Gujarat Elections 2022: अब गुजरात में किसी पार्टी का वोट बैंक नहीं रहा मुस्लिम मतदाता
Gujarat Elections 2022: गुजरात का विधानसभा चुनाव देश में अल्पसंख्यकों की राजनीतिक तस्वीर में बदलाव के नए संकेत दे रहा है। गुजरात का मुसलमान असमंजस में है कि करे तो क्या करे और जाए तो किधर जाए। विधानसभा चुनाव चल रहा है फिर भी, राजनीतिक दल खुलकर मुसलमानों पर बात करने से कतरा रहे हैं। पहले तो पॉलिटिकल पार्टियां भी प्रोपेगंड़ा के तहत ही सही, उनका नाम तो लेती थी, लेकिन अब तो वे भी परिवर्तन की पतवार थामे खड़ी हैं।

संघ परिवार के हिंदुत्व की प्रयोगशाला कहे जाने वाले गुजरात में मुसलमान और उनके मुद्दे दोनों ही लगभग दरकिनार हैं। इसी कारण कहा जा रहा है कि गुजरात में इस बार का चुनाव मुसलमानों की राजनीतिक ताकत को बिखराव की नई शक्ल बख्श रहा है।
गुजरात की वर्तमान राजनीतिक तस्वीर से निकल रहा संदेश साफ है कि अब देश में जहां - जहां चुनाव होगा, बहुत संभव है कि बहुसंख्यक समाज का वोट बचाए रखने के लिए मुसलमानों और उनके मुद्दों पर बात करने से ही राजनीतिक दल बचने लगें, क्योंकि मुसलमानों की बात करने का मतलब ही बहुसंख्यकों के वोट कटने की गारंटी साबित होता जा रहा है। पहले उत्तर प्रदेश और अब गुजरात के चुनाव इसका ताजा सबूत है। गुजरात का मुसलमान इस संदेश को समझ रहा है।
इसीलिए, एक जमाने में कांग्रेस को लगभग 80 फीसदी वोट देकर गुजरात में उसका सबसे ताकतवर वोट बैंक बने मुसलमानों पर अब सभी को हक हासिल होने लगा है। गुजरात का मुसलमान अब बीजेपी के साथ भी दिखना चाहता है, तो अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को भी पनपा रहा हैं, वह असदुद्दीन ओवैसी को भी आमंत्रित कर रहा है, तो कांग्रेस के साथ भी खड़ा दिख रहा हैं।
गुजरात विधानसभा चुनाव को मद्देनजर रखते हुए आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल भी हिन्दुत्व की नाव पर ही सवार होना चाहते हैं, तो बिलकिस बानो के बलात्कारियों की गुजरात सरकार की सहमति से हुई रिहाई पर भी कांग्रेस खुलकर सामने आने से बचती रही और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआइएमआइएम) तो मुसलमानों पर अपना ही राग आलाप रही हैं।
तस्वीर साफ है कि आबादी का बड़ा हिस्सा होने के बावजूद, मुसलमानों के हितों पर खुलकर बोलती रही पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस भी गुजरात में हिंदुत्व के वोट बैंक से डर कर चुनाव लड़ती दिख रही है, तो ओवैसी भी कुरैशी समाज के लिए कत्लखाने बढ़ाने की मांग को लेकर मैदान में हैं। आम आदमी पार्टी जिन मुद्दों को उठा रही है, उनमें भले ही सभी समुदायों की महत्वकांक्षाएं शामिल हैं, लेकिन करेंसी नोटों पर लक्ष्मी और गणेश की तस्वीर के प्रकाशन का मुद्दा सबसे बड़ा है।
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जनगणना के आंकड़े बताते है कि गुजरात में लगभग 10 फीसदी आबादी मुसलमानों की है और कुल 53 विधानसभा सीटों पर मुसलमानों का उनका अच्छा खासा प्रभाव है। 35 से 38 सीटों पर वे चुनावी नतीजों को प्रभावित करने का दम रखते हैं, तो 20 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 20 फीसदी से भी ज्यादा है।
इन मुस्लिम बहुल 20 सीटों में से 4 अहमदाबाद में हैं, जबकि भरूच और कच्छ जिले में तीन-तीन सीटें हैं। दंगों के एक दशक बाद गुजरात की राजनीतिक तस्वीर में जबरदस्त बदलाव और 2012 में बीजेपी को 20 फीसदी मुस्लिम वोट मिले, तो 2017 में 27 फीसदी।
