Star Rating on Packaged Food: रोगों की रोकथाम के लिए फूड पैकेटों पर जरूरी स्टार रेटिंग
फूड पैकेट पर स्टार रेटिंग ठीक वैसी ही होगी, जैसे कि हम टीवी, फ्रिज, एयर कंडीशनर जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पाद पर छपी देखते हैं। फर्क यही है कि इनकी रेटिंग BEE द्वारा दी जाती है, जबकि पैकेज्ड फूड पर FSSAI रेटिंग देता है।
Star Rating on Packaged Food: भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के लगातार विस्तार के बावजूद, खराब जीवन शैली और गलत खान-पान से जुड़े रोगों से निपटना एक बड़ी चुनौती है। देश में इस प्रकार की गैरसंचारी बीमारियाँ (जो एक बीमार से दूसरे में नहीं फैलती) लगातार बढ़ रही हैं, जिसकी एक बड़ी वजह पैकेज्ड फूड भी हैं। इनमें फैट, चीनी और नमक की असुरक्षित मात्रा के चलते कोलेस्ट्रोल का स्तर और मोटापा बढ़ने तथा डायबिटीज व हाईपर टेंशन जैसी परेशानियॉं सामने आती हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में हर साल चार करोड़ लोगों की मौत नॉन कम्युनिकेबल डिसीजेस (एनसीडी) से होती है। इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए भारत सरकार अगले साल एक कानून लाने जा रही है। फूड सेफ्टी स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) फिलहाल इस कानून से संबंधित ड्राफ्ट को अंतिम रूप देने में लगा है।
प्रस्तावित कानून के तहत खाने-पीने की पैकेटबंद वस्तुओं पर हेल्थ स्टार रेटिंग दी जायेगी। इससे उपभोक्ता को पता चल जायेगा कि वह जो चीज खाने के लिए खरीद रहा है, वह चीनी, नमक और वसा की मात्रा के हिसाब से सेहत के लिए कितनी निरापद या हानिकारक है। इसके लिए एफएसएसएआई ने एक फ्रंट ऑफ पैकेजिंग लेबलिंग (FOPL) पॉलिसी तैयार की है।
सही निर्णय लेने में मददगार होगी हेल्थ स्टार रेटिंग
कुछ दशक पहले तक पैकेज्ड फूड सिर्फ मेट्रो या बड़े शहरों और लंबी यात्राओं में इस्तेमाल तक ही सीमित थे। लेकिन, बाजार और प्रचार की ताकतों ने आज इन्हें छोटे-छोटे गॉंव-कस्बों तक पहुँचा दिया है। इसी का नतीजा है कि वर्तमान में पैकेज्ड फूड का भारतीय बाजार करीब चालीस अरब डॉलर तक पहुँच चुका है और 2030 तक इसके दोगुना होने की संभावना जतायी जा रही है।
इसके बावजूद हमारे यहॉं स्वास्थ्य के लिहाज से इन उत्पादों की गुणवत्ता पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता। 2019 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की एक ग्लोबल स्टडी में कहा गया था कि सेचुरेटेड फैट, चीनी और नमक के उच्च स्तर के कारण, भारत में मिलने वाले पैकेटबंद खाने-पीने के सामान, दूसरे देशों की तुलना में सबसे कम स्वस्थकारी हैं।
एफएसएसएआई के इस कदम को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि इतने खतरों के बावजूद, देश में बड़ी संख्या में बच्चे और युवा पैकेटबंद उत्पादों का सेवन कर रहे हैं, जिससे वे कम उम्र में गैरसंचारी बीमारियों का शिकार बनने लगे हैं। ऐसे में पैकेट पर हेल्थ स्टार रेटिंग का रहना, उन्हें सही फैसला लेने में काफी मदद कर सकता है।
