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पश्चिम बंगाल में मोदी बनाम ममता की जंग

Paschim Bengal Chunav: पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों पर 19 अप्रैल से लेकर 1 जून तक सात चरणों में मतदान होना है। 2019 की तरह इस बार भी ममता और मोदी आमने सामने हैं। ममता बनर्जी 13 साल से बंगाल की मुख्यमंत्री हैं और वह इसी दबदबे के आधार पर भाजपा की बढ़त को रोकने की हरसंभव कोशिश कर रही हैं।

बंगाल का यह चुनाव भाजपा और तृणमूल दोनों पूरी तरह ध्रुवीकरण पर लड़ रही हैं। भाजपा का पूरा फोकस और प्रचार राम मंदिर निर्माण, नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), संदेशखाली में महिलाओं के साथ शोषण और प्रदेश में ममता राज में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे के इर्द गिर्द सिमटा हुआ है। भाजपा को उम्मीद है कि इन सब मुद्दों के दम पर वह 2019 में जीती 18 सीटों से आगे बढ़कर प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बन जाएगी।

narendra Modi vs Mamata Banerjee battle in West Bengal lok sabha election 2024

भाजपा इस लोकसभा चुनाव को 2026 के लिए वार्मअप चुनाव के रूप में भी देख रही है। उधर ममता बनर्जी प्रदेश के मुस्लिम नेताओं को साफ-साफ कह रही हैं कि भाजपा के आते ही सीएए और एनआरसी लागू हो जाएगा और आप लोगों से देश की नागरिकता छीन ली जाएगी। जब तक मैं हूं, आपको कोई हाथ भी नहीं लगा सकता। तृणमूल कांग्रेस ने इस बार घर घर बैठक पर चुनाव प्रचार अभियान पर फोकस किया है। ममता के छोटे-छोटे वीडियो हर घर में दिखाए जा रहे हैं जिसमे वह कह रही हैं कि जब तक ममता है, मोदी बंगाल में आ नहीं सकते।

ममता बनर्जी जहां मुस्लिम वोटर्स को कांग्रेस और लेफ्ट मे जाने से रोकने में कामयाब लग रही हैं, वहीं ममता के मुस्लिम वोटर्स को काउंटर करने के लिए भाजपा एससी/एसटी और हिंदू वोटर्स को अपने पाले में लाने का हससंभव प्रयास कर रही है। मुस्लिम मतदाता पूरी तरह से ममता के साथ हैं। मुसलमानों को लगता है कि ममता के रहते सीएए और एनआरसी बंगाल में लागू नहीं होगा। ऐसे में मुसलमानों का एकमुश्त वोट ममता को मिलता दिख रहा है।

बंगाल में ममता बनर्जी के पास मुसलमान वोटर के अलावा दो बड़े वोट बैंक भी हैं। महिला और अपर कास्ट बंगाली ब्राह्मण। महिलाएं ममता के लक्ष्मी भंडार और कन्याश्री योजनाओं से खुश हैं। बंगाली भद्रलोक यानी अपर कास्ट बंगाली ब्राह्मण करीब 3 से 4 प्रतिशत है। बंगाली ब्राह्मण खुद को सेकुलर साबित करने के लिए टीएमसी को वोट देते हैं। यह भद्रलोक प्रोग्रेसिव सोच को मानते हैं और भाजपा की हिन्दू राजनीति को पंसद नहीं करते हैं। इनको लगता है कि भाजपा इनके रहन सहन और संस्कृति को अपने हिंदुत्व एजेंडा से बदल देगी।

2024 के चुनाव में ममता मोदी पर भारी नजर आ रही थी, लेकिन संदेशखाली में महिलाओं के उत्पीड़न ने भाजपा के पक्ष में कुछ हद तक माहौल बना दिया है। जो संदेशखाली महिलाओं के उत्पीड़न को लेकर पूरे देश में चर्चा में आया वह बशीरहाट लोकसभा सीट में आता है। इसकी सरहद बांग्लादेश से सटी है। इस कारण अवैध घुसपैठ भी एक बड़ा मुद्दा है। बशीरहाट में आखरी फेज में वोटिंग है। टीएमसी ने विधायक हाजी नरूल इस्लाम को टिकट दिया है। हाजी नरूल इस्लाम 2009 से 2014 तक बशीरहाट से सांसद रहे हैं। बशीरहाट में मुस्लिम आबादी 45 प्रतिशत है।

संदेशखाली एसटी बाहुल्य है। इसलिए भाजपा यहां एससी/एसटी की राजनीति कर रही है। भाजपा की उम्मीदवार रेखा पात्रा अनुसूचित जाति के बागड़ी समुदाय से आती हैं। मोदी कूचबिहार और जलपाईगुडी में रैली कर चुके हैं। दोनो सीटें एससी आरक्षित सीटें है। भाजपा यहां पर एससी और एसटी लोगों से कह रही है कि टीएमसी जीत गई तो आपकी जमीन पर फिर कब्जा हो जाएगा।

