Shivraj Singh Chouhan: मध्य प्रदेश में प्रचंड जीत का असली नायक कौन?
Shivraj Singh Chouhan: 2003 में साध्वी उमा भारती के चेहरे, स्व. अनिल माधव दवे के संगठन शास्त्र तथा पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के विरुद्ध जबरदस्त एंटी-इन्कंबेंसी से भाजपा ने मध्य प्रदेश में ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए 42.50 प्रतिशत वोटों के साथ 173 विधानसभा सीटें प्राप्त की थीं किंतु 2023 में सत्ता में रहते हुए बिना मुख्यमंत्री चेहरे के यदि भाजपा 48.57 प्रतिशत वोटों के साथ 163 सीटों पर विजयी हुई है तो यह उसके इतिहास की सबसे बड़ी जीत है।
2018 में भाजपा को प्राप्त 41.02 प्रतिशत वोटों में इस बार 7.55 प्रतिशत का इजाफा होना यह दर्शाता है कि पार्टी ने मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के पैरों तले उसकी राजनीतिक जमीन खिसका दी है। हालांकि भाजपा की इस प्रचंड जीत के बावजूद शिवराज कैबिनेट के 31 में से 12 मंत्रियों को हार का सामना करना पड़ा है और यह उन मंत्रियों के विरुद्ध उनके क्षेत्र की जनता की नाराजगी को दर्शाता है। भाजपा ने बसपा का 2.5 प्रतिशत, निर्दलीयों का 3 प्रतिशत तथा सपा, आप व अन्य का 3 प्रतिशत वोट अपने पाले में किया। इस जीत का श्रेय कई फैक्टर्स को दिया जा सकता है किंतु वास्तविकता में इस जीत का असली नायक कौन है?

एमपी का एमवाई समीकरण
लोकतंत्र में एम-वाई अर्थात मुस्लिम-यादव समीकरण के बारे में सुनकर बड़े हुए लोगों को मध्य प्रदेश के भाजपा संगठन ने नई परिभाषा से परिचित करवाया है जहां एम अर्थात महिला और वाई अर्थात यूथ। राजनीति का यह न्यू नार्मल अब आगामी विधानसभा चुनावों से लेकर 2024 के आम चुनाव में भाजपा की सबसे बड़ी ताकत बनने जा रहा है। प्रदेश में शिवराज सिंह ने इसी न्यू नार्मल के चलते 'मामा' की छवि बनाई जो पिछले 18 वर्षों से उन्हें राजनीतिक बल देती जा रही है। चुनाव परिणाम देखकर यदि यह कहा जाए कि प्रदेश में शिवराज ही 'लाड़ले' और भाजपा ही 'लाड़ली' है, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।
लाड़ली बहनों ने सारे कांटें निकाल दिए
मतदाताओं के मौन, संगठन की सरकार को लेकर प्रतिकूल रिपोर्ट तथा कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाते मीडिया ने 'कांटे की टक्कर है' का नारा बुलंद किया तो ऐसा प्रतीत हुआ कि क्या वास्तव में सरकार के विरुद्ध एंटी-इन्कंबेंसी की बयार चल रही है? जब शिवराज सिंह से भी यह प्रश्न पूछा गया तो उन्होंने स्पष्ट कहा, 'कोई कांटें की टक्कर नहीं है, लाड़ली बहनों ने सारे कांटें निकाल दिए हैं।'
अब जबकि अंतिम चुनाव परिणामों का विश्लेषण हो रहा है तो उनकी यह बात सत्य साबित होती दिख रही है। एक करोड़ 31 लाख महिलाएं, जो लाड़ली बहना योजना से लाभान्वित हैं और वर्तमान में 1250 रुपए प्रतिमाह का लाभ ले रही हैं, उन्होंने भाजपा की झोली वोटों से भर दी है। 34 से अधिक विधानसभा सीटों पर लाड़ली बहनों ने 7 से 8 प्रतिशत अधिक मतदान किया। इसके अलावा महिलाओं ने शिवराज सिंह के इमोशनल कार्ड के चलते भी उनका साथ दिया। 'लड़ूं या जाऊं' ने केंद्रीय नेतृत्व को भी कहीं न कहीं असहज किया और चुनावी रण के अंतिम प्रहर में शिवराज सिंह फ्री हिट पर खेलते नजर आए।
