Mosque in Ayodhya: अयोध्या में नबी के नाम पर मस्जिद क्यों?
Mosque in Ayodhya: अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का पहला चरण जैसे जैसे पूरा होने के करीब आ रहा है वैसे वैसे अयोध्या शहर के पास धन्नीपुर में मुसलमानों को मस्जिद के लिए दी गयी जमीन भी चर्चा में आ रही है। खबर आयी है कि "जल्द ही" मुसलमानों के लिए पाक शहर मक्का के इमाम अब्दुल रहमान अल सुदैस इस मस्जिद की नींव रखेंगे। लेकिन अयोध्या से 22 किलोमीटर दूर बननेवाली इस मस्जिद में कई बातें ऐसी हो रही हैं जो चौंकानेवाली हैं और इस्लाम में नये चलन की शुरुआत जैसी हैं।
सबसे पहली बात तो खुद इस मस्जिद का नाम ही है। कुछ महीने पहले मस्जिद निर्माण करनेवाली समिति ने ऐलान किया था कि इस मस्जिद का नाम मोहम्मद बिन अब्दुल्ला मस्जिद होगा। मोहम्मद बिन अब्दुल्ला इस्लाम के माननेवालों के पैगंबर, नबी या रसूल हैं। वैसे तो मुसलमान अपने नबी का नाम मोहम्मद ही लेते हैं और साथ में सल्ललाहेवसल्लम लगाकर उनके प्रति अपना सम्मान प्रकट करते हैं। लेकिन हदीसों में आये विवरण के मुताबिक उनका पूरा नाम मोहम्मद बिन अब्दुल्ला था इसलिए अयोध्या में बननेवाली मस्जिद का नाम यही रखा गया है।

इस्लामिक इतिहास में संभवत: यह पहला मौका है जब मुस्लिम समुदाय सऊदी अरब के बाहर अपनी किसी मस्जिद का नामकरण अपने पैगंबर के नाम पर कर रहे हैं। दुनिया में कहीं भी पैगंबर के नाम पर कोई मस्जिद नहीं है। उस मक्का शहर में भी नहीं, जहां प्रमाणिक हदीसों में उनका जन्म हुआ बताया जाता है। उनके नाम पर सिर्फ मदीना में एक मस्जिद है जिसे मस्जिद ए नबवी कहा जाता है। यानी नबी के नाम की मस्जिद। इस्लामिक जानकारों द्वारा ऐसा बताया जाता है कि जहां यह मस्जिद ए नबवी है वहीं पर पैगंबर की कब्र है, इसलिए दुनियाभर के मुसलमानों के लिए यह एक पवित्र स्थान है। इसके अलावा दुनिया में कहीं भी नबी के नाम पर दूसरी मस्जिद नहीं है।
फिर सवाल यह है कि क्या सोचकर भारत के इस्लामिक आलिमों ने अयोध्या की मस्जिद का नाम अपने पैगंबर के नाम पर रखा है? जैसा कि इस्लामिक इतिहास है उसके मुताबिक नबी के नाम पर मदीना में सिर्फ एक मस्जिद संभवत: इसलिए है क्योंकि यह जगह उनके जीवन से जुड़ी रही है। मक्का से वो मदीना आये थे और यहीं पर उन्होंने पहली इस्लामिक रियासत बनायी थी, जिसे मुस्लिम समुदाय रियासत ए मदीना के रूप में एक आदर्श रियासत मानता है। मदीना में इस मस्जिद का नाम उनके नाम पर इसलिए भी है क्योंकि वहीं पर उनकी कब्र है। लेकिन अयोध्या से उनके पैगंबर का ऐसा क्या नाता रहा है जो धन्नीपुर में बननेवाली मस्जिद का नाम उन्होंने अपने पैगंबर के नाम पर रखा है?
अब क्योंकि इस मस्जिद की नींव रखने स्वयं काबा के इमाम आ रहे हैं तो इसका मतलब है कि शीर्ष इस्लामिक जानकारों को भी इस पर कोई आपत्ति नहीं है। अगर होती तो निश्चित ही वो मदीना से बाहर अपने नबी के नाम पर बननेवाली मस्जिद पर ऐतराज करते। तब सहज ही एक सवाल मन में आता है कि क्या रामजन्मभूमि पर बननेवाले मंदिर की प्रतिक्रिया में यहां बननेवाली मस्जिद का नाम उन्होंने अपने नबी के नाम पर रखा है?
