One Nation One Election: वन नेशन वन इलेक्शन की चर्चा में अभी दम नहीं

One Nation One Election: दो-तीन क्षेत्रीय दलों को छोड़कर देश के राजनीतिक दल इस समय एनडीए और इंडी एलायंस में बंटे हैं| ऐसे राजनीतिक टकराव के माहौल में वन नेशन वन इलेक्शन संभव नहीं है, क्योंकि सिर्फ एक क़ानून नहीं बनना है| लोकसभा और विधानसभाओं की फिक्स्ड टर्म करने के लिए कई संविधान संशोधन भी करने पड़ेंगे| कहीं भी सरकार गिरने पर क्या होगा, मध्यावधि चुनाव होगा तो नए निर्वाचित सदन की अवधि क्या होगी|

कई तरह के पेच हैं, जिनका समाधान और फिर संविधान संशोधन, जिसके लिए मोदी सरकार के पास दो तिहाई बहुमत होना जरूरी है, जो इस समय कतई संभव नहीं है| लेकिन राजनीतिक दलों में खलबली मची है| दो तरह की अटकलें हैं, या तो मोदी पांच विधानसभाओं का चुनाव लोकसभा चुनावों तक टालेंगे, इसके लिए इन राज्यों में राष्ट्रपति राज लगाना पड़ेगा| वह भी इतना आसान भी नहीं है|

no power in the discussion of One Nation One Election

दूसरी चर्चा यह है कि भाजपा शासित हरियाणा, महाराष्ट्र को साथ जोड़कर लोकसभा चुनाव ही इसी साल नवंबर दिसंबर में करवा देंगे| लेकिन नरेंद्र मोदी अपने पांच साल के कार्यकाल का एक दिन भी जाया होने नहीं देंगे, वह श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर का शिलान्यास किए बिना चुनावों में नहीं उतरेंगे, इसलिए इसी साल लोकसभा चुनावों की अटकल फिजूल है| हां, बिना कुछ ज्यादा संशोधन किए मोदी सरकार अप्रेल मई 2024 में लोकसभा चुनावों के साथ 12 राज्यों के चुनाव करवाने की रणनीति बना सकती है|

राजनीतिक हलकों में अटकले हैं कि इस साल होने वाले पांच राज्यों में भावी लोकसभा चुनावों तक राष्ट्रपति राज लगाया जा सकता है| जिसे बहुमत के सहारे संसद के दोनों सदनों से पास करवाया जा सकता है| आंध्र प्रदेश, अरुणाचल, ओड़िसा और सिक्किम के चुनाव तो लोकसभा के साथ होते ही हैं| इनके साथ भाजपा शासित महाराष्ट्र, हरियाणा और जम्मू कश्मीर विधान सभा के चुनाव भी साथ हो सकते हैं| हालांकि पांच राज्यों में राष्ट्रपति राज के खिलाफ देश भर में आन्दोलन शुरू हो जाएगा, लोकसभा चुनाव से पहले मोदी इस राजनीतिक आन्दोलन का सामना नहीं करना चाहेंगे|

no power in the discussion of One Nation One Election

इसलिए आम सहमति के बिना देश में वन नेशन वन इलेक्शन की चर्चा फिजूल है| वन नेशन वन इलेक्शन की चर्चा नई नहीं है| 1952 से 1967 तक पहले चार चुनाव साथ साथ ही हुए थे| हालांकि केरल में यह सिलसिला 1959 में ही टूट गया था जब जवाहर लाल नेहरु सरकार ने ईएमएस नम्बुदरीपाद की कम्युनिस्ट सरकार को बर्खास्त करके केरल विधानसभा को भंग कर दिया था|

1967 के बाद तो दलबदल से सरकारें टूटने लगी, और मध्यावधि चुनाव होने लगे तो चुनाव तमाशा बन कर रह गए| हर साल कहीं न कहीं चुनाव होता रहता है, साल में भी कई कई बार होता रहता है| चुनाव आयोग पूरे साल चुनावों में उलझा रहता है| देश में कहीं न कहीं आचार संहिता लगी ही रहती है, इसलिए विकास कार्य प्रभावित होते हैं| एक बार चलता हुआ काम रुक जाए, तो आचार संहिता हटने के बाद भी लंबा समय रुका रहता है|

