Pakistan Elections: लोकतंत्र के लिए मजाक बनता पाकिस्तान
Pakistan Elections: आखिरकार जनसंख्या में दुनिया के पांचवे सबसे बड़े देश पाकिस्तान में दिखावे के लिए ही सही किंतु लोकतांत्रिक चुनाव हुए।
आज हुए चुनावों में नेशनल असेंबली की 336 सीटों में से 266 सीटों पर मतदान हुआ जिन पर 5121 प्रत्याशी चुनावी मैदान में उतरे हैं।

पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान में अभी चुनाव नहीं होने हैं। इस चुनाव में गैर मुस्लिम घोषित 5 लाख अहमदियाओं ने चुनाव का बहिष्कार कर दिया है तो बलूचों के साथ पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों का मामला भी सुर्ख़ियों में है। हालांकि मतदान से 24 घंटे पूर्व हुए 2 धमाकों में 30 लोगों की मौत ने यह भी अंदेशा जता दिया था कि चुनाव प्रक्रिया शांतिपूर्ण तो नहीं रहने वाली।
पाकिस्तान से लगे अफगानिस्तान और ईरान के बॉर्डर सील हैं तो 6.50 लाख सेना के जवानों ने मोर्चा संभाल रखा था। पूरे पाकिस्तान में इंटरनेट बैन कर दिया गया है जिससे वहां की चुनावी गड़बड़ियों का पता बाहरी दुनिया को न चल सके।
बदहाल अर्थव्यवस्था सुधारने के नाम पर नवाज शरीफ, तो जनकल्याणकारी योजनाओं के नाम पर बिलावल भुट्टो चुनावी मैदान में हैं। वहीं इमरान खान की पार्टी कहीं नजर नहीं आ रही क्योंकि चुनाव आयोग ने उसका चुनाव चिन्ह ही जब्त कर लिया है। कुल मिलाकर पाकिस्तानी सेना की सरपरस्ती में हो रहे चुनाव से किसी को कोई खास उम्मीद नहीं है। पाकिस्तान में लोकतंत्र का मजाक बनता जा रहा है।
पाकिस्तान में लोकतंत्र के लिए संभवतः कोई स्थान नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि जब-जब पाकिस्तान में लोकतंत्र मजबूत होने की स्थिति में आया है, सेना अथवा न्यायालय ने उसे पटरी से उतार दिया है। पाकिस्तान के इतिहास का पहला तख्तापलट 1958 में हुआ था जब पाकिस्तान के पहले राष्ट्रपति मेजर जनरल सिकंदर मिर्जा ने प्रधानमंत्री फिरोज खान नून की सरकार को भंग करते हुए मार्शल लॉ लागू कर आर्मी कमांडर इन चीफ जनरल अयूब खान को देश की बागडोर सौंप दी थी।
हालांकि तेरह दिन बाद ही अयूब खान ने तख्तापलट करते हुए सिकंदर मिर्जा को ही राष्ट्रपति पद से हटा दिया था। इसके बाद तो मानो पाकिस्तानी सेना के मुंह में लोकतंत्र का खून ही लग गया था। 1977 में ऑपरेशन फेयर प्ले से नाम से मशहूर तख्तापलट में जनरल जिया उल हक ने प्रधानमंत्री जुल्फीकार अली भुट्टो को पद से हटा दिया था। 1988 के बाद से तो पाकिस्तान में कोई भी निर्वाचित प्रधानमंत्री अपना 5 वर्ष का कार्यकाल पूर्ण नहीं कर पाया है। 1988 में बेनजीर भुट्टो की सरकार को 1990 में राष्ट्रपति द्वारा भंग कर दिया गया।
भुट्टो सरकार के बाद नवाज शरीफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने किंतु 1993 में इस्तीफा देना पड़ा। उनके इस्तीफे के बाद एक बार पुनः बेनजीर भुट्टो प्रधानमंत्री बनीं किंतु एक बार पुनः 1996 में राष्ट्रपति ने उनकी सरकार भंग कर दी। इसके बाद फिर नवाज शरीफ प्रधानमंत्री बने किंतु सेना से उनकी पटरी नहीं बैठी और सैन्य प्रमुख परवेज मुशर्रफ द्वारा उनकी सरकार का तख्तापलट कर दिया गया।
इसके बाद नवाज शरीफ को जेल जाना पड़ा और छूटने के बाद उन्होंने लंबा समय निर्वासन में बिताया। इसी प्रकार 2008 में युसुफ रजा गिलानी को पाकिस्तान सर्वोच्च न्यायालय ने अवमानना का दोषी मानते हुए उन्हें संसद से अयोग्य करार दिया जिसे न्यायिक तख्तापलट की संज्ञा दी गई।
नवाज शरीफ (2013-2017) भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अयोग्य ठहराए जा चुके हैं जबकि इमरान खान (2018-2022) को सेना के इशारे पर लाए गए अविश्वास प्रस्ताव की आड़ में हटाया गया। हालांकि अब जाकर नवाज शरीफ के सेना से संबंध सुधरे हैं और वे पुनः पाकिस्तान के चुनाव में बतौर प्रधानमंत्री चेहरा खड़े हुए हैं। उनकी पारिवारिक पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज के प्रत्याशी इस समय पाकिस्तानी जनता की भी पसंद हैं।
