National Science Day: विश्व कल्याण के लिए भारतीय विज्ञान
इस वर्ष भारतीय विज्ञान दिवस की थीम है 'वैश्विक कल्याण हेतु वैश्विक विज्ञान'। विज्ञान के प्रति यही भारतीय दृष्टिकोण रहा है जिसे अब आधुनिक विज्ञान के मानने वालों को भी समझने की जरूरत है।

National Science Day: भारत में प्रतिवर्ष 28 फरवरी को 'विज्ञान दिवस' मनाया जाता है। भारत रत्न एवं नोबल पुरस्कार से सम्मानित प्रोफेसर चन्द्रशेखर वेंकटरमण, महान अंतरराष्ट्रीय भारतीय भौतिक विज्ञानी थे। 'वर्ण' सूत्र से उन्होंने समझा कि जल के अणुओं द्वारा प्रकाश के प्रकीर्णन (Scattering) के कारण समुद्र का रंग नीला दिखाई पड़ता है। इस अति उपयोगी 'रमन प्रभाव' के लिए उन्हें 1930 में नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। जिसकी व्याख्या के लिए आधुनिक विज्ञान को क्वांटम भौतिकी सिद्धांत की आवश्यकता पड़ती है। जिसके अनुसार प्रकाश के सूक्ष्मतम कणों को फोटॉन कहते हैं। जब यह फोटॉन किसी अणु या परमाणु से टकराता है तो उनमें परस्पर ऊर्जा का आदान - प्रदान हो जाता है। हमारे प्राच्य विज्ञान के 'वर्ण' सिद्धांत 'दिव्' धातु रूप में इसके सूत्र को बताते हैं।
रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी के रूप में एक नई विधि प्रयोग की जा रही है। जो द्रव्यों एवं पदार्थों की अंतरंग संरचना के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है। जो इन्फ्रारेड माइक्रोस्कोपी के साथ केमिकल इमेजिंग में प्रभावी है। माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक संयोजित सर्किट, थिन फिल्म कोटिंग, मिनरल मिश्रण, आर्ट पिगमेंटेशन में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। इसके अतिरिक्त नशीले पदार्थों को पहचानने, विस्फोटक की पहचान करने, प्राणी शास्त्र संबंधित टिशू एनालिसिस आदि के अध्ययन में यह विशेष उपयोगी है।
आज आधुनिक विज्ञान में रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी का उपयोग बायोलॉजिकल विज्ञान की विभिन्न जटिल प्रक्रियाओं जैसे कि जीन हस्तांतरण को सुलभ बना रहा है। हम इस महत्वपूर्ण खोज 'रमन प्रभाव' के आविष्कार दिवस को प्रत्येक वर्ष विज्ञान दिवस के रूप में मनाते हैं।
इस अवसर पर हमारे प्राच्य विज्ञान के सूत्रों का पुनः प्रकाशन होना चाहिए। हमारे दर्शन में वैज्ञानिक परीक्षण, प्रयोग, विश्लेषण की नितान्त संभावना है। वसुधैव कुटुम्बकम, और सर्वे भवन्तु सुखिनः की कामना से 'विश्व कल्याण हेतु वैश्विक विज्ञान' के इस उद्देश्य को हम भारतीय प्राचीन वैज्ञानिक ऋषियों के जीवन, दर्शन एवं उसके विज्ञान पक्ष को उद्घाटित कर जानकारी सुलभ कराने का प्रयास किया जाना चाहिए।
गीता का ज्ञान है -' तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ, एनम् ज्ञानविज्ञाननाशनम्।' अर्थात ज्ञान और विज्ञान को विनाशवान नहीं होना चाहिए। पहले अपनी कामना, स्वार्थ हित की लालसा का त्याग कर सर्व मंगल की भावना से विज्ञान की उपासना करनी चाहिए। शास्त्र और आचार्य के उपदेश से जो आत्मा-अनात्मा, विद्या-अविद्या आदि पदार्थों का बोध होता है उसका नाम ज्ञान है। उसका जो विशेषरूप से अनुभव है उसका नाम विज्ञान है।
भारत के प्राचीन वैज्ञानिकों को ही ऋषि कहा जाता है। वे मंत्र अर्थात् वैज्ञानिक सूत्रों के द्रष्टा (अनुभव करने वाले) हैं, सृष्टा अर्थात् रचयिता नहीं। अर्थात् उन्होंने इस सृष्टि और प्रकृति में जो कुछ भी घटित होते देखा और सूक्ष्मता से अध्ययन किया, उसे ही व्याख्यायित किया है। इसीलिए आज का रिसर्च शब्द भी कहीं न कहीं 'ऋषि' से प्रेरित प्रतीत दिखता है।
प्राचीन काल में हमारी संस्कृति में इतिहास लिखने और अपने बारे में बताने की प्रथा नहीं थी। ऋषि-मुनियों ने सूत्र तो बताये किन्तु अपने विषय में नहीं लिखा। इस कारण उनके योगदान को धीरे- धीरे कहीं विस्मृत करने का 'प्रयास' हुआ। 'प्रयास' इस अर्थ में कि, उनकी वैज्ञानिकता को समझने के लिए विज्ञान की दृष्टि और संस्कृत का ज्ञान दोनों आवश्यक है। ऐसे विद्वानों का नितांत अभाव होता चला गया जिनमें यह विशेषता हो।
आज विश्व को विज्ञान से यह अपेक्षा करनी पड़ रही है कि वह वैश्विक कल्याण को प्राथमिकता दे। वैदिक विज्ञान की स्थापनाओं का मूल भाव ही यही बताया गया है। वेद का मूल है - विज्ञानं उपास्य॥ वेद शब्द 'विद्' धातु से निकला है - जिसके तीन अर्थ हैं - सत्ता, ज्ञान तथा प्राप्ति। सत्ता, सत् है। ज्ञान, चित् है। प्राप्ति, आनंद है। इस प्रकार वेद का अर्थ हो गया सच्चिदानंद। सच्चिदानंद ही ब्रह्म है। वेद, उसी ब्रह्म का ज्ञान है।
आत्मानुसंधान ही तो वास्तव में विज्ञान का लक्ष्य है। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के इस दौर में जल्द ही विभिन्न टुकड़ों में हमारे क्लोन बन रहे हैं। जो हमें हर पर सुझाव देते हुए हमारी भावनाओं और विचारों पर हावी होने लगते हैं। ऐसी स्थिति से निपटने के लिए हमें अपनी उलझनों का हल बाहर नहीं बल्कि आंतरिक चेतना की मजबूती से ही मिल सकेगा। अपने दिमाग को वैज्ञानिक बनाए किन्तु मन को कला दार्शनिक। तभी रमन प्रभाव जैसे 'वर्ण' के सृष्टि रहस्य को सहजता से समझ सकेंगे। और ऐसी भौतिक क्रांति कर सकेंगे जो विश्व के लिए कल्याणकारी होगी।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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