Parliament Session: सांसद तैयारी करते नहीं, ऊपर से सरकार की गुपचुप रणनीति

जिन दिनों संसद की लाईब्रेरी पुराने ससंद भवन की पहली मंजिल पर हुआ करती थी, उन दिनों सांसद अक्सर संसद की पुरानी कार्यवाही के पन्ने पलटते, संविधान सभा के भाषण पढ़ते और राजनीतिक इतिहास की किताबें अलॉट करवाते दिख जाते थे। अटल बिहारी वाजपेयी, जार्ज फर्नांडिस, लाल कृष्ण आडवानी, जसवंत सिंह, कुमार मंगलम, सोमनाथ चटर्जी, मधु लिमए को नब्बे के दशक में मैंने खुद लाईब्रेरी में अक्सर देखा है।

शिवराज पाटिल के लोकसभा अध्यक्ष रहते 1993 में यह नई विशाल लाइब्रेरी बनी थी। अब यह लाईब्रेरी अक्सर वीरान पड़ी रहती है। पिछले कुछ समय में जब भी लाईब्रेरी में जाना हुआ तो जयराम रमेश के अलावा कभी कभार ही कोई सांसद दिखाई दिया। सांसद वहां जाते भी हैं, तो अक्सर अखबारों और पत्रिकाओं के पन्ने पलटते दिखाई देते हैं। किताबों वाले सेक्शन में जाते ही नहीं।

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सांसदों की पढ़ने लिखने की आदत खत्म हो रही है, जबकि संसद की लाईब्रेरी देश की दूसरी बड़ी लाईब्रेरी है। इसका असर सांसदों की बहस के गिरते स्तर में भी दिखाई देने लगा है। विषयों के गहन अध्ययन के बिना होने वाली बहसें हल्की फुल्की हो गई हैं, कम ही सांसदों के भाषण में गहराई देखने को मिलती है। बहस में भाग लेने के लिए भी अब इक्का दुक्का सांसद लाईब्रेरी में जाता है। राजनीतिक दलों के कर्मचारी ही सांसदों को मेटीरियल उपलब्ध करवाते हैं, वे उसी के आधार पर ही बोल कर खानापूर्ति कर देते हैं।

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महिला आरक्षण पर बहस के दौरान सांसदों की ओर से जो मुद्दे उठाए गए, उनमें से कुछ बहुत ही हास्यास्पद थे। कुछ ऐसे तर्क दिए गए, जिन्हें सुन कर सामान्य नागरिकों को भी आश्चर्य होता होगा। सोनिया गांधी ने महिला आरक्षण बिल को कांग्रेस का बिल बताने और अपने पति राजीव गांधी को श्रेय देने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि बिल पास होने से राजीव गांधी का सपना पूरा होगा। जबकि सच्चाई यह है कि राजीव गांधी के समय महिला आरक्षण बिल पर कांग्रेस में गहरे मतभेद थे, यहाँ तक कि पंचायती राज संस्थाओं में राजीव गांधी ने संविधान संशोधन कर के जब महिला आरक्षण लागू किया था, तो कांग्रेस में उस पर भी मतभेद थे। इसीलिए लोकसभा और विधानसभाओं में महिला आरक्षण का बिल प्रारूप भी राजीव गांधी सरकार के समय तैयार नहीं किया गया था।

अब अगर यह राजीव गांधी का व्यक्तिगत सपना था, तो उसे न राजीव गांधी ने खुद पूरा किया, न उनके बाद पांच साल चली कांग्रेस की नरसिंह राव सरकार ने पूरा किया, न दस साल चली मनमोहन सिंह सरकार ने पूरा किया। अगर वह 2010 में राज्यसभा में बिल पास करवाने की बात करती हैं, तो वह बिल 2014 में पन्द्रहवीं लोकसभा भंग होने के साथ ही अपनी मौत मर चुका है। यही दोनों गलतियां पहले दिन बिल पेश होते समय अधीर रंजन चौधरी ने भी की थीं, लेकिन उन्हें अगले दिन भी दोहराया गया।

