के राजनीतिक जीवन को देखते हुए कहा यह उपमा गलत भी नहीं लगती।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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