One Nation One Election: एक राष्ट्र एक चुनाव के लाभ और संभावित चुनौतियां
One Nation One Election: अगस्त महीने का अंतिम दिन और सितंबर महीने का पहला दिन विपक्ष के लिए बहुत ही अचम्भित करने वाला प्रमाणित हुआ। 31 अगस्त को सरकार ने सूचित किया कि 18-23 सितम्बर तक संसद का पांच दिन का विशेष अधिवेशन बुलाया जाएगा। अभी विपक्ष अनुमान ही लगा रहा था कि यह विशेष अधिवेशन किस लिए बुलाया जा सकता है कि सरकार ने दूसरी अचम्भित करने वाली घोषणा एक सितंबर को कर दी। सरकार ने कहा कि पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया जाएगा जो भारत में "एक राष्ट्र एक चुनाव" (One Nation One Election or ONELECT) विषय पर विचार विमर्श कर सरकार को सलाह देगी।
इतना ही नहीं इसके अगले दिन 2 सितंबर को इस समिति के सदस्यों का भी ऐलान हो गया। इस समिति में चेयरमैन के रूप में रामनाथ कोविन्द के अलावा सदस्य के रूप में गृहमंत्री अमित शाह, कांग्रेस के सांसद अधीर रंजन चौधरी और पूर्व राज्यसभा सांसद गुलाम नबी आजाद को भी रखा गया है। अन्य सदस्यों के रूप में एनके सिंह, सुभाष कश्यप, हरीश साल्वे और संजय कोठारी हैं जो प्रशासन, संविधान, कानून के जानकार हैं। कानून मंत्रालय इस समिति को सभी आवश्यक सुविधा उपलब्ध करवायेगा और कानून मंत्री तथा कानून सचिव बतौर आमंत्रित सदस्य इस समिति में भी मौजूद रहेंगे।

हालांकि कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने समिति में शामिल न होने की बात कहकर राजनीतिक विवाद भी पैदा कर दिया लेकिन विधि मंत्रालय द्वारा दी गयी सूचना में इस समिति के लिए कोई समयसीमा तय नहीं की गयी है। सभी संबंधित पक्षों से सलाह मशविरा करके इस बारे में जल्द से जल्द अपनी संस्तुति देने के लिए जरूर कहा गया है।
वर्ष 1967 तक देश में लोकसभा और प्रदेश की विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ होते थे। सन 1951-52, 1957, 1962 और 1967 के लोकसभा चुनाव के साथ ही सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव हुए थे और यह हमेशा पांच वर्षों के अंतराल पर ही होते थे।
श्रीमती इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 1967 से यह सारा समीकरण बिगड़ गया क्योंकि उन्होंने प्रदेश की अनेक सरकारों को, जो उनकी पार्टी की नहीं थी, एक या दूसरा बहाना बनाकर गिरा दिया। विभिन्न राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारों को गिराने का परिणाम यह हुआ कि वहां मध्यावधि चुनाव हुए और एक साथ चुनाव का समीकरण बिगड़ गया। यह भी जानना बहुत आवश्यक है कि स्वर्गीय इंदिरा गांधी 17 वर्ष के अपने प्रधानमंत्री के कार्यकाल में 25 राज्य सरकारों को अपदस्थ कर चुकी थीं। इससे अधिक राज्य सरकारों को अपदस्थ करने का किसी का भी रिकॉर्ड नहीं है।
अब जबकि मोदी सरकार द्वारा इस बारे में विधिवत विचार विमर्श किया जा रहा है तो प्रश्न यह है कि "एक राष्ट्र एक चुनाव" क्यों होने चाहिए? यह प्रश्न और इसका उत्तर बहुत ही महत्वपूर्ण है। 1967 के बाद अधिकतर ऐसा हुआ है कि देश में हमेशा ही कहीं न कहीं चुनाव चलते रहते हैं। पिछले तीन दशकों से तो स्थिति यह है कि प्रतिवर्ष लगभग चार पांच विधानसभाओं के चुनाव होते हैं, जिसमें काफी धन का अपव्यय होता है।
सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के एक आकलन के अनुसार 2019 के लोकसभा चुनाव में लगभग 60,000 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। यदि विधानसभा के चुनाव भी इसी के साथ होते तो लगभग इसी खर्चे में लोकसभा और सभी विधानसभाओं का चुनाव हो जाता। लेकिन क्योंकि विधानसभा का चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ नहीं होता इसलिए इतना ही या इससे अधिक रुपया विधानसभाओं के चुनाव पर भी खर्च होता है।
60,000 करोड़ रुपए कोई छोटी धनराशि नहीं है। इसका अनुमान हम इस तरह लगा सकते हैं कि दुनिया के कुल 201 देशों में से 50 देश ऐसे हैं जिनका कुल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) इतना नहीं है। मध्य एशिया के दो मध्यम आय के देशों, किर्गिस्तान और ताज़िकिस्तान की कुल जीडीपी इस राशि के लगभग बराबर है।
60,000 करोड़ रुपए को अगर हम अमेरिकी डालर में बदलें तो यह लगभग 8 बिलियन (खरब) अमरीकी डॉलर आता है। इतनी बड़ी राशि हम पांच साल में दो-दो बार खर्च करते हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि हम विधानसभा और लोकसभा का चुनाव एक साथ नहीं करा सकते।
भारत जैसे विकासशील देश के लिए इस धन के महत्व का अनुमान इस बात से लगाइए कि अमेरिका के राष्ट्रपति के पिछले चुनाव में 6.5 बिलियन डॉलर खर्च हुए। अगर हम इसे रुपए में बदले तो यह 48,530 करोड़ रुपए आता है। मतलब यह हुआ कि हमारे देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव में जो पैसा खर्च होता है वह अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनाव से 25% अधिक होता है।
संवैधानिक स्थिति
संविधान में "एक राष्ट्र एक चुनाव" के लिए कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है जिसके अंतर्गत लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराए जाने की बाध्यता हो। ऐसा लगता है कि संविधान निर्माताओं ने यह बात सोची ही नहीं थी कि ऐसा भी हो सकता है कि विधानसभा और लोकसभा के अलग-अलग समय पर चुनाव कराने पड़ें।
संविधान के अनुच्छेद 83 (2) में लोकसभा के कार्यकाल से संबंधित विवरण है और उसकी कालावधि पांच वर्ष निर्धारित की गई है। इसी प्रकार अनुच्छेद 172 (1) कहता है कि राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल पांच वर्ष के लिए होगा जब तक कि उसे समयपूर्व भंग न किया जाए। लेकिन कहीं यह नहीं लिखा है कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ-साथ होंगे।
क्या हैं चुनौतियां?
