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Parkash Singh Badal: अलगाववाद के फैलते अंधकार के बीच विदा हो जाना बादल का

यह दुर्योग ही कहा जाएगा कि जब पंजाब में एक बार फिर अलगाववादी ताकतें सिर उठा रही हैं, प्रकाश सिंह बादल का साया पंजाब से उठ गया है। वो पंजाब के एकमात्र ऐसे राजनेता थे जो संकट में सूबे को सही राह दिखा सकते थे।

Parkash Singh Badal passes away amid separatism in punjab

Parkash Singh Badal: आतंक की आग से झुलसते पंजाब में साल 1985 में राजीव गांधी सरकार ने इस उम्मीद के साथ विधानसभा चुनाव कराया कि किसानों और जवानों की धरती पर शांति लौटेगी। खेतों में खून बहने की बजाय फसलें लहलहा उठेंगीं और पंजाब एक बार फिर शांति के साथ समृद्धि का इतिहास रचेगा। तब कांग्रेस के खिलाफ राज्य में लोक असंतोष बहुत ज्यादा था। जाहिर है कि ऐसे में पंथिक राजनीति को जीत मिलनी ही थी। अकाली दल की भारी जीत हुई।

लेकिन तब तक गुरूचरण सिंह तोहड़ा का अकाली दल पर दबदबा कायम हो चुका था। अकाली दल के नवनिर्वाचित विधायकों ने सुरजीत सिंह बरनाला को अपना नेता चुना। उम्मीद की जा रही थी कि पहले दो बार मुख्यमंत्री रह चुके प्रकाश सिंह बादल को फिर से मौका मिलेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हालांकि उन्हें संतुष्ट करने के लिए उन्हें उप मुख्यमंत्री के पद का प्रस्ताव दिया गया लेकिन पंजाब के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड बनाने वाले प्रकाश सिंह बादल को यह प्रस्ताव अपमानजनक लगा। उन्होंने बरनाला के अधीन काम करने से मना कर दिया।

सुरजीत सिंह बरनाला को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद ही लगने लगा था कि पंजाब की पंथिक राजनीति के प्रमुख चेहरे अकाली दल में दरार बढ़ती जा रही है। इसका असर 1986 में ही दिखा, जब बादल ने तोहड़ा और बरनाला से अलग राह चुनी और अपना अलग अकाली दल बना लिया। बाद में मूल अकाली दल तकरीबन मृतप्राय हो गया, जबकि अकाली दल (बादल) पंजाब की राजनीति का प्रमुख चेहरा बन गया।

यह एक उदाहरण प्रकाश सिंह बादल की राजनीति को समझने के लिए पर्याप्त है। बादल जब तक रहे अपनी राह स्वयं बनाते रहे। हालांकि अब जबकि प्रकाश सिंह बादल का 25 अप्रैल 2023 को 95 साल की उम्र में निधन हो गया तब उनकी कमी जरूर पूरे पंजाब को खलेगी। उन्हें भविष्य में धारा से विपरीत चलने और अपने लिए राह बना लेने वाले नेता के रूप में ही जाना जाएगा। यह ठीक है कि साल 2022 का अपना आखिरी चुनाव बादल हार गए थे। इसके बावजूद वही ऐसे नेता थे, जिनके सामने पंजाब का दबंग से दबंग राजनीतिज्ञ सम्मान से झुक जाता था।

पंजाब के छह बार मुख्यमंत्री रहने वाले बादल को उनकी लंबी सार्वजनिक सेवा के लिए पद्मविभूषण सम्मान से पुरस्कृत किया गया था। स्थानीय राजनीति करने के बावजूद उन्होंने राष्ट्रीय एकता के खिलाफ जाकर राजनीति करने से परहेज किया। बादल की एक खासियत रही कि वे भले ही पंथिक राजनीति करते रहे, लेकिन वे राष्ट्रीय एकता और पंजाब की खुशहाली के पैरोकार रहे। उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार का विरोध तो किया, लेकिन वे अलगाववाद के मुखर विरोधी रहे। हालांकि एक बार उन्होंने संविधान की प्रति फाड़ दी थी और इसके लिए उन्हें जेल की हवा भी खानी पड़ी थी। लेकिन बाद में जब उन्हें लगा कि भूल हुई है तो माफी मांगने में हिचक भी नहीं दिखाई।

पंजाब की राजनीति शुरू से ही दो बुनियादी दलों के बीच बंटी रही है। एक तरफ कांग्रेस रही तो दूसरी तरफ पंथ की बात करने वाला अकाली दल। पंजाब के शहरी इलाकों पर पहले जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी का प्रभाव रहा। एक दौर में पंजाब के कुछ इलाकों में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का भी असर रहा। बादल का साथ पहली बार 1971 में जनसंघ ने दिया। तब से साल 2020 तक दोनों पार्टियों का गठबंधन रहा।