गुजरात की कुल जनसंख्या में 2011 की जनगणना के अनुसार हिंदू 88.57 फीसदी थे, तो लगभग 10 फीसदी मुसलमान है, और उस लिहाज से विधानसभा की कुल 182 सीटों में से कम से कम 18 सीटों पर कांग्रेस से उन्हें हिस्सेदारी चाहिए, लेकिन पिछली बार भी केवल 6 उम्मीदवार ही कांग्रेस ने दिए थे।
इसीलिए यह कहा जा सकता है कि बीजेपी की सामाजिक समीकरण साधते हुए इन सीटों पर भी मुसलमान वोट महत्वहीन साबित करने की रणनीति सफल होती लग रही है, क्योंकि यहां के बहुसंख्यक हिंदुओं का मतदान ज्यादा करवाने की कोशिश हो रही है, तो मुसलमान वोट खींचने की कोशिश में कांग्रेस के सामने केजरीवाल और ओवैसी भी चुनाव मैदान में सज्ज हैं।
गुजरात की राजनीतिक धड़कनों की समझ रखनेवाले डीसा के डॉ. जितेंद्र नागर कहते हैं कि गुजरात में कांग्रेस अपनी अतितुष्टिकरण की कीमत चुका रही है। संघ परिवार के करीबी डॉ नागर की राय में इस चुनाव में मुसलमान कांग्रेस का साथ छोड़ता साफ दिख रहा है, क्योंकि उसके पास बेहतर विकल्प हैं।
वे कहते हैं कि कांग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति के मुकाबले दिल्ली में तुष्टिकरण की धार ज्यादा पैनी रखने वाले केजरीवाल भी गुजरात में मुसलमानों के मामले में चुप है, तो इसी से समझा जाना चाहिए कि वोट बैंक के तौर पर मुस्लिम समुदाय की कीमत केवल उन्हीं सीटों पर ज्यादा है, जहां वे जिताने की निर्णायक संख्या में है।
उधर, अहमदाबाद युवक कांग्रेस के नेता जगदीश माली का दावा है कि भले ही कोई कितनी भी कोशिश करे, लेकिन गुजरात में मुसलमानों का सबसे ज्यादा वोट कांग्रेस पार्टी को ही मिलेगा। माली कहते हैं कि केजरीवाल को मौसमी नेता माना जा रहा हैं और ओवैसी पर मुसलमान भरोसा नहीं करते। परंतु, डॉ नागर का यह विश्लेषण ज्यादा सही लगता है कि गुजरात में मुस्लिम वोटों का बंटवारा ना सिर्फ बीजेपी की जीत का आधार मजबूत कर रहा है बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी अल्पसंख्यकों के सियासी समीकरण बदलने की रणनीति में काफी महत्वपूर्ण साबित होगा।
दरअसल, सन 2002 में गोधरा के दंगों के बाद गुजरात की पूरी राजनीतिक तस्वीर ही बदल गई है। सांप्रदायिक दंगों की भीषण मार झेल चुके गुजरात में 2012 से पहले कांग्रेस को 80 फीसदी से अधिक मुस्लिम वोट मिलते थे। लेकिन अब कांग्रेस के लिए चिंताजनक हालात हैं।
फिर भी कांग्रेस मुसलमानों के हित में कुछ भी न बोलने को बाध्य है, तो केवल इसलिए क्योंकि गुजरात में संघ परिवार की प्रयोगशाला के विभिन्न राजनीतिक प्रयोगों ने जो सामाजिक समीकरण बदले हैं, उनकी वजह से गुजरात में कोई भी राजनीतिक दल खुलकर मुसलमानों के लिए बोलने से भी हिचकता है। उसकी सबसे बड़ी पैरौकार रही कांग्रेस ने भी सॉफ्ट हिंदुत्व का रास्ता अपना लिया।
कांग्रेस के लगातार राजनीतिक क्षरण से अब मुसलमानों को नए सिरे से यह चिंतन करना पड़ रहा है कि वे किसके साथ रहें, और रहें तो किस वजह से रहें, व क्यों तथा कैसे रहें। लेकिन यह हो क्यों रहा है, यह सवाल अनसुलझा इसलिए नहीं है क्योंकि लोकतंत्र में यह स्थापित सत्य है कि जिसकी जितनी ताकत है, उसको उतना ही महत्व मिलना चाहिए।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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