9 नवंबर 2019 को जब सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद मामले में फैसला सुनाया था तब जन्मस्थान पर रामलला का दावा स्वीकार करते हुए वह जगह रामलला विराजमान को समर्पित कर दी थी। इसके बदले में मुस्लिम पक्षकारों को वहां से 22 किलोमीटर दूर धन्नीपुर में 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया था जहां वो मस्जिद बना सकते थे। सुप्रीम कोर्ट ने जैसे हिन्दू पक्ष को ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया था वैसे ही मुस्लिम पक्ष को भी ट्रस्ट बनाकर प्रस्तावित मस्जिद निर्माण और संचालन के लिए कहा था। इसलिए इस फैसले के बाद जहां हिन्दू पक्ष ने श्रीरामजन्मभूमि तीर्थक्षेत्र न्यास बनाया था वहीं मुस्लिम पक्षकारों ने जुलाई 2020 में इन्डो इस्लामिक कल्चरल सेन्टर की स्थापना की थी, जबकि कोर्ट द्वारा जमीन का मालिकाना हक यूपी सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड को दिया गया था।
इसके बाद तत्काल दोनों पक्षों ने नये निर्माण की तैयारी शुरु कर दी थी। हिन्दू पक्ष को कभी कोई समस्या नहीं आयी और फैसले के तीन साल के बाद मंदिर के काम का पहला चरण लगभग पूरा होनेवाला है। 22 जनवरी 2024 को प्रधानमंत्री मोदी की उपस्थिति में मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होने जा रही है। इस बीच मंदिर ट्रस्ट को देशभर से दिल खोलकर दान भी मिला और तेजी से काम भी शुरु किया गया। मंदिर परिसर का जितना प्रस्तावित खर्च है उससे तीन गुना अधिक पैसा ट्रस्ट को मिला है और आज भी नियमित मिल रहा है। लेकिन दूसरी ओर धन्नीपुर मस्जिद की आज तक नींव नहीं पड़ सकी है।
बताने के लिए यह भले बताया जा रहा है कि मक्का के इमाम इस मस्जिद की नींव रखेंगे लेकिन जैसी खबरें आ रही हैं, मस्जिद का काम शुरु होने के पहले ही ट्रस्ट के सामने कई चुनौतियां हैं। सबसे बड़ी चुनौती तो पैसे की ही है। इसका कारण यह है कि कोर्ट में मुस्लिम पक्षकार के रूप में मस्जिद ए जन्मस्थान (बाबरी मस्जिद) का केस लड़नेवाली संस्था आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने यह कहते हुए ऐतराज जता दिया था कि खैरात की जमीन पर खैरात के पैसे से बननेवाली मस्जिद में नमाज पढने से शवाब नहीं मिलता है। इसके साथ ही असदुद्दीन ओवैसी ने भी खैरात में मिली जमीन पर मस्जिद बनने का विरोध किया था।
स्वाभाविक है मुसलमानों के मन में धन्नीपुर में बनने वाली मस्जिद के लिए वैसा कोई भावनात्मक लगाव नहीं है जैसा कि अयोध्या में बननेवाले मंदिर को लेकर हिन्दुओं का है। इसलिए न तो पैसा इकट्ठा हो रहा है और न ही मुस्लिम समुदाय में इसे लेकर उत्साह दिख रहा है। धन्नीपुर मस्जिद का कुल बजट करीब 500 करोड़ का है लेकिन अभी शुरुआती खर्च के लिए 12 करोड़ रूपये का जुगाड़ भी नहीं हो पाया है। इसके कारण मस्जिद की नींव रखने में भी देर हो रही है। मस्जिद कमेटी को पिछले साल दिसंबर 2022 तक जो 40 लाख का दान मिला था उसमें 40 प्रतिशत हिस्सा हिन्दुओं ने दिया था।
शायद यही कारण है कि शुरुआत में जो डिजाइन तैयार करवायी गयी थी उसे भी बदल दिया गया है। ऊपर से दिल्ली की दो बहनों ने यह कहते हुए 2021 में जमीन पर दावा कर दिया था कि यह जमीन उनके पुरखों को आवंटित की गयी थी। इस पर उनका मालिकाना हक है जिसे किसी और को नहीं दिया जा सकता।
संभवत: इन्हीं चुनौतियों से निपटने के लिए ट्रस्ट ने मस्जिद का नाम अपने नबी के नाम पर रखने का फैसला किया होगा। शुरुआत में इस मस्जिद का नाम भारत के मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानी अहमदुल्लाह शाह के नाम पर रखने का फैसला लिया गया था। लेकिन इसी साल इसे बदल दिया गया। ऐसा संभवत: इसलिए ताकि नबी का नाम जुड़ने पर मुस्लिम समुदाय का उत्साह बढ़े और इस मस्जिद का निर्माण संभव हो सके।
इसका प्रतीकात्मक महत्व भी होगा कि अयोध्या में अगर हिन्दुओं के आराध्य राम के नाम का मंदिर रहेगा तो मुस्लिमों के नबी के नाम की मस्जिद भी रहेगी। लेकिन इतना सब करने के बाद भी इस बात की उम्मीद कम है कि निकट भविष्य में 'जल्द से जल्द' इस मस्जिद का निर्माण पूरा हो सकेगा। धन्नीपुर मस्जिद की राह में सबसे बड़ी बाधा धन की है जो दूर होती नहीं दिख रही है। हां अब भाजपा के नेता हाजी अराफात शेख इस मस्जिद ट्रस्ट के चेयरमैन नियुक्त किये गये हैं। देखना यह होगा कि उनकी देखरेख में काम कितना आगे बढता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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