165 से अधिक जनसभाओं, रैलियों, रोड शो ने शिवराज की राह के भी कांटें निकाल दिए। पूर्व में लाड़ली लक्ष्मी योजना, मुख्यमंत्री कन्यादान योजना आदि का सफल क्रियान्वयन महिलाओं के बीच शिवराज सिंह को भरोसेमंद साबित कर गया अन्यथा तो कमलनाथ ने भी महिलाओं के लिए 'नारी वंदन योजना' की घोषणा की थी किंतु 'मामा' की छवि ने उनकी योजना को ध्वस्त कर दिया। लाड़ली बहना का जादू इस तथ्य से भी साबित होता है कि भाजपा ने 27 महिलाओं को चुनावी रण में उतारा था जिसमें से 21 को विजयश्री प्राप्त हुई है जबकि कांग्रेस की 29 महिला प्रत्याशियों में से मात्र 7 ही चुनाव जीत सकी हैं।
मालवा-निमाड़ ने खोला जीत का दरवाजा
वोटों के लिहाज से मध्य प्रदेश में देश की सर्वाधिक वनवासी आबादी है। 2018 में मालवा-निमाड़ के वनवासी क्षेत्र ने कांग्रेस का हाथ थामा तो भाजपा सत्ता से दूर हो गई थी। हालांकि 2020 में मुख्यमंत्री बनने के पश्चात शिवराज सिंह ने अपना सर्वस्व इस क्षेत्र में झोंक दिया। युवा आयोग के अध्यक्ष डॉ. निशांत खरे ने मुख्यमंत्री का प्रतिनिधि बनकर वनवासी क्षेत्रों को मथने का काम किया। पेसा कानून ने वनवासी वर्ग को भाजपा के नजदीक कर दिया।
मालवा-निमाड़ की 66 में से 48 सीटें जीतकर भाजपा ने कांग्रेस के मजबूत वोट बैंक को उससे दूर कर दिया जबकि 2018 में भाजपा को मात्र 29 सीटें ही इस क्षेत्र से मिली थीं। प्रदेश के सबसे बड़े शहर इंदौर में 9 की 9 विधानसभा सीटों पर कमल खिला। यहां राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय को चुनावी मैदान में उतार कर संगठन ने उनकी क्षमताओं का भरपूर लाभ लिया और पूरे क्षेत्र में उनकी सक्रियता ने जयस, बाप जैसे दलों की रणनीति को फेल कर दिया। यहां तक कि दलित वर्ग की बहुलता वाली 35 में से 26 सीटों पर भाजपा विजयी रही।
जीत के ये भी रहे अहम किरदार
केंद्रीय नेतृत्व ने जब तीन केंद्रीय मंत्रियों सहित 4 सांसद और राष्ट्रीय महासचिव सहित अन्य मोर्चा पदाधिकारियों को टिकट दिया तो ऐसा लगा कि अब प्रदेश में गुटबाजी चरम पर होगी किंतु केंद्रीय नेतृत्व ने व्यक्ति के चेहरे के स्थान पर कमल को ही चेहरा बना दिया। इससे सभी को फ्रीहैण्ड मिला और सभी ने अपने-अपने क्षेत्रों में अपेक्षा से बढ़कर परिणाम दिए।
हालांकि सांसद गणेश सिंह सतना से और केंद्रीय मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते निवास से चुनाव हार गए किंतु इनके क्षेत्र में रहने से अन्य सीटों पर कार्यकर्ताओं में जोश भरा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गारंटी, गृह मंत्री अमित शाह का कुशल प्रबंधन, केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और अश्विनी वैष्णव की मोनिटरिंग, संगठन का बूथ मैनेजमेंट, सनातन का मुद्दा जैसे फैक्टर्स ने भी हृदय प्रदेश में कमल खिला दिया। तीन माह पूर्व हारी हुई 39 सीटों पर टिकट वितरण का फैसला भी पार्टी में पक्ष में रहा क्योंकि इनमें से 24 सीटों पर पार्टी उम्मीदवार को जीत मिली।
हालांकि इन सबके बीच अब मुख्यमंत्री कौन हो की चर्चा अहम है। फिलहाल तो मध्य प्रदेश में बंपर जीत दिलानेवाले 'पाँव-पाँव वाले भैया' इस रेस में सरपट दौड़ लगाते दिख रहे हैं। वैसे भी अगर मध्य प्रदेश में बंपर जीत का नायक किसी को कहा जा सकता है तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ही हैं जिन्होंने अपनी दूरदर्शिता से पार्टी में वरिष्ठ नेताओं के विरोध के बावजूद लाड़ली बहना जैसी योजना को जमीन पर उतारा और वोटों की बंपर फसल काट ली।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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