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Pakistan Economic Crisis: 75 वर्षों में ही पाकिस्तान का अस्तित्व संकट में क्यों?

एक ओर जहां स्वतंत्रता के 75 साल बाद भारत अमृत महोत्सव मना रहा है वहीं पाकिस्तान अपनी बदहाली का रोना रो रहा है। आखिर क्या कारण है कि पाकिस्तान का आर्थिक रूप से पतन हो गया?

Pakistan Economic Crisis how Pakistan destroyed in just 75 years

Pakistan Economic Crisis: भारत के विभाजन से पैदा हुए पाकिस्तान की भारत से कोई तुलना नहीं है। अगर तुलना करनी ही है तो उसकी तुलना बांग्लादेश से करनी चाहिए। इस लिहाज से देखें तो एक ओर जहां बांग्लादेश माइक्रो फाइनेंस और टेक्सटाइल उद्यम के नाम पर दुनिया का ध्यान आकर्षित करने में सफल रहा है, तो वहीं पकिस्तान अपनी कट्टरता, अस्थिर राजनैतिक नेतृत्व और आतंक समर्थक नीति के कारण बदहाली और कर्जदाताओं की गिरफ्त में जा रहा है।

पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति ऐसी थी कि वह भारत के साथ स्थायी मित्रता रख पूर्वी एशिया और पश्चिमी एशिया के बीच की व्यापारिक कड़ी बन सकता था लेकिन दुर्भाग्य से उसने वैमनस्यता का रास्ता चुनकर इस अवसर को गंवा दिया। शीत युद्ध के समय से ही युद्धग्रस्त देशों का प्रयोगस्थली बनता गया। शुरू से ही कर्ज और सहायता आधारित व्यवस्था के कारण आत्मनिर्भर पाकिस्तान की जगह आश्रित पाकिस्तान की नींव पड़ती गई और आज नतीजा सामने है।

मूल भारतवंशियों का ही देश पाकिस्तान आज अपनी नियति और गलत निर्णयों के कारण एक राष्ट्र के रूप में दिवालिया होने के कगार पर खड़ा है। इस चक्रव्यूह से निकलना उसके लिए मुश्किल दिख रहा है। एक राष्ट्र के रूप में भी उसके अस्तित्व पर संकट है क्योंकि सबको मालूम है कि जब कंगाली आती है तो बिखराव भी संभावित हो जाता है।

यह सोचने का विषय है कि पाकिस्तान की यह हालत क्यों हुई? एक तो सर्वविदित कारण है जिस चीज की बुनियाद ही जल्दबाजी और कुंठा में रखी गयी हो, उसकी राह कठिन होती है। यही हाल अंग्रेजों की कूटनीतिक चाल और जिन्ना की जिद्द से जन्में पाकिस्तान का हुआ है। जिन्ना तुरंत पैदा हुए पाकिस्तान को दिशा और दृष्टि देने से पहले ही चल बसे। जिन्ना को अपनी बीमारी का आभास था लेकिन उन्होंने दूसरी पंक्ति के नेताओं को खड़ा ही नहीं किया जो उनकी दिशा और दृष्टि पर काम करें। जबकि भारत में ऐसा नहीं था। महात्मा गांधी की मृत्यु के बाद भी पहली और दूसरी पंक्ति के नेताओं की एक लंबी कतार थी, जबकि पाकिस्तान में इसका अभाव था और वह शुरू से ही दिशाहीनता और दृष्टिहीनता का शिकार रहा।

राजनैतिक दुश्चक्रों का लगातार शिकार होने के कारण पाकिस्तान की आर्थिक नींव हमेशा से ही कमजोर रही। इस कमजोरी का फायदा उठा वहां एक तरफ जमींदार और पूंजीपति समाज मजबूत होता गया तो वहीं दूसरी तरफ आम पाकिस्तानी कमजोर। इन कुलीन जमींदार और पूंजीपति समाज के लिए आर्मी सदैव ही मुफीद रही इसलिए वह इसे पसंद करते रहे और इससे पाकिस्तान का राजनैतिक नेतृत्व कमजोर ही बना रहा।

पाकिस्तान में पेट भरने के लिए सबसे जरूरी आटा-दाल खरीदना भी मुश्किल होता जा रहा है। महंगाई चरम पर है। दूध, प्याज, नमक जैसे जरूरी सामान भी सपने सरीखे महंगे हो रहे हैं। बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में आटे से लदे ट्रक के पीछे भागते लोगों की तस्वीरें पाकिस्तान की जर्जर हो चुकी अर्थव्यवस्था की तस्वीर को बयां कर रही हैं। मीडिया रिपोर्टों की मानें तो हालात यह है कि दूध 250 रुपए लीटर, चिकन 780 रुपया किलो और पेट्रोल आसमान की ऊंचाई पर पहुंच गया है।

डॉलर की कमी और उसके महंगा होने के कारण बंदरगाहों पर बड़े पैमाने पर आयातित सामान जस का तस पड़ा हुआ है। कंपनियां उसे रिलीज नहीं करा पा रही हैं। इसलिए उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है और महंगाई बढ़ रही है। 2022 की भीषण बाढ़ का भी योगदान इस कमर तोड़ने में हैं और इससे उबरने में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को कई साल लग सकते हैं।