लेकिन इस गठबंधन में भारतीय जनता पार्टी को हमेशा छोटे भाई की भूमिका निभानी पड़ी। भाजपा को पंथिक अकाली दल के नेता बादल हमेशा अपने नीचे रखते रहे। कुछ वैसे ही, जैसे शिवसेना महाराष्ट्र में भाजपा को अपने सामने बौना बनाए रखती थी। महाराष्ट्र में भाजपा तो शिवसेना के प्रभाव से उबर गई है, लेकिन पंजाब में भाजपा लगातार पिछड़ती चली गई। नवजोत सिंह सिद्धू जैसे नेताओं ने बादल से अलग राह बनाने की कोशिश किया तो भाजपा ने ही साथ नहीं दिया और सिद्धू को भाजपा छोड़ कांग्रेस में जाना पड़ा।

लेकिन यहां एक सच यह भी है कि पंजाब में परिवारवाद की नींव को पुख्ता प्रकाश सिंह बादल ने ही किया। एक दौर में वे खुद मुख्यमंत्री थे तो उनके इकलौते बेटे सुखवीर सिंह बादल उप मुख्यमंत्री थे। उनकी बहू हरसिमरत कौर केंद्रीय मंत्रिमंडल की सदस्य और सांसद रहीं। हरसिमरत कौर के भाई भी विधायक और मंत्री रहे। पंजाब के परिवहन तंत्र, केबल तंत्र जैसे कई उद्योगों पर बादल परिवार का कब्जा होता चला गया। उसी दौर में बादल परिवार भ्रष्टाचार और अनाचार के लिए बदनाम भी रहा। इसका ही असर था कि 2017 के चुनावों में बादल परिवार की पार्टी अकाली दल की बुरी हार हुई। पंजाब में वह तीसरे नंबर की पार्टी बन गई। उस चुनाव को कांग्रेस ने जीता लेकिन दूसरे नंबर पर आम आदमी पार्टी पहुंच गयी।

राजनीति की दुनिया में उन्होंने जिस परिवारवाद को रोपा, उसकी अब और बड़ी अग्निपरीक्षा होगी। 2024 के आम चुनाव में शिरोमणि अकाली दल को बिना बादल के ही उतरना होगा। तब पता चलेगा कि शतकीय पारी पूरा होने से पांच साल पहले गुजरे बादल सीनियर के न रहने पर शिरोमणि अकाली दल की हैसियत क्या रह जाती है?

बहरहाल जब तक बादल रहे वो छाया बनकर न केवल अपनी पार्टी बल्कि संवेदनशील मामलों में पंजाब को भी छाया देते रहे। पंजाब के बंटवारे से पैदा हुए हरियाणा से भले ही राजनीतिक टकराव बना रहा लेकिन बादल के रहते ये टकराव सतह पर नहीं आ पाया। हरियाणा के देवीलाल परिवार से उनका गहरा संबंध था। 1966 में पंजाब और हरियाणा के बंटवारे के बाद पंजाब और हरियाण के बीच मुख्यरूप से दो मुद्दों पर अब तक विवाद चल रहा है। सतलुज-यमुना लिंक नहर के जरिए हरियाणा के आखिरी छोर तक पानी पहुंचाना और हिंदीभाषी क्षेत्र अबोहर-फजिल्का पर पंजाब का कब्जा। लेकिन जब तक पंजाब में बादल और हरियाणा चौटाला परिवार की सरकारें रहीं दोनों राज्यों ने इन दोनों मुद्दों को परे रख दिया था।

बादल को भारतीय राजनीति में मुफ्त सेवाओं का जन्मदाता भी कहा जा सकता है। 1997 में भाजपा के साथ गठबंधन सरकार बनाने के बाद बादल ने पंजाब के किसानों को मुफ्त बिजली देने की शुरूआत की थी। इसके बाद ही देश के अन्य राज्यों में ऐसी मांगें उठने लगीं। यह बात और है कि अगले यानी साल 2002 के चुनाव में इस मुफ्तनोशी का फायदा शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन को नहीं मिला और कांग्रेस ने बड़ी जीत हासिल की थी।

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    बढ़ती उम्र की वजह से बादल भले ही शारीरिक तौर पर कम सक्रिय थे, लेकिन उनका रहना शिरोमणि अकाली दल-बादल के लिए छत्रछाया के समान था। पंजाब की जनता का बड़ा हिस्सा उनका सम्मान करता था। परिवारवाद और भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद भी अलगाववाद के ताजा दौर में बादल उम्मीद थे। बादल अब नहीं हैं...उनका न रहना, पंजाब की उम्मीदों का छंट जाना है। पंजाब की राजनीति में बादल के निधन से उपजा शून्य कभी समाप्त नहीं होगा।

    यह भी पढ़ें: Parkash Singh Badal: आजादी के साथ शुरू हुई 'बादल' की राजनीति, जानें कुछ 'अनकहीं बातें'

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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