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Movie on Ravindra Kaushik: मूवी के जरिए जिन्दा होगा पाकिस्तानी फौज में मेजर बनने वाला भारतीय 'ब्लैक टाइगर'

अनुराग बासु ने कभी पुरुलिया कांड पर जग्गा जासूस मूवी बनाई थी। अब फिर वो एक जासूसी फिल्म लेकर आ रहे हैं। उनकी नयी मूवी रॉ के एजेंट रवीन्द्र कौशिक की कहानी है जिसे कभी इंदिरा गांधी ने ‘ब्लैक टाइगर’ नाम दिया था।

Movie on The Black Tiger Ravindra Kaushik became Major in Pakistani Army

Movie on Ravindra Kaushik: भारतीय जासूस रवीन्द्र कौशिश पाकिस्तानी सेना में मेजर के पद तक पहुंच गये थे, लेकिन उनके पकड़े जाने के बाद जो हुआ उससे रॉ समेत सारी खुफिया एजेंसियों और सरकार पर तो आज तक सवाल उठते ही हैं, कौशिक की कहानी पर ऐसा अंधेरा छाया कि कई बार ऐलान होने के बावजूद रवीन्द्र कौशिक पर आज तक कोई आधिकारिक फिल्म नहीं बन पाई।

दरअसल 1968 में जब रामनाथ कॉव ने इंदिरा गांधी के कहने पर रिसर्च एंड एनालिसिस विंग की शुरुआत की थी, तब इसके लिए योग्य एजेंट्स बनाने की प्रक्रिया शुरू हो गई। लेकिन इन एजेंट्स के पकड़े जाने पर उनको बचाने के लिए क्या करना है, इसकी कोई योजना तैयार नहीं की गई। यहां तक कि उनके बाद उनके परिवार को ठीक से आर्थिक मदद ही मिल जाए, ये भी तय नहीं किया गया। रवीन्द्र कौशिक के मामले में भी उनके परिवार को केवल 500 रुपए महीने की सहायता मंजूर की गई, कुछ सालों के बाद उसे बढ़ाकर 2000 रुपया प्रति महीना किया गया। 2006 में उनकी मां की मौत तक ये पैसा मिला। सोचिए उन दिनों भी उनके परिवार ने इस मामूली राशि से कैसे गुजारा किया होगा?

एक था टाइगर, वॉर, मिशन मजनूं और पठान देखकर रोमांचित हो रहे युवाओं के लिए रवीन्द्र कौशिक की सच्ची कहानी काफी रोमांचकारी हो सकती है कि कैसे पाक बॉर्डर पर बसे गंगानगर (राजस्थान) में जन्मे रवीन्द्र अपने कॉलेज के हीरो थे। स्पोर्ट्स से लेकर थिएटर तक उनकी धाक थी। पिता एयरफोर्स में थे। 1962 के युद्ध में वीर अब्दुल हमीद के वीरता भरे बलिदान से प्रभावित होकर देश के लिए कुछ करना चाहते थे। देश भर में एजेंट्स ढूंढ रहे तब के रॉ अधिकारियों ने 20 साल के इस लड़के को थिएटर में एक देशभक्ति के नाटक में एक्टिंग करते देखा तो उन्हें रॉ ज्वॉइन करने का प्रस्ताव दिया।

देशभक्ति से ओतप्रोत रवीन्द्र की बांछें खिल गई थीं, शायद वो उम्र का असर था, बिना घरवालों को बताए उर्दू और मुस्लिम तौर तरीकों का प्रशिक्षण शुरू कर दिया। पंजाबी उसकी पहले से ही बेहतर थी। रॉ ने भारत से उनका सारा रिकॉर्ड गायब कर दिया और 23 साल की उम्र में सरहद पार करवा के पाकिस्तान भिजवा दिया। रवीन्द्र कौशिक ने कराची यूनीवर्सिटी में नबी अहमद शाकिर के नाम से एडमिशन लिया, एलएलबी की और एक दिन पाक सेना में नौकरी भी मिल गई। धीरे धीरे मेजर के पद तक भी जा पहुंचे रवीन्द्र कौशिक। उनके बारे में लिखी गई तमाम किताबों में ये दावा किया जाता है कि उनकी वजह से 1974 से 1983 के बीच दर्जनों खुफिया जानकारी उन्होंने दीं जिसके चलते लाखों भारतीयों की जान बचाई गई।

कहानी खराब हुई इनायत मसीह नाम के एक रॉ एजेंट की सरहद पार गिरफ्तारी के बाद। वो पाकिस्तानी प्रताड़ना में टूट गया और उसने रवीन्द्र कौशिक का राज भी खोल दिया। उसके बाद शुरू हुआ प्रताड़ना का दौर, फांसी की सजा भी मिली, जिसे पाक सुप्रीम कोर्ट ने घटाकर उम्र कैद में बदल दिया। जेलों में यातनाएं सहने के बाद एक दिन 2001 में टीबी और दिल की बीमारियों के चलते मियांवाली जेल में रवीन्द्र कौशिक की मौत हो गई।

