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Nyay Samhita: नयी न्याय संहिता में भी बाकी हैं विरोधाभास

Nyay Samhita: कल्पना कीजिए 'क' की 'ख' से किसी बात पर लड़ाई हो जाती है। लड़ाई में 'क' को गंभीर चोट आती है, नाक की हड्डी टूट जाती है। 'ख' द्वारा की गई इस हिंसा के विरुद्ध मामला दर्ज कराने के लिए 'क' पुलिस के समक्ष जाता है। पुलिस भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की सात साल से कम की सजा वाली धाराओं जैसे 151/323/504-506 आदि के तहत मामला दर्ज कर 'ख' को तलब करती है, तथा पंचायत कर भविष्य में ऐसा न करने की हिदायत के साथ थाने से ही जमानत पर रिहा कर देती है।

क्योंकि प्रचलित कानून के मुताबिक पुलिस को ऐसा करने का अधिकार प्राप्त है। परिणाम यह होता है कि 'क' की नाक तोड़ने का आरोपी 'ख' मजे से अपने घर चला जाता है, जबकि पीड़ित 'क' को अस्पताल जाना पड़ता है और हजारों रुपए खर्च कर टूटी हुई नाक का इलाज कराना पड़ता है।

new criminal law bill still contradictions in the nyaya sanhita bill

अब एक दूसरी स्थिति देखें। 'क' अपने घर के बाहर सड़क पर खड़ा है। पीछे की ओर से अचानक 'ख' आता है और 'क' की जेब से कलम खींचकर फरार हो जाता है। सबक सिखाने की नीयत से 'क' पुलिस के पास जाता है। पुलिस 'ख' के विरुद्ध 'डे लाइट में लूट' का मामला दर्ज कर भारतीय दंड संहिता की धारा 392 के तहत कार्रवाई करते हुए जेल भेज देती है। परिणाम यह कि बहुत ही छोटे से मूल्य की कलम झपट लेने के आरोप में 'ख' को जमानत के लिए प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट के समक्ष जाना पड़ता है और जमानत न मिलने की दशा में उसे 14 बरस तक बामुशक्कत जेल की सजा काटनी होती है।

अंग्रेजों द्वारा भारत पर शासन करने के लिए 1860 में बनाए गए दंड कानूनों की यह एक बानगी भर है। ऐसे सैंकड़ों कानून और प्रावधान बनाकर अंग्रेज शासकों ने पुलिस तंत्र को असीमित अधिकार देकर चाक चौबंद किया था। आजादी के बाद से ही ऐसे कानूनों की समीक्षा की मांग उठती रही है। 1971 में विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इन कानूनों में व्यापक सुधारों का प्रस्ताव किया था। उनके लिए सन 1972 तथा उसके बाद 1978 में विधेयक भी पेश किया गया था, किंतु दोनों बार लोकसभा के भंग हो जाने से यह स्वत: समाप्त हो गया। वर्ष 2003 में मलिमथ समिति ने भी कुछ सुधारों का प्रस्ताव किया था। उसमें से कुछ को कानून बनाकर जोड़ा भी गया किंतु वह लेप लगाने जैसा ही रहा।

वर्ष 2014 में एनडीए की सरकार बनने के बाद अनावश्यक कानूनों को हटाने की मुहिम शुरू हुई। सारे देश के सत्ता, संगठन, संस्था एवं उनके सक्षम अधिकारियों से 4 साल तक चले विचार विमर्श तथा इस दौरान 156 बैठकों के बाद आपराधिक कानून में व्यापक सुधार की पीठिका तैयार की गई और अब भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य विधेयक को लोकसभा तथा राज्यसभा से मंजूरी मिल गई है, जो राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के साथ देश में लागू कर दिए जाएंगे।

इसी साल अगस्त में हुए मानसून सत्र में सरकार ने इन विधेयकों को पेश किया था। यह तीनों कानून अंग्रेजी हुकूमत के समय से चले आ रहे भारतीय दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की जगह लाए गए हैं। प्रस्तावित कानून में कुछ कड़े प्रावधान किए गए हैं तो कुछ अनावश्यक कानूनों को हटा दिया गया है। विपक्षी सदस्यों की अनुपस्थिति में पारित कानून के बारे में सरकार का कहना है कि अभी तक चले आ रहे कानून अंग्रेजी राज की सुरक्षा के मद्देनजर बनाए गए थे जबकि नए प्रस्तावित कानून देश और नागरिकों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं।

आम लोगों की सबसे बड़ी शिकायत थाने में एफआईआर दर्ज कराने और पुलिस के व्यवहार को लेकर रहती है। नये कानून में इसे सुधारने का प्रयास किया गया है। संज्ञेय अपराधों की सूचना अब मौखिक, लिखित या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से दी जा सकेगी। थाने में इसे दर्ज किया जाएगा, जिस पर सूचना देने वाले व्यक्ति को तीन दिन के अंदर हस्ताक्षर करना होगा। इसका मतलब यह हुआ कि गिरफ्तारी के मामलों में पुलिस की मनमानी से निजात मिलेगी।

आम आदमी की शिकायत पुलिस के व्यवहार को लेकर भी रहती है। बगैर लिखा पढ़ी लोगों को थाने में बैठा लेने और उनके निकट संबंधियों को जानकारी नहीं देने तथा उनके साथ मानवीय व्यवहार न करने की शिकायतें अक्सर होती हैं। अब गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारी का नाम उसकी पहचान तथा उसका नंबर उसकी वर्दी पर ऐसी जगह लिखा होना चाहिए जिसे आसानी से जाना जा सके। गिरफ्तारी के समय एक अभिलेख तैयार किया जाएगा जिसे मौजूद गवाहों द्वारा सत्यापित करने की व्यवस्था है। गवाहों में कम से कम एक व्यक्ति गिरफ्तार किए गये व्यक्ति के घर का सदस्य, मित्र या समाज का कोई सम्मानित व्यक्ति अवश्य होगा।

