Siddaramaiah Vs DKS: कांग्रेस के सिपहसलार, खोलेंगे ऑपरेशन लोटस का द्वार? 5 Point में कर्नाटक का राजनीतिक नाटक

Karnataka Political Crisis: कर्नाटक की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैय्या का दिल्ली दौरा और कांग्रेस हाईकमान के साथ होने वाली अहम बैठकों ने सत्ता परिवर्तन की अटकलों को तेज कर दिया है। चर्चा सिर्फ कैबिनेट फेरबदल तक सीमित नहीं है, बल्कि सवाल यह भी है कि क्या कांग्रेस कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन के बड़े फैसले की तरफ बढ़ रही है। सूत्रों के मुताबिक अगले 2-3 दिनों में तस्वीर काफी हद तक साफ हो सकती है।

दिलचस्प बात यह है कि यह सिर्फ मुख्यमंत्री की कुर्सी की लड़ाई नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर ताकत, धैर्य और राजनीतिक भविष्य की परीक्षा भी बन चुकी है। डीके शिवकुमार और सिद्धारमैय्या के बीच लंबे समय से चल रही खींचतान अब निर्णायक मोड़ पर दिखाई दे रही है। हाईकमान दोनों नेताओं से बातचीत कर रहा है और हर विकल्प पर विचार कर रहा है।

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कर्नाटक विधानसभा: मौजूदा गणित

  • कांग्रेस: 136
  • भाजपा: 63
  • जेडीएस: 18
  • एसकेपी: 1
  • निर्दलीय: 3
  • खाली सीटें: 2 (धारवाड़, हिरियूर)

224 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 113 है। 136 विधायकों के साथ फिलहाल कांग्रेस मजबूत स्थिति में दिखती है, लेकिन अंदरूनी खींचतान कई समीकरण बदल सकती है। कहा जाता है कि इसमें सिद्धारमैय्या के समर्थक विधायकों की संख्या 70-80 तक हो सकती है, वहीं शिवकुमार कैंप का दावा है कि 2023 में चुनाव ही डीके शिवकुमार के नाम पर लड़ा गया था और सभी विधायक उनके समर्थन में हैं। लेकिन राजनीति में जो कहा जाता है, वह हमेशा होता नहीं। अगर सभी विधायक डीकेएस के पक्ष में हैं तो फिर सीएम की कुर्सी पर सिद्धारमैय्या कैसे?

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संभावना 1: कैबिनेट में फेरबदल, सिद्धारमैय्या की कुर्सी सुरक्षित

इस वक्त कर्नाटक कैबिनेट में स्वीकृत 34 पदों में से 3 पद खाली हैं। पूर्व मंत्री बी. नागेंद्र को कर्नाटक महर्षि वाल्मीकि ST विकास निगम में कथित गबन के आरोपों के बाद त्यागपत्र देना पड़ा था, जबकि के.एन. राजन्ना को हाईकमान के फैसले के कारण मंत्रालय छोड़ना पड़ा था। तीसरी वैकेंसी मंत्री डी. सुधाकर के हाल ही में हुए निधन के कारण हुई है।

सिद्धारमैय्या अचूक राजनीतिक पैंतरों के लिए जाने जाते हैं। तीन सालों से 'अब गई कि तब गई सरकार' जैसी परिस्थितियों को उन्होंने अपनी रणनीतिक सूझबूझ से संभाल रखा है। इस बार भी वे आसानी से हथियार नहीं डालेंगे। अहिंदा वोटबैंक के साथ राजनीतिक हलकों में सिद्धारमैय्या की हनक और उनके बागी तेवर को कांग्रेस भी समझती है। सिद्धारमैय्या खाली मंत्री पदों के अतिरिक्त कुछ और अहम मंत्रालय शिवकुमार के शिविर को देकर यह तूफान भी टालने की कोशिश कर सकते हैं। कांग्रेस हाईकमान भी कैबिनेट विस्तार और फेरबदल का सुरक्षित रास्ता चुन सकता है। इससे असंतुष्ट विधायकों को जगह मिलेगी और सिद्धारमैय्या भी मुख्यमंत्री बने रहेंगे।