नवाज की पार्टी के चुनाव चिन्ह टाइगर को देखते ही पाकिस्तानी अवाम शेर आया...शेर आया के नारे लगा रही है जिसके वीडियो सोशल मीडिया पर भी वायरल हैं। अब नई निर्वाचित सरकार को सेना और न्यायालय का कितना साथ मिलता है, यह किसी को नहीं पता।
लेकिन कभी अपनी कहर बरपाती तेज गेंदबाजी से विरोधियों के छक्के छुड़ाने वाले इमरान खान को उनके देश की सेना ने ही क्लीन बोल्ड कर दिया। पाकिस्तान तहरीके इंसाफ पार्टी बनाकर इमरान खान ने जो छवि पाकिस्तानी जनता और वैश्विक समुदाय में बनाई थी, सेना के चलते वह तार-तार हो चुकी है।
वर्तमान में अदियाला जेल में बंद इमरान को 4 क्रिमिनल केसों में क्रमशः 03 साल, 10 साल, 14 साल और 7 साल की सजा सुनाई गई है। इसके अलावा उन पर 150 से अधिक केस चल रहे हैं। उनकी न सिर्फ राजनीति बल्कि उनका पारिवारिक जीवन भी सेना के इशारों पर बर्बाद कर दिया गया है। उनका बुशरा बीवी से निकाह अमान्य करार हो गया है।
हालांकि इतना सब होने के बाद भी इमरान खान पाकिस्तान में लोकतंत्र के हिमायतियों के बीच खासे लोकप्रिय हैं किंतु चुनाव आयोग ने उनकी पार्टी का चुनाव चिन्ह बैट जब्त कर लिया है जिसके कारण उनकी पार्टी के प्रत्याशी 200 से अधिक भिन्न चुनाव चिन्हों पर निर्दलीय लड़ रहे हैं।
अब इससे जनता का उन्हें कैसा रिस्पॉन्स मिलता है और चुनाव जीतने के बाद भी क्या उनकी प्रतिबद्धता इमरान खान के प्रति रहेगी, यह बड़ा प्रश्न है। फिलहाल तो इमरान खान ही पाकिस्तान में सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनकर उभरे हैं। एआई की सहायता से तैयार हुए इमरान खान के वीडियो पार्टी कार्यकर्ताओं से साथ ही जनता को संदेश दे रहे हैं। उनकी पार्टी का सोशल मीडिया पर प्रचार चल रहा है।
पाकिस्तान में चुनाव इतने अनोखे ढंग से होते हैं कि वहां मूल मुद्दों की चर्चा ही नहीं होती। इस बार भी ऐसा ही कुछ देखने को मिला है। पाकिस्तान की 40 प्रतिशत से अधिक जनता अर्थात 9 करोड़ 50 लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे रहती है किंतु चुनाव में इस बात की कहीं कोई चर्चा ही नहीं है। कर्ज के बोझ तले दब चुका पाकिस्तान कर्ज पर कर्ज लेता जा रहा है। वर्ल्ड बैंक ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में बताया है कि वित्त वर्ष 2023 में पाकिस्तान इंटरनेशनल डेवलपमेंट एसोसिएशन (आईडीए) से सबसे ज़्यादा कर्ज लेने वाला देश है।
पाकिस्तान सरकार का कर्ज सालाना आधार पर 34.1 प्रतिशत वृद्धि के साथ अप्रैल, 2023 के अंत में 58.6 लाख करोड़ रुपये हो गया था। इसके बाद भी उसने आईएमएफ से 700 मिलियन डॉलर का कर्ज बेहद कड़ी शर्तों पर लिया। कर्ज और तंगहाली के अलावा पाकिस्तान तालिबान और ईरान की दोहरी चुनौती से भी जूझ रहा है।
पाकिस्तान सेना और आईएसआई की तकरार चरम पर पहुँच चुकी है तो वहीं ईरान के साथ उसका सीमा संघर्ष बमबारी पर आ गया है किंतु पाकिस्तान में चुनाव इस बात पर हो रहा है कि नवाज शरीफ सेना के साथ मधुर संबंध कब तक रख पाएंगे अथवा पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के बिलावल भुट्टो का भविष्य क्या होगा? इमरान खान क्या अब सारा जीवन जेल की सलाखों के पीछे काटेंगे या उनकी भी पर्दे के पीछे सेना से कोई डील हो जाएगी?
पाकिस्तान के चुनाव परिणाम कुछ भी रहें, न तो उसकी सेना पर कोई असर पड़ने वाला है और न ही अर्थव्यवस्था पर। पड़ोसी देशों के साथ भी संबंधों में फिलहाल कोई सुधार आता नहीं दिख रहा। ऐसे में पाकिस्तान में लोकतंत्र का झुनझुना पकड़ाकर जनता को पुनः मूर्ख बनाया जा रहा है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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