पाकिस्तान का वर्तमान आर्थिक संकट अदूरदर्शी नीतिगत निर्णयों के कारण भी है। इसमें आतंवाद पर भ्रम के साथ साथ गैर-विकासात्मक और आर्थिक रूप से अव्यवहारिक परियोजनाओं पर व्यापक खर्च को बढ़ावा देना भी शामिल है। ग्वादर-काशगर रेलवे लाइन परियोजना जैसी निरर्थक परियोजना और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के रोल आउट ने भी पाकिस्तान पर ऋण के बोझ को बढ़ा दिया है। आज हालात यह है कि पाकिस्तानी रुपया डॉलर के मुकाबले सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। पाकिस्तानी मुद्रा में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। विदेशी मुद्रा भंडार में लगातार गिरावट जारी है तथा बजट और व्यापार घाटा बढ़ता ही जा रहा है। हालत यह है कि उसे लगातार आर्थिक पैकेज की जरुरत पड़ रही है और इसके लिए वह लगातार झुक झुक कर समझौता करता जा रहा है। नए ऋण लेने और पुराने ऋण चुकाने के दुष्चक्र ने पाकिस्तान को एक 'ऋण जाल' में फंसा दिया है। अब तो ऋण देने में अंतरराष्ट्रीय समुदाय अनिच्छुक भी हो रहा है और इसे चीन और सऊदी अरब की जटिल शर्तों के साथ कर्ज लेने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

पाकिस्तान की यह हालात आज की गलतियों से नहीं है। इसमें दशकों की गलतियां शामिल हैं। बीच में पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक स्टेट बैंक ऑफ़ पाकिस्तान ने पाकिस्तानी मुद्रा का अवमूल्यन किया था। उसने यह सोच कर ऐसा किया कि इस अवमूल्यन से पाकिस्तान के निर्यात में वृद्धि होगी जिससे अर्थव्यवस्था मज़बूत होगी, लेकिन आत्मनिर्भर पाकिस्तान जैसी कोई नीति ना होने के कारण यह उल्टा साबित हुआ और उसका निर्यात लगातार गिरता चला गया।

दूसरी तरफ आत्मनिर्भरता ना होने के कारण आयात बढ़ता गया। फलस्वरूप चालू खाते के घाटे के साथ विदेशी मुद्रा का भंडार कम होता चला गया। मुद्रा में लगातार अवमूल्यन के समय पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक ने विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया ताकि मुद्रा के अवमूल्यन को कुछ हद तक रोका जा सके। लेकिन यह दांव भी उल्टा पड़ा और पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार जो पहले ही से कम था और कम होता चला गया। पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार आज केवल 3.19 बिलियन डॉलर के आसपास ही बचा है। इसलिए आज पाकिस्तान के सामने महंगाई के साथ साथ भुगतान संतुलन का संकट मुंह बाये खड़ा है।

आज अपने उल्टे दांव के कारण पाकिस्तान भयंकर आर्थिक संकट में फंसा हुआ है। आयात पर प्रतिबंध के बाद भी भुगतान संतुलन का संकट बना हुआ है और बढ़ रहा है। पेट्रोल और आटे के दाम आसमान छू रहे हैं। इसके अलावा, रक्षा खर्च में लगातार वृद्धि और आतंकवाद पर भ्रम और समर्थन की नीति, लगातार बढ़ता ब्याज और कर्ज पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को गर्त में ले जा रही है। पाकिस्तान की सुरक्षा और राजनीतिक चुनौतियों के कारण विदेशी निवेशक भी सशंकित है और इस कारण ने भी विदेशी मुद्रा भंडार को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। पिछले साल आई बाढ़ ने भी कोढ़ में खाज का काम किया और पकिस्तान की कमर तोड़ दी।

अगर पाकिस्तान की वर्तमान बदहाली के कारण खोजें तो इसके प्रमुख कारण हैं: भारत विरोध नीति, कमजोर राजनैतिक व्यवस्था व नेतृत्व, आर्थिक दृष्टि का अभाव, आतंकवाद पर भ्रम, भ्रष्टाचार, युवा बेरोज़गारी, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव, खराब स्वास्थ्य सुविधाएं, धन का केन्द्रीयकरण, प्राकृतिक आपदा और गंभीर होता ऊर्जा संकट है।

ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान इससे निकल नहीं सकता है। पाकिस्तान के पास इलाज है। पहला तो उसे भारत के साथ अपने संबंधों को सुधारना चाहिए। दोनों देशों के बीच बड़े भाई छोटे भाई का रिश्ता स्वीकार करते हुए इस भौगोलिक क्षेत्र में एक ताकत के रूप में विकसित होना चाहिए। दूसरा, पाकिस्तान को पश्चिमी देशों, रूस और चीन के द्वन्द की प्रयोगस्थली बनने की बजाय पूर्वी एशिया और पश्चिमी एशिया के बीच की आर्थिक कड़ी बनना चाहिए। वह बहुत ही रणनीतिक भौगोलिक स्थान पर है। यह भौगोलिक स्थिति उसके लिए वरदान है जिसे उसने खुद ही अभिशॉप में बदला हुआ है।

मजहबी शिक्षा से अलग हटकर कौशल और रोजगारपरक शिक्षा का ढांचा खड़ा करना चाहिए। बांग्लादेश की तर्ज पर पाकिस्तान दुनिया में MSME का सिरमौर बन सकता है अगर वह MSME और कुटीर कारीगरों पर ध्यान दे। पाकिस्तान भारत के साथ मिलकर आर्थिक समृद्धि ला सकेगा बशर्ते कच्छ और कराची के बीच खुला आवागमन और परिवहन हो।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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