हाल ही में नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई फिल्म 'मिशन मजनूं' में रवीन्द्र कौशिक का रोल सिद्धार्थ मल्होत्रा ने किया है। जानकारी के मुताबिक उसने पाक सेना में एक टेलर की बेटी अमानत से शादी कर ली थी। ये तो इस मूवी में भी दिखाया गया है लेकिन उसे मेजर के पद तक पहुंचते या जेल जाते नहीं दिखाया बल्कि भागने की कोशिश में एयरपोर्ट पर ही एनकाउंटर दिखा दिया गया है। मूवी में रवीन्द्र कौशिक की पत्नी की दुबई में मदद करते रॉ चीफ रामनाथ काव को भी दिखाया गया है, लेकिन हकीकत में तो कौशिक की मां को 500 रुपए ही मिलते थे। वो भी तब जबकि इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं।

भारतीय फिल्मकारों ने रवीन्द्र कौशिक की सच्चाई खुलकर शायद कभी इसलिए नहीं बताई क्योंकि इससे इंदिरा सरकार की पोल खुलने का डर था। अपनी मां को लिखी चिट्ठियों में देश की सरकारों के प्रति रवीन्द्र कौशिक की नाराजगी साफ झलकती है। वो लिखते हैं, "क्या भारत जैसे देश के लिए कुर्बानी देने वालों को यही मिलता है?"

'मिशन मजनूं' देखकर थोड़ी सी झलक मिल सकती है कि उस व्यक्ति ने कैसे पाकिस्तानी न्यूक्लियर रिएक्टर का खुलासा करके भारत सरकार की मदद की थी। हालांकि रॉ पर इंदिरा गांधी की व्यक्तिगत एजेंसी बनकर विपक्षी नेताओं की जासूसी करने के आरोपों के चलते मोरारजी सरकार ने उसका बजट आधा कर दिया था। लेकिन इस राजनीतिक अंदरूनी लड़ाई का खामियाजा इन एजेंट्स को भुगतना पड़ा था। कितनी भी किताबें, मीडिया रिपोर्ट्स या फिल्में देख लीजिए, हर कोई रॉ के संस्थापक चीफ राम नाथ कॉव की तारीफें ही करता है, लेकिन रवीन्द्र कौशिक की कहानी सबसे ज्यादा उन्हीं पर सवाल है कि क्यों एजेंट्स के पकड़े जाने के बाद उनके परिवार की मदद की व्यवस्था नहीं की गई।

कौशिक के पिता तो उनकी खबर सुनकर दिल के दौरे से चल बसे तो मां को पता ही नहीं था कि उनका बेटा पाकिस्तान में है। जब पता चला तो मामूली 500 रुपए की पेंशन बांध दी गई। आज कौशिक की मां और चंद्रशेखर आजाद की मां में क्या अंतर रह जाता है? फिल्म वाले भी पता नहीं किस दवाब में उन पर फिल्म बनाने से डरते रहे। लेकिन कौशिक के किरदार के इर्दगिर्द थोड़े से फेरबदल के कई फिल्में बनीं।

इनमें कबीर खान की 'एक था टाइगर' को तो शुरू में कौशिक की कहानी कहकर ही बेचा गया। सलमान पहले से ही राजकुमार गुप्ता के साथ कौशिक की बायोपिक करने वाले थे, शायद यशराज के ऑफर के चलते उन्होंने राजकुमार गुप्ता को झटका दे दिया। लेकिन कबीर खान बाद में मुकर गए कि मैं तो पहली बार कौशिक के बारे में जान रहा हूं। केस कोर्ट भी गया लेकिन मूवी में कई फेरबदल हो चुके थे, कुछ नहीं हो पाया। हालांकि हर कोई जानता है कि कौशिक को ही 'ब्लैक टाइगर' कहा जाता था, उसी से इस सीरीज के लिए 'टाइगर' नाम तय हुआ।

'मिशन मजनूं' भी आईबी अधिकारी बी रामन की किताब के इनपुट के आधार पर कौशिक की ही कहानी बताती है। टेलर की बेटी से हीरो शादी भी करता है, लेकिन उसको केवल न्यूक्लियर रिएक्टर की कहानी तक ही समेटकर हीरो का एनकाउंटर दिखा दिया गया है। उसमें भी परिवार को कोई कॉपीराइट आदि का पैसा नहीं दिया गया होगा। इसी तरह अनुराग बासु की 'जग्गा जासूस' भी उसी तरह की कहानी है।

देखा जाए तो अनुराग बासु दोबारा कौशिक की कहानी कहने जा रहे हैं, इस बार आधिकारिक तौर पर। 'जग्गा जासूस' जासूसी से ज्यादा कॉमेडी फिल्म बनकर रह गई। शायद इसीलिए इस बार अनुराग बासु की समझ आया हो कि बिना नाम लिए उन्होंने कौशिक की कहानी के साथ जो किया, उसको नाम के साथ सच्ची श्रद्धांजलि देने का वक्त आ गया है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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