इसी तरह अदालतों में होने वाली देरी को कम करने के लिए भी विधेयक में पुलिस व अदालतों के लिए समय सीमा तय की गई है। अब पुलिस के पास किसी भी मामले की जांच के लिए अधिकतम 180 दिनों का समय होगा, उसके बाद अदालत को 60 दिनों का समय दिया गया है। सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत को 30 दिन के अंदर फैसला देना होगा, जिसे 7 दिनों के अंदर ऑनलाइन उपलब्ध कराना होगा। प्रस्तावित कानून में महिलाओं और बच्चों के प्रति अपराधों हत्या और राष्ट्र के विरुद्ध अपराधों को प्रमुखता दी गई है।

18 वर्ष से कम उम्र की बालिकाओं के सामूहिक बलात्कार को पोक्सो के साथ सुसंगत बनाते हुए आजीवन कारावास या मृत्युदंड का प्रावधान किया गया है। गैंगरेप के सभी मामलों में 20 साल की सजा या उम्र कैद है। धोखे से यौन संबंध बनाने या सच्चे इरादे के बिना विवाह करने का वादा करने वाले व्यक्तियों के लिए भी 10 साल दंड का प्रावधान है। यह नए एलिमेंट है। पहली बार संगठित अपराध और आर्थिक अपराध की व्याख्या करते हुए कैद और आर्थिक दंड के प्रावधान सख्त किए गए हैं।

विशेष रूप से पीट-पीट कर हत्या करने वालों को फांसी की सजा और राजद्रोह के खिलाफ कानून की जगह देशद्रोह कानून का अनुमोदन किया गया है। इसके अलावा आतंकवाद को परिभाषित करते हुए उसके दायरे में एकता, संप्रभुता और आर्थिक सुरक्षा को भी शामिल किया गया है।

उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रस्तावित कानून नागरिकों के लिए हितकर होंगे। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर इन विधेयकों पर सदन में ठीक से चर्चा कराई गई होती तो तीनों विधेयक भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकते थे, और न्याय के पक्ष में लोकमत भी मजबूत होता। उल्लेखनीय है कि संसदीय समिति द्वारा रेखांकित संशोधनों को शामिल किया गया है पर ज्यादातर सांसदों के निलंबित होने के कारण चर्चा नहीं हो सकी।

सरकार विवाह की पवित्रता की रक्षा के लिए एडल्ट्री को अपराध मानने की संसदीय समिति के सुझाव से असहमत थी। मालूम हो कि 5 साल पहले तक एडल्ट्री भारत में भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के तहत अपराध मानी जाती थी। हालांकि वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इससे इनकार कर दिया था, लेकिन अभी भी अधिकांश लोग इसे एक अपराधिक कृत्य ही मानते हैं। इसी तरह यह मांग भी उठती रही है कि वैवाहिक बलात्संग भी अपराध के रूप में दर्ज हो, लेकिन इस बार के कानून में भी इसे शामिल करने से इनकार कर दिया गया है। पुलिस हिरासत की अवधि 15 दिन से बढ़ा कर 90 दिन किया जाना भी कैदियों के लिए परेशानी का सबब साबित होगा।

इसी तरह चेहरे की पहचान साक्ष्य के रूप के तौर पर दुनिया भर में स्वीकार की जा रही है। दिल्ली पुलिस ने दंगों के मामले में जांच और सबूत दोनों के लिए इसका इस्तेमाल किया था, पर नए भारतीय साक्ष्य विधेयक में इसका अभाव है। मॉब लिंचिंग में फांसी की सजा तय कर दी गई है लेकिन चेहरे की पहचान को सबूत के तौर पर न लेने से प्रस्तावित कानून ग्राउंड लेवल पर कमजोर हो सकता है। राजद्रोह को खत्म कर उसकी जगह देशद्रोह कानून लाया गया है, लेकिन उसमें देश के खिलाफ चलाई जाने वाली किसी भी गतिविधि यहां तक कि बोलने और लिखने पर भी कठोर दंड का प्रावधान किया गया है। इससे लोगों में कानून के दुरुपयोग की आशंका बढ़ी है।

कुल मिलाकर तीनों विधेयक सत्ता पक्ष की मंजूरी से पारित तो हो गए लेकिन विपक्ष की इन शिकायतों को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता कि अगर चर्चा होती तो इन विधेयकों में और निखार आता। सदन में बहस होती कि नई अपराध आचार संहिता का नागरिकों से कोई सरोकार है, या नही? क्या यह औपनिवेशिक दौर में बने कानूनों से अलग है? अथवा नागरिक विरोधी है या पुलिस को और ज्यादा अधिकार देने वाला है आदि आदि।

वैसे भी दण्ड विधान से जुड़े कानून अति संवेदनशील होते हैं। उनके हर पहलू पर बारीकी से चर्चा अपेक्षित होती है, लेकिन दुर्भाग्य से इन दिनों लोकसभा में विपक्ष की संख्या इतनी कम है कि उनके उपस्थित रहने पर भी विधेयकों के पारित होने में कोई बाधा नहीं आती है। फिर भी सरकार ने जल्दबाजी में बहस का एक अवसर खो दिया है और यह न्याय प्रणाली के लिए नुकसानदायक ही है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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