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संभावना 2: डीके शिवकुमार बनें नए मुख्यमंत्री

अगर आप एक आम कन्नड़िगा से पूछेंगे तो हर कोई यही कहेगा कि 2023 के चुनाव में कांग्रेस की वापसी का बड़ा कारण डीके शिवकुमार और उनकी सोशल इंजीनियरिंग रही थी। जहां देशभर में कांग्रेस के एक के बाद एक क्षत्रप टूट रहे थे, वहीं शिवकुमार ईडी के झटकों के बावजूद कांग्रेस के साथ चट्टान की तरह न केवल अडिग रहे, बल्कि वोक्कालिगा वोटबैंक को एकजुट किया और भाजपा से नाराज़ लिंगायत वोटबैंक में भी सेंध लगाई। लेकिन चुनाव परिणाम के बाद मुख्यमंत्री पद के दो और दावेदार उभरे - जी.के. परमेश्वरा और सिद्धारमैय्या - और सीएम की कुर्सी आखिरकार पूर्व मुख्यमंत्री की ओर खिसक गई।

सिद्धारमैय्या सीएम और शिवकुमार डिप्टी सीएम तो बन गए, लेकिन कांग्रेस के भीतर तभी से कथित "रोटेशन फॉर्मूले" की चर्चा होती रही है। बीच में दो बार तो ऐसा लगा कि अब नेतृत्व परिवर्तन होकर ही रहेगा, लेकिन हर मौके पर सिद्धारमैय्या अपनी राजनीतिक सौदेबाजी से कुर्सी बचाते रहे और डीके पार्टी के वफादार बने रहे। अब जबकि इस सरकार का आधे से ज्यादा कार्यकाल खत्म हो चुका है, सीएम और हाईकमान शिवकुमार कैंप के धैर्य की परीक्षा अभी भी ले रहे हैं।

अगर हाईकमान सत्ता संतुलन साधना चाहता है तो डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। इससे सरकार कांग्रेस की ही बनी रहेगी और 2028 के चुनाव के लिए पार्टी नए नेतृत्व में मजबूती से तैयारी कर सकेगी। हालांकि पार्टी ने कभी आधिकारिक तौर पर ऐसे किसी समझौते को स्वीकार नहीं किया और सीएम सिद्धारमैय्या अभी भी कह रहे हैं कि वे 5 साल का कार्यकाल पूरा करेंगे।

संभावना 3: सिद्धारमैय्या बागी हुए तो?

राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि सिद्धारमैय्या करीब 80 विधायकों का समर्थन जुटा सकते हैं। लेकिन यह संख्या बहुमत से अभी काफी दूर होगी। सिद्धारमैय्या पहले भी अलग राजनीतिक राह चुन चुके हैं। जनता पार्टी से अपने सियासी सफर की शुरुआत करने वाले सिद्धा लोकदल, जेडीएस और फिर अपनी अलग पार्टी बनाने के बाद कांग्रेस में आए हैं। किसी को यह नहीं भूलना चाहिए कि 2013 के चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद उन्होंने किस तरह वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे (तभी आलाकमान की पहली पसंद) का पत्ता काटकर सीएम की कुर्सी पर कब्जा जमाया था।

सिद्धारमैय्या की इसी बगावत का डर पार्टी को बार-बार शिवकुमार को समझाने पर मजबूर करता है। अहिंदा (अल्पसंख्यक, दलित और ओबीसी) वोटबैंक पर जबर्दस्त पकड़ रखने वाले सिद्धारमैय्या भाजपा की हिंदुत्ववादी राजनीति के दूसरी छोर पर हैं। ऐसे में इस बात की संभावना कम ही है कि वे बीजेपी के साथ गठजोड़ कर सरकार बना लेंगे, लेकिन राजनीति में किसी भी संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता। पूर्व मुख्यमंत्री येडियुरप्पा और पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा से उनकी नज़दीकी रही है। अगर कोई पतली सी उम्मीद भी बनी तो कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने के लिए भगवा ब्रिगेड साथ आ सकती है। लेकिन भाजपा का साथ लेकर सिद्धारमैय्या प्रदेश की राजनीति में आगे उसी तरह अपनी ज़मीन खो देंगे, जैसे जेडीएस ने खोई।

संभावना 4: डीके शिवकुमार - तारीख पर तारीख... कब तक!

डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री पद की महत्वाकांक्षा कभी छिपाते नहीं रहे। उन्होंने कई मौकों पर संकेतों में अपनी दावेदारी जताई है। यह सच है कि चुनाव जिताने में उनकी अहम भूमिका थी, लेकिन उसके बाद तीन खेमों में बंटे विधायकों में उनके हिस्से बहुमत नहीं आया। शिवकुमार के संघर्ष और लोकप्रियता से इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन सीएम की कुर्सी के लिए संख्याबल जरूरी होता है।

डीके को अभी तक केवल तारीख पर तारीख मिली है। पार्टी हर बार उन्हें उनकी वफादारी याद दिला देती है, लेकिन यदि डीके विद्रोही हो गए तो क्या होगा? सिद्धारमैय्या की तरह दक्षिणपंथी राजनीति से शिवकुमार का वैसा नैतिक विरोध नहीं रहा है। पिछले दो मौकों पर - एक बार महाकुंभ में योगी सरकार की तारीफ कर और दूसरी बार कोयंबटूर में सद्गुरु के आश्रम में गृहमंत्री अमित शाह के साथ शामिल होकर - उन्होंने पार्टी को चौंका दिया था। लेकिन मामला फिर से विधायकों की संख्या पर अटक जाता है।

वैसे दावा तो डीकेएस कैंप सौ से अधिक विधायकों का करता है, लेकिन यदि 50 के आसपास विधायक इनके पाले में खुलकर आ जाते हैं, तो कांग्रेस के भीतर बड़ा संकट पैदा हो सकता है। बीजेपी 63 सीटों के साथ सरकार में शामिल हो सकती है या बाहर से समर्थन दे सकती है। इससे बीजेपी को दो फायदे होंगे। अव्वल यह कि वह कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर पाएगी, दूसरा पार्टी का एक बड़ा क्षत्रप कांग्रेस से दूर हो जाएगा, मतलब आगे के चुनावों के लिए भी चुनौती कम हो जाएगी। हालांकि इस फैसले में भाजपा की वर्तमान सहयोगी जेडीएस को ऐतराज जरूर होगा। आखिर जेडीएस को 18 सीटों तक पहुंचाने वाले शिवकुमार ही हैं और पूर्व प्रधानमंत्री की पार्टी कभी न कभी डीके से वोक्कालिगा वोटबैंक की वापसी की उम्मीद जरूर करेगी। याद रहे कि डीके शिवकुमार वोक्कालिगा समुदाय के बड़े नेता हैं। यदि बीजेपी डीकेएस + एचडीके + लिंगायत का फॉर्मूला क्रैक कर लेती है, तो लंबे समय तक कांग्रेस को कर्नाटक की सत्ता से दूर रख सकती है।

संभावना 5: सबसे बड़ा दांव - विधानसभा भंग?

अगर हालात नियंत्रण से बाहर गए, तो सिद्धारमैय्या विधानसभा भंग करने की सिफारिश भी कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति शासन और मध्यावधि चुनाव का रास्ता खुल सकता है। हालांकि यह सबसे कठिन और जोखिम भरा विकल्प होगा। इसमें राज्यपाल की भूमिका अहम होगी और हाल के दिनों में राजभवन की जो अप्रत्यक्ष राजनीति रही है, उससे लगता नहीं कि महामहिम इसमें कोई देर लगाएंगे। विधानसभा भंग हुई तो शासन अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी के पास जा सकता है और आगामी चुनाव भी राष्ट्रपति शासन में हो सकते हैं।

फिलहाल कर्नाटक में असली सवाल सिर्फ यह नहीं कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा, बल्कि यह है कि कांग्रेस अपनी सरकार बचाने के लिए किस रास्ते पर जाएगी। अगले कुछ दिन तय करेंगे कि यह सिर्फ कैबिनेट फेरबदल की कहानी है या दक्षिण की सबसे बड़ी राजनीतिक पटकथा लिखी जाने वाली है।

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