वैसे तो इस पर काफी लंबे समय से काम चल रहा है, लेकिन इसी साल अप्रैल में अहमदाबाद स्थित भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम-ए) की स्टडी सामने आयी। इसमें आईआईएम-ए ने एफओपीएल को लेकर एक काफी बड़ा सर्वे किया था। इसके अंतर्गत बीस हजार लोगों से इस बारे में उनकी राय पूछी गयी थी। इससे प्राप्त निष्कर्षो पर आईआईएम-ए ने जो सिफारिशें दी हैं, उनमें हेल्थ स्टार रेटिंग को पैकेट बंद खाद्य पदार्थों के चयन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त बताया गया है। ज्ञातव्य है कि वर्तमान में इस तरह की रेटिंग प्रणाली ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया, मेक्सिको और चिली में लागू है।
फूड इंडस्ट्री को मिलेगा चार साल का समय
इस पॉलिसी के बारे में अभी तक जो जानकारियॉं सामने आयी हैं, उनके अनुसार, एफएसएसएआई के लाइसेंसिंग आवेदन पोर्टल पर नया मॉड्यूल लागू किया जाएगा। खाद्य पदार्थ उत्पादकों को इस पोर्टल पर अपने उत्पाद की जानकारी देनी होगी। इसके आधार पर नये मॉड्यूल के माध्यम से खाद्य उत्पादों के लिए हेल्थ स्टार रेटिंग प्रमाणपत्र जारी किया जायेगा।
एफएसएसएआई की ओर से दी जाने वाली यह रेटिंग संबंधित उत्पाद की तथ्यात्मक जानकारी के आधार पर होगी, जिसमें पैकेज्ड फूड प्रॉडक्ट की 100 मिलीग्राम मात्रा में मौजूद पोषण संबंधी जानकारी का विश्लेषण किया जायेगा। नये ड्राफ्ट में दूध और डेरी उत्पादों को एफओपीएल से बाहर रखा गया है, जबकि 2019 में अधिसूचित एफएसएसएआई ड्राफ्ट में ये उत्पाद भी एफओपीएल में शामिल थे। नया सिस्टम अक्टूबर 2023 से प्रभावी होगा। इसे लागू करने के लिए फूड इंडस्ट्री को चार साल का समय दिया गया है। हालांकि, स्वास्थ्य चिंताओं के लिहाज से इस छूट को उचित नहीं माना जा रहा है।
कुछ असहमतियॉं भी हैं
हांलाकि, एफएसएसएआई इस बात को लेकर बहुत आशान्वित है कि नयी हेल्थ स्टार रेटिंग व्यवस्था से गैरसंचारी या गलत खान-पान की वजह से होने वाले रोगों की रोकथाम में मदद मिलेगी। लेकिन, अनेक स्वास्थ्य व उपभोक्ता संस्थायें इस दावे से बहुत ज्यादा सहमत नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्टार रेटिंग में एनसीडी को कम करने में मदद नहीं मिलेगी। क्योंकि इसमें हर खाने की चीज के पैकेट पर आधे से पॉंच स्टार तक की रेटिंग रहेगी। इससे उपभोक्ता को कोई भी उत्पाद स्वास्थ्य के लिए अहितकारी नहीं लगेगा। दूसरे, इस रेटिंग सिस्टम में निर्धारित मानक, डब्ल्यूएचओ के मानकों की तुलना में कम स्तर के हैं। इसकी वजह से स्टार रेटिंग में अनहेल्दी उत्पादों को भी दो या तीन स्टार मिल सकते हैं।
उनका सुझाव है कि स्टार रेटिंग की बजाय पैकेट पर स्पष्ट शब्दों में यह लिखा जाना चाहिए कि पैकेट में बंद प्रॉडक्ट में वसा, चीनी या नमक की मात्रा, सुरक्षित सीमा से कितनी अधिक है। कई देशों में इन पदार्थों की मात्रा को लाल (आवश्यकता से अधिक), पीले (सामान्य या इससे कुछ अधिक), हरे (एकदम सही) रंगों के जरिये प्रदर्शित किया जाता है। इससे ग्राहक आसानी से समझ जाता है कि उसके लिए वह उत्पाद कितना सुरक्षित है।
इसी साल अप्रैल में ब्रिटेन की संसद ने एक नया हाई फैट, हाई शुगर एक्ट पास किया गया था, जिसके अनुसार फूड पैकेट पर बड़े अक्षरों में फैट, शुगर और नमक की मात्रा की जानकारी का प्रकाशन अनिवार्य है। उपभोक्ता को जागरूक करने की दिशा में यह एक अधिक सरल व सुविधाजनक विकल्प हो सकता है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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