Modi Speech: परिवारवाद, भ्रष्टाचार और जातिवाद पर मोदी की जंग तेज

लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस के जवाब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव का राजनीतिक एजेंडा सेट कर दिया है। वैसे तो राम जन्मभूमि मन्दिर का बनना और 370 का हटना 2024 के लोकसभा चुनावों के मुख्य मुद्दे होंगे, जिन पर देश की जनता वोट करेगी।

लेकिन मोदी ने अपने भाषण में तीन ज्वलंत मुद्दे उठाए, जिनमें से दो मुद्दे उनके अपने थे, जबकि तीसरा मुद्दा प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी का था। ये तीनों मुद्दे चुनावों में बड़े मुद्दे हो सकते हैं। राहुल गांधी और कांग्रेस का चुनावी मुद्दा जाति आधारित जनगणना है।

Modi Speech

कांग्रेस ऐसा मानती है कि इस मुद्दे के माध्यम से वह पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों को हिन्दुओं से अलग करके चुनावी नैया पार कर सकती है। मोदी और भाजपा इसे हिन्दुओं की एकता को तोड़ने की साजिश के रूप में देखते है। मोदी ने अपने भाषण में कांग्रेस के इस मुद्दे का जवाब दिया, तो दूसरी तरफ परिवारवाद की राजनीति और भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी जंग के दोनों मुद्दों को जानदार ढंग से पेश करके समूचे इंडी एलायंस को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

मोदी ने आरोप लगाया कि भ्रष्टाचार के आरोप में सजायाफ्ता नेता इंडी एलायंस का नेता है। वह लालू यादव का जिक्र कर रहे थे, जो इंडी एलायंस की हर बैठक में शामिल हो रहे हैं, वह चारा घोटाले में सजा काट चुके है, चारा घोटाले के ही एक अन्य मामले में सजा भुगत रहे हैं और पैरोल पर रिहा हैं।

मोदी की ओर से देश की जनता के सामने पेश किए गए इस एक उदाहरण से इंडी एलायंस की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा हो गया है। लालू यादव का पूरा कुनबा रेलवे में नौकरियों के बदले गरीबों की जमीनें अपने नाम करवाने के आरोपों में भी चार्जशीटेड है।

Ajay Setia

लालू यादव खुद और उनका कुनबा परिवारवाद और भ्रष्टाचार का एक ऐसा उदाहरण है, जो जातिवाद की राजनीति के चलते बिहार में भले ही अपनी जमीन बनाए हुए हैं, लेकिन सारे देश में इंडी एलायंस के लिए नुकसानदेह साबित होगा। इस एक उदाहरण से मोदी ने इंडी एलायंस के उस प्रचार का भी जवाब दे दिया कि सरकार ईडी, सीबीआई और इनकम टेक्स विभाग का अपने विरोधियों के खिलाफ इस्तेमाल कर रही है।

विपक्ष की ओर से राजनाथ सिंह और अमित शाह का उदाहरण देकर परिवारवाद की राजनीति के आरोपों का जवाब दिया जाता है। इससे पहले प्रेम कुमार धूमल और उनके बेटे अनुराग ठाकुर का भी उदाहरण दिया जाता था। मोदी जब भी परिवारवाद की राजनीति पर हमला करते हैं, कांग्रेस असहज हो जाती है। कांग्रेस के नेता गांधी परिवार के बचाव में उतर आते हैं।

सदन में भी जब मोदी ने परिवारवाद पर हमला बोला, तो कांग्रेस के सांसदों ने राजनाथ सिंह और अमित शाह का उदाहरण दिया। राजनाथ सिंह के दो बेटे हैं, पंकज सिंह और नीरज सिंह। बड़ा बेटा पंकज सिंह उत्तर प्रदेश विधानसभा का सदस्य है। वह बीस साल से भारतीय जनता युवा मोर्चे और भाजपा में सक्रिय हैं, लेकिन उन्हें पहली बार 2017 में विधानसभा का टिकट दिया गया।

अमित शाह का बेटा जय शाह फिलहाल तो राजनीति में नहीं है, फिर भी उसका नाम लिया गया। वैसे तो देश के ज्यादातर नागरिक समझते हैं कि मोदी जब परिवारवाद की राजनीति की बात करते हैं, तो उनके कहने का क्या मतलब होता है, लेकिन जब कांग्रेस के सांसदों ने राजनाथ सिंह और अमित शाह की बात की, तो मोदी ने इसे विस्तार से समझा दिया कि परिवारवाद की राजनीति क्या होती है। यह जवाब राहुल गांधी को भी दिया गया है, जिन्होंने ब्रिटेन में परिवारवाद की राजनीति पर पूछे गए सवाल में यही जवाब दिया था, जो कांग्रेसी सांसदों ने सदन में दिया।

वैसे तो उनका यह एक लाईन का जवाब काफी था कि राजनाथ सिंह और अमित शाह की