पश्चिम बंगाल में एससी आबादी 23.51 प्रतिशत है और एसटी आबादी 5.8 प्रतिशत है। पश्चिम बंगाल में एससी के लिए लोकसभा की 8 और विधानसभा में 68 सीटें आरक्षित हैं। बंगाल में भाजपा एससी समुदाय में आने वाले दास, राजबंशी, खान, मंडल, प्रामाणिक, सरदार और पात्रा को अपने पाले में करने की रणनीति पर काम कर रही है। पश्चिम बंगाल में बागड़ी समुदाय सबसे अधिक है और रेखा पात्रा को आगे कर भाजपा इस समुदाय को भी संदेश देने की कोशिश में है।
बंगाल में संघ भी जमीनी स्तर पर लगातार काम कर रहा है। इसके साथ ही मोदी की लोकप्रियता के साथ टीएमसी के बड़े नेताओं के भाजपा में आने से भाजपा का आधार मजबूत हुआ है। 2020 में शुभेन्दु अधिकारी टीएमसी छोड़कर भाजपा में आ गए थे। वे अपने साथ बर्धमान के बड़े नेता सुनील मंडल को भी ले आए।

शुभेन्दु की वजह से भाजपा मेदिनीपुर डिवीजन में मजबूत हो रही है। यहां 9 लोकसभा सीटें है। इसके अलावा भाजपा नॉर्थ बंगाल में भी मजबूत नजर आ रही है। नॉर्थ बंगाल की 4 सीटों दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, कूचबिहार,अलीपुरद्वार के साथ ही मेदिनीवुर डिवीजन की 9 सीटों तमलुक, कांथी, मेदिनीपुर, घाटल, पुरूलिया, बांकुरा, विष्णुपुर, झारग्राम और श्रीरामपुर सीट पर भाजपा को उम्मीद है कि वह इन सीटों पर कब्जा कर लेगी।

इसके अलावा वर्धमान डिवीजन की 7 सीटों आसनसोल, बर्धमान दुर्गापुर, बीरभूम, बर्धमान ईस्ट, हुगली, आरामबाग और बोलपुर में भी भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। भाजपा को 2019 के चुनाव में झारखंड से सटे दक्षिण बंगाल के जंगल महल इलाके और उत्तर बंगाल से फायदा हुआ था। लेकिन ग्रामीण और आदिवासी इलाकों के साथ ही भाजपा शहरी सीटों पर भी पूरा ध्यान दे रही है।

बंगाल में दशकों से कूच राजवंश की सांस्कृतिक एवं सामाजिक अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले ग्रेटर कूचबिहार पीपुल्स एसोसिएशन भाजपा के साथ है। इसका प्रभाव कूचबिहार, जलपाईगुडी, दार्जिलिंग, ग्वालपाड़ा, कोकराझार, चिराग व बारपेटा समेत असम के 10 जिलो में है। कूचबिहार में कोच राजवंशियो की संख्या 52 फीसद, अलीपुरद्वार में 46 फीसद और जलपाईगुड़ी में 16 फीसद है। बीजेपी ने उत्तर बंगाल के कूचबिहार इलाके से आने वाले कोच राजवंशी समुदाय के नेता अनंत महाराज को राज्यसभा एक रणनीति के तहत भेजा है।

वहीं दूसरी ओर बंगाल में ममता के ठुकराने के बाद सीपीएम, कांग्रेस और इंडियन सेक्युलर फ्रंट मिलकर चुनाव लड़ रहे है। यह गठबंधन मिलकर कुछ कर सके इसकी संभावना कम ही है। कांग्रेस के नेता अधीर रजंन चौधरी अपनी सीट बहरामपुर पर फंस गए हैं क्योकि टीएमसी ने यहां से क्रिकेटर युसूफ पठान को उतारा है। ममता खुद बहरामपुर से अ​धीर रजंन चौधरी की हार तय करने के लिए दो बार इस क्षेत्र का दौरा कर चुकी हैं। कांग्रेस का खाता बंगाल में अधीर रजंन चौधरी ही खोल सकते हैं, ​बाकी कांग्रेस और लेफ्ट गठबंधन से उम्मीद करना बेकार है।

इस बार के चुनाव में ममता का सबकुछ दांव पर है। अगर राज्य में भाजपा बड़ी पार्टी बनने में सफल रहती है तो ममता के लिए आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा से लड़ना मुश्किल होगा। पूरी लड़ाई ममता और मोदी के बीच है। ध्रुवीकरण के दो छोर पर खड़े दोनों नेताओं ने अपनी पूरी ताकत झोंक रहे है। 4 जून को बंगाल के नतीजे हमें बंगाल के भविष्य की कहानी अच्छे से समझाएंगे।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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