इसलिए एक साथ चुनाव करवाने की परंपरा को फिर से पटरी पर लाने के लिए देश भर में विमर्श चलता रहा है| खुद इंदिरा गांधी भी इसकी पक्षधर थी| उन्हीं की पहल पर 1983 में चुनाव आयोग ने लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाने का सुझाव दिया था| दुर्भाग्य से 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या हो गई और चुनाव आयोग की सिफारिश पर काम नहीं हुआ| राजीव गांधी का एजेंडा ही कुछ और था, वह तात्कालिक विषयों में ही उलझे रहे, और इस गंभीर विषय पर कोई चर्चा नहीं हुई| 1998 में जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने इस विषय को बड़ी गंभीरता से उठाया था|

अटल बिहारी वाजपेयी ने विधि आयोग से इस संबंध में अध्ययन करने को कहा था, क्योंकि 1967 के बाद बहुत कुछ बदल गया था| दलबदल क़ानून आ चुका था, अनुच्छेद 356 लगाकर विधानसभा भंग करने के केंद्र सरकार के अधिकार पर सुप्रीमकोर्ट की बंदिश लग चुकी थी| बोम्मई केस में सुप्रीमकोर्ट ने गाईडलाईन जारी कर दी थी| केंद्र सरकार और संसद के अधिकार में पहले जैसी ताकत नहीं रह गई थी|

वाजपेयी की पहल पर 1999 में विधि आयोग ने विचार विमर्श के बाद एक साथ चुनाव करवाने की सिफारिश की थी| सिफारिश में यह सुझाव भी था कि अगर कोई सरकार गिर जाए, तो विधान सभा खुद मुख्यमंत्री चुन ले, ऐसा पहले सुप्रीमकोर्ट के आदेश से हो चुका है| 1998 में जब उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रोमेश भंडारी ने भाजपा के कल्याण सिंह को हटा कर कांग्रेस के जगदम्बिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी, तो इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश से विधान सभा में कल्याण सिंह और जगदम्बिका पाल में मुकाबला हुआ था, जिसमें कल्याण सिंह दुबारा मुख्यमंत्री बने थे|

दूसरा सुझाव यह भी था कि अगर विधानसभा भंग होती है, तो जो मध्यावधि चुनाव हो वह विधानसभा के बाकी बचे कार्यकाल के लिए हो, अब यह संशोधन संसद में दो तिहाई बहुमत के बिना तो हो नहीं सकता, क्योंकि इसमें विधानसभाएं भी शामिल हैं, इसलिए आधी विधानसभाओं से अनुमोदन की जरूरत भी होगी|

इतने बड़े बदलाव के लिए क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की सहमति जरूरी है| एक दर्जन के करीब विधानसभाओं में क्षेत्रीय दलों का बहुमत है| सभी राजनीतिक दलों में आम सहमति बनाने के लिए वाजपेयी ने उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत को जिम्मेदारी दी थी| गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी राष्ट्रीय दलों कांग्रेस और वामपंथियों से बात कर रहे थे, और भैरोसिंह शेखावत ने विभिन्न क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के साथ बातचीत का सिलसिला शुरू किया था। इसके लिए उन्होंने विभिन्न राज्यों का दौरा किया और क्षेत्रीय दलों से बातचीत को आगे बढ़ाया|

2003 में अटल बिहारी वाजपेयी ने खुद पहल करके कांग्रेस संसदीय दल की नेता सोनिया गांधी को बुलाया था, वह एक साथ चुनावों के लिए सहमत थी, लेकिन उसके बाद लोकसभा चुनाव आ गए, जिसमें भाजपा हार गई| सत्ता में आने के बाद कांग्रेस ने इस मुद्दे पर बात ही नहीं की| यूपीए शासनकाल में तबके विपक्ष के नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने 2010 में पहल कर के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी से इस मुद्दे पर चर्चा की थी, और उन्होंने तब अपने ब्लॉग में लिखा था कि इन दोनों ने लोकसभा और विधानसभाओं का कार्यकाल फिक्स करने और एक साथ चुनाव करवाने पर सहमति प्रकट की है| लेकिन वह सहमति सिर्फ सैद्धांतिक थी|

नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही एक देश एक चुनाव की वकालत की| 2015 में संसद की स्टेंडिंग कमेटी ने भी एक साथ चुनावों की सिफारिश की थी, लेकिन इस रिपोर्ट में महत्वपूर्ण यह था कि कांग्रेस ने इसे अव्यवहारिक, तृणमूल कांग्रेस ने अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस ने असंभव और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने कहा था कि इसमें कई तरह की व्यवहारिक समस्याए हैं| इसलिए यह बात वहीं पर खत्म हो गई थी|

2019 में लोकसभा चुनाव जीतने के बाद मोदी ने एक बार फिर मंशा जाहिर की और इस संबंध में कमेटी बनाने का वायदा भी किया था| उसी साल मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने एक साथ चुनाव की वकालत करते हुए कहा था कि इसके लिए राजनीतिक दलों में आम सहमति और कई तरह के संविधान संशोधनों की जरूरत पड़ेगी|

इस बीच नरेंद्र मोदी एक साथ चुनाव की चर्चा करते रहे हैं, उनकी ताजा वन नेशन वन इलेक्शन थ्योरी के पीछे सिर्फ लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ करवाना नहीं, बल्कि नगर पालिकाओं और पंचायतों के चुनाव भी साथ करवाना है| अब जब लोकसभा चुनावों में सिर्फ आठ महीने बचे हैं, मोदी सरकार ने संसद के विशेष सत्र के एलान के साथ ही पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की रहनुमाई में आठ सदस्यीय कमेटी बना दी है, तो वन नेशन वन इलेक्शन पर माहौल गर्म हो गया है|

इंडी एलायंस के घटक दलों ने जो लाईन संसदीय समिति में अपनाई थी, उसी लाईन को अपनाते हुए वे वन नेशन वन इलेक्शन का विरोध कर रहे हैं| लेकिन मोदी सरकार ने जो नई कमेटी बनाई बनाई है, उसमें संविधान विशेषज्ञ हरीश साल्वे को रखा गया है, जो अन्तरराष्ट्रीय कानूनों के ज्ञाता हैं, क्योंकि दुनिया के कई देशों में एक साथ चुनाव होते हैं, इसलिए उनकी विशेषज्ञ राय महत्वपूर्ण होगी| कमेटी में लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी को भी रखा गया है| गृहमंत्री अमित शाह तो एक्स ओफिशियो मेंबर हैं। वन नेशन वन इलेक्शन के घोर समर्थक लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप के साथ साथ पूर्व केन्द्रीय मंत्री गुलामनबी आज़ाद को भी रखा गया है|

उम्मीद के मुताबिक़ ही इंडी गठबंधन से विरोध शुरू हो गया है, गठबंधन ने अधीर रंजन चौधरी को कमेटी से हटने का दबाव भी डालना शुरू कर दिया है| सोनिया गांधी का इशारा होते ही वह इस्तीफा दे देंगे| इंडी गठबंधन को इसमें मोदी की साजिश नजर आती है| उसे लगता है कि मोदी वन नेशन वन इलेक्शन के बहाने अपने नाम पर राज्य विधानसभाओं के चुनाव भी जीतना चाहते हैं| विपक्ष जब खुलेआम वन नेशन वन इलेक्शन का विरोध करता दिखाई देता है, तो इससे एक बात जाहिर हो जाती है कि गठबंधन के नेता मोदी को हराने के कितने भी दावे करें, वे मोदी की लोकप्रियता से भयभीत हैं। उन्हें डर है कि मोदी लोकसभा के साथ, कहीं राज्यों की विधानसभा से भी उन्हें खदेड़ न दें|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+