Census of India: जनगणना को चुनावी एजेंडा बना रहा विपक्ष

अगर पहली अक्टूबर से जनगणना शुरू होती है तो यह मार्च 2024 में पूरी होगी, लेकिन इस बीच दस राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव हैं और मार्च 2024 में लोकसभा चुनाव की अधिसूचना भी जारी हो जाएगी।

Opposition parties making political agenda over Census of India

Census of India: क्या आपको पता है कि इस समय भारत की जनसंख्या कितनी है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में जो 135 करोड़ कहते हैं, वह सही आंकडा है या अनुमान है| अंग्रेजों के समय से भारत में हर दस साल बाद जनगणना होती है| पहली बार 1888 में हुई जनगणना में भारत की आबादी सिर्फ 25 करोड़ 38 लाख थी| तब पाकिस्तान और बांग्लादेश भी भारत का हिस्सा था| पिछली बार 2010 में जनगणना हुई थी, तब भारत की आबादी 121 करोड़ 8 लाख 54 हजार 977 थी| अगली जनगणना पहली अप्रेल 2020 से शुरू होनी थी, जो कोरोना की वजह से शुरू ही नहीं हुई| तबसे जनगणना शुरू करने की तारीख पांच बार बढ़ चुकी है| यानि नरेंद्र मोदी जो संख्या बताते हैं, वह अनुमानों पर आधारित है|

Opposition parties making political agenda over Census of India

अब ऑफिस ऑफ रजिस्ट्रार एंड सेंसस ने सभी राज्यों को 30 जून 2023 तक प्रशासनिक सीमाएं फ्रीज करने को कहा है| कानून के मुताबिक, किसी क्षेत्र की सीमाएं तय होने के 3 महीने बाद ही जनगणना शुरू हो सकती है| इसका मतलब है कि सरकार पहली अक्टूबर से जनगणना का काम शुरू करवाने का इरादा रखती है। अगर पहली अक्टूबर से जनगणना शुरू हो जाती है तो यह मार्च 2024 में पूरी होगी, लेकिन इस बीच दस राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव हैं और मार्च 2024 में लोकसभा चुनाव की अधिसूचना भी जारी हो जाएगी| इसलिए हो सकता है कि सरकार लोकसभा चुनावों तक जनगणना का काम ठंडे बस्ते में ही डाल दे|

भाजपा विरोधी राजनीतिक दल और उनसे जुड़े बुद्धिजीवियों का आरोप है कि सरकार जानबूझकर जनगणना टाल रही है, क्योंकि इस बार जाति आधारित जनगणना की मांग हो रही है| हालांकि मोदी सरकार जाति आधारित जनगणना की मांग ठुकरा चुकी है| इस बारे में केंद्र सरकार की ओर से गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने 10 मार्च 2021 को संसद में बयान दिया था| जिसमें उन्होंने कहा था कि जनगणना पहले की तरह ही करवाई जाएगी| अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के अलावा किसी दूसरी जाति का डेटा जुटाने की कोई योजना नहीं है|

उसी के बाद ही बिहार सरकार ने अपने खर्चे पर जनगणना करवाने का फैसला किया, जिसे करवाना शुरू भी कर दिया है| जाति आधारित जनगणना का विरोध भी हो रहा है, क्योंकि इससे एक दूसरे के खिलाफ नफरत का वातावरण पैदा होता है| जैसा कि अस्सी के दशक में मंडल कमीशन की रिपोर्ट के कारण हुआ था| जातिगत जनगणना का विरोध करने वालों का तर्क है कि अगर जातियों का पता लगाने का मकसद आबादी के आधार पर उन्हें आरक्षण देना है, तो यह गलत है, क्योंकि एससी एसटी और ओबीसी में भी ऐसे करोड़ों परिवार हैं, जो आर्थिक तौर पर करोड़ों सामान्य वर्ग के परिवारों से ज्यादा सम्पन्न हैं|

इसलिए आरक्षण का आधार अब आर्थिक आधार पर होना चाहिए| लेकिन विपक्षी दल कांशीराम की उस थ्योरी पर चल रहे हैं, जिन्होंने कहा था जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी| हालांकि कांशीराम का नारा राजनीतिक शक्ति के लिए था, जो मंडल कमीशन के बाद हर चुनाव में होता भी रहा है, क्योंकि राजनीतिक दल अब जातिगत समीकरण देख कर ही टिकट देते हैं| काशीराम का मकसद काफी हद तक पूरा हो चुका है| लेकिन विपक्षी दलों ने उनके नारे को वोट बटोरने के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने के लिए जातिगत आधार पर जनगणना की मांग उठाई हुई है| बिहार में जाति आधारित जनगणना शुरू करवा कर जदयू और आरजेडी ने बिहार में ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक की राजनीति में भी भूचाल ला दिया है| अब इन तीनों राज्यों में भी जातिगत जनगणना की मांग उठेगी, जो भाजपा को सूट नहीं करती| भाजपा को डर है कि समाज जातियों में बंटेगा तो हिन्दू वोट बिखरेगा|

उधर विपक्षी दलों का मानना है कि 2024 चुनाव से पहले जनगणना में जाति गणना शामिल नहीं होती है तो ओबीसी समुदाय में केंद्र सरकार के खिलाफ वातावरण बनेगा| जिससे विपक्षी दलों को फायदा होगा और भाजपा का एक बड़ा वोट बैंक खिसक सकता है| लेकिन आज की तारीख में केंद्र सरकार का जाति आधारित जनगणना करवाने का कोई इरादा नहीं है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर एक हलफनामे में भी कहा है कि जाति गणना संभव नहीं है| हिन्दुओं में दरार डालने की कोशिशों को नाकाम करने के लिए ही गृहमंत्री अमित शाह ने एलान किया है कि श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर के दरवाजे पहली जनवरी 2024 को खुल जाएंगे| अमित शाह के इस बयान से विपक्षी दल बेहद कुपित हैं, क्योंकि यह एक राजनीतिक रणनीति के तहत दिया गया बयान है| इसीलिए कुपित हो कर मल्लिकार्जुन खड़गे, शरद पवार, आरजेडी के जगदानन्द और अखिलेश ने कहा है कि अमित शाह मन्दिर के महंत हैं क्या|

वैसे इस समय अगर जनगणना होती है तो भारत की आबादी 141 करोड़ होने का अनुमान है| 2001 से 2011 के बीच भारत की आबादी 18 फीसदी के आसपास बढ़ी थी| संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि 2023 में भारत की आबादी चीन से ज्यादा हो जाएगी| 2050 तक चीन की आबादी 131 करोड़ तो भारत की आबादी 166 करोड़ होने का अनुमान है| स्वाभाविक रूप से बढ़ती जनसंख्या देश के सीमित संसाधनों पर अधिक बोझ डाल रही है और उसी कारण नागरिकों को छोटे समूहों में बांट कर राजनीति की जाने लगी है।

यह भी पढ़ें: Caste Census in Bihar: जाति जनगणना के बहाने राजनीतिक तिकड़म साधने की कोशिश

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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