एक राष्ट्र एक चुनाव में आने वाली कुछ संवैधानिक चुनौतियां हैं, जैसे अनुच्छेद 356 कहता है कि बिना वैध कारण के किसी भी विधानसभा को भंग नहीं किया जा सकता। इस कारण जिन विधानसभाओं में विपक्षी दलों की बहुसंख्या है या जहां विपक्ष की सरकारें हैं वहां पर बड़ी अड़चन आ सकती है। उन्हें यह लग सकता है कि यह भारतीय जनता पार्टी का एक षड्यंत्र है जिसके अंतर्गत उनकी सरकार के कार्यकाल को छोटा किया जा रहा है।
इसके लिए आवश्यक है कि इस पर "एक राष्ट्र एक चुनाव" के लिए एक राष्ट्रव्यापी सहमति हो जिसमें सभी विपक्षी दल इस बात पर सहमत हों कि उनकी विधानसभा का जो भी कार्यकाल बचा है उसे समाप्त कर दिया जाए और लोकसभा के साथ ही उनके चुनाव कराए जाएं। यदि ऐसा हो जाता है तो लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हो सकते हैं।
परंतु चुनौती यहीं समाप्त नहीं होती। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि मान लीजिए किसी कारणों से किसी विधानसभा में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिलता या पार्टियां टूट जाती है जिसके कारण विधानसभा को भंग करना पड़ता है तो उस स्थिति में क्या होगा? ऐसी स्थिति में क्या किया जाए कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ ही हों। यदि सभी पार्टियों में इच्छाशक्ति हो और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें तो यह संभव है। इसका उपाय यह हो सकता है कि अविश्वास प्रस्ताव तब तक स्वीकार न किये जाएं जब तक अविश्वास प्रस्ताव लाने वाला समूह यह प्रमाणित न कर दे कि उसके पास सरकार बनाने और चलाने का विकल्प है।
दूसरा, यदि सरकार बिना अविश्वास प्रस्ताव के अपने आप ही गिर जाय तो वहां शेषावधि के लिए राज्य को या तो राष्ट्रपति शासन में रखा जाय या सर्वदलीय सरकार बनायी जाय। इन सबके लिए गहन विवेचन, सहमति और संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता होगी।
एक राष्ट्र-एक चुनाव के लाभ
सबसे बड़ा लाभ तो यह होगा कि राष्ट्र को "पॉलिसी पैरालिसिस" से बचाया जा सकता है, क्योंकि बार-बार जब चुनाव होते हैं तो चुनाव संहिता लागू होने के कारण नीतिगत निर्णय नहीं लिए जा सकते जिससे विकास के कार्य में बाधा पड़ती है। दूसरा, चुनाव आयोग को भी प्रतिवर्ष मतदाता सूची का नवीनीकरण करना पड़ता है जिससे जल्दबाजी में कई बार ठीक तरीके से नवीनीकरण नहीं होता और काम भी बढ़ता है। इससे भी छुटकारा मिलेगा। तीसरा, आर्थिक दृष्टि से सबसे अधिक महत्वपूर्ण होगा कि जो राष्ट्र के ऊपर इतना बड़ा बोझ आता है वह कम होगा और हमें लगभग 60,000 करोड रुपए या आठ बिलियन डालर या इससे अधिक की बचत होगी।
इसके साथ ही चुनाव के दौरान होनेवाले आर्थिक भ्रष्टाचार, सुरक्षाबलों व शिक्षकों की नियुक्ति भी पांच साल में सिर्फ एक बार होगी बाकी समय वो अपना निर्धारित कार्य करेंगे। कुल मिलाकर "एक राष्ट्र एक चुनाव" राष्ट्र के परम हित में है और इसका जो कुछ भी मूल्य हो उसे अदा करके इसकी ओर बढ़ना चाहिए।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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