कांग्रेस बिल का समर्थन कर रही है, लेकिन आज भी कांग्रेस के भीतर विरोध के स्वर उभर रहे हैं। कार्ति चिदंबरम ने बिल के उस हिस्से का खुलेआम विरोध किया है जिसमें कहा गया है कि अगली जनगणना के आधार पर डीलिमिटेशन किया जाएगा। कीर्ति चिदंबरम ने कहा है कि जनगणना के आधार पर डीलिमिटेशन नहीं होना चाहिए। जबकि यह बिल तो 2002 में ही संसद अनुच्छेद 82 में संशोधन पास करके पास कर चुकी है कि 2026 के बाद होने वाली जनगणना के बाद डीलिमिटेशन होगा। उससे पहले लोकसभा या विधानसभाओं की सीटें बढाने पर रोक लगाई गई थी। कार्ति चिदंबरम क़ानून के अच्छे जानकार हैं, लेकिन संसदीय इतिहास का ज्ञान तो संसद की लाईब्रेरी में बैठने पर ही मिलेगा। कांग्रेस समेत बिल का समर्थन करने वाले सभी विपक्षी दलों के सांसदों ने जनगणना के बाद आरक्षण का विरोध करते हुए 2024 के चुनाव से ही आरक्षण लागू किए जाने की मांग की है। लेकिन उन्हें किसने रोका है, वे 2024 के चुनाव में 33 प्रतिशत महिलाओं को टिकट देकर मोदी के नहले पर दहला मार दें।

संसद की नई इमारत में पहले ही दिन विपक्ष के नेता अधीर रंजन चौधरी भी कुछ ऐसी अज्ञानता में भटकते दिखाई दिए, जब उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण में गलती निकाली कि जिस सेंगोल को वह सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक बता रहे हैं, वह सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक नहीं है। उन्होंने इतिहास का वह पन्ना पढ़ कर सुनाया, जिसमें बताया गया था कि ब्रिटिश सरकार ने नेहरू से पूछा था कि भारतीय परंपराओं में सत्ता हस्तांतरण की कोई विधि है क्या। नेहरू ने इस बारे राजगोपालाचारी से पूछा तो उन्होंने चोल राजाओं की परंपरा को सामने रखा, जिसमें हिन्दू धार्मिक मठ अधीनम नए राजा को सेंगोल सौंपता था, जिसे राजदंड कहा जाता था, और जिसे सेंगोल सौंपा जाता था, उससे न्याय की अपेक्षा की जाती थी।

परंपरा के मुताबिक़ सेंगोल अधीनम मठ को सौंपना था, और अधीनम मठ के प्रतिनिधि ने जवाहर लाल नेहरू को उनके घर पर पूरे शानोशौकत के साथ सेंगोल सौंपा था। नेहरू की क्योंकि भारत के सांस्कृतिक इतिहास में कोई दिलचस्पी नहीं थी, इसलिए उन्होंने उसे एक कोने में रखवा दिया। उसी सेंगोल को दुबारा बनवा कर मोदी ने इसे लोकसभा स्पीकर की कुर्सी के साथ स्थापित करवाया है। कांग्रेस सत्ता हस्तांतरण के इस सनातन तरीके को न नेहरू के जमाने में मानती थी, न अब मानती है।

तमिलनाडु में सनातन विरोधी द्रमुक के साथ गठबंधन के चलते तमिल सनातन परंपरा का विरोध इस समय भी कांग्रेस की मजबूरी है। इसलिए अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि ब्रिटिश गवर्नर जनरल ने नेहरू को सेंगोल नहीं सौंपा था, इसलिए यह सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक नहीं है। अधीर रंजन अगर संसद भवन की लाईब्रेरी में कुछ देर बैठते तो उन्हें पता चलता कि अधीनम मठ के स्वामी ही नए राजा को सेंगोल सौंपते थे, बिटिश गवर्नर जनरल से सेंगोल लेने का सवाल ही नहीं था। प्राचीन भारतीय परंपराओं से ईसाई अंग्रेजों को क्या लेना देना था। उन्होंने तो नेहरू से कहा था कि वह अपनी परंपराओं का निर्वाहन करें, और नेहरू ने किया था।

समाजवादी पार्टी के उस समय के अध्यक्ष मुलायम सिंह ने 2010 में महिला आरक्षण बिल के खिलाफ मनमोहन सरकार गिराने की धमकी दे दी थी। उनकी बहू डिम्पल यादव उन्हीं के देहांत से खाली हुई मैनपुरी सीट के उपचुनाव से सांसद चुनी गई हैं। वह पढ़ी लिखी हैं, लेकिन उन्होंने सदन में कहा कि राज्यसभा और विधानपरिषदों में महिला आरक्षण लागू क्यों नहीं किया गया।

संविधान निर्माताओं ने ऊपरी सदन अनुभवी और परिपक्व नेताओं के लिए बनाए थे, ताकि अगर विधानसभा या लोकसभा से कोई गलती हो जाए तो ऊपरी सदन उसे सुधार ले। इन दोनों सदनों में इसीलिए किसी तरह का कोई आरक्षण का कोटा नहीं रखा गया था, सिर्फ अनुभव और परिपक्वता ही योग्यता रखी गई थी, यह अलग बात है कि अब जातीय संतुलन साधने के लिए इन सदनों का इस्तेमाल होने लगा है। लेकिन डिंपल यादव अगर संविधान सभा की बहस को पढ़ती, तो शायद वह यह सवाल न उठाती।

अब तो सांसदों का हाल यह हो गया है वे सदन की रूल बुक तक नहीं पढ़ते, इसलिए पीठासीन अधिकारी उन्हें अक्सर रूलबुक देखने को कहते हैं। नए जमाने का नया संसद भवन हाईटेक हो गया है, कागज की उपयोगिता खत्म हो गई है। सदन में कार्यवाही का एजेंडा सदन में सांसदों के सामने रखे टैबलेट की स्क्रीन पर उपलब्ध होता है। सांसदों को टैबलेट पर देखने की ट्रेनिंग भी दी गई है। लेकिन विशेष सत्र के पहले ही दिन उस समय भारी हंगामा हो गया, जब क़ानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम को पेश करना शुरू किया। हंगामा करने वाले सांसदों का कहना था कि न तो यह उस दिन के एजेंडे में था और न ही उन्हें बिल का प्रारूप उपलब्ध करवाया गया है। जबकि वह सांसदों के टैबलेट पर उपलब्ध था।

इस बिल को लेकर सरकार भी लुकाछिपी का खेल खेलती रही है। पहले तो तेरह दिन तक विशेष सत्र का प्रयोजन ही नहीं बताया गया, जब दबाव पड़ा तो 13 सितंबर को लोकसभा और राज्यसभा के वे चार लंबित बिल गिना दिए, जिनके लिए विशेष सत्र का बुलाया जाना हो ही नहीं सकता था। जिस प्रयोजन के लिए विशेष सत्र बुलाया गया था, वह लोकसभा और विधानसभाओं में महिला आरक्षण का था, जिसके प्रारूप को केबिनेट ने सत्र शुरू होने के बाद 18 सितंबर शाम को मंजूरी दी। अगले दिन 19 सितंबर को लोकसभा में बिल पेश किया जाना था, लेकिन सुबह छह बजे जारी एजेंडा सिर्फ 5 मिनट की कार्यवाही का था, जिसमें दो मंत्रियों ने टेबल पर कागजात रखने थे और महासचिव को उन 23 बिलों की सूचना देनी थी, जो पिछले सत्र में पास हुए थे, और जिन्हें राष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी थी।

सदन की कार्यवाही शुरू होने के बाद जब प्रधानमंत्री ने अपना भाषण शुरू किया, तब जाकर नया एजेंडा जारी किया गया, जिसमें अर्जुन राम मेघवाल की ओर से संविधान संशोधन बिल पेश किए जाने की जानकारी थी। लेकिन इसमें यह नहीं बताया गया था कि बिल किस बात का है। बिल का प्रारूप तो अर्जुन राम मेघवाल का भाषण शुरू होने के बाद सांसदों के टैबलेट पर आया। अंतिम समय में बिल की जानकारी सांसदों को मिलने से वे भी कोई तैयारी नहीं कर पाए और कोई प्रभावी भाषण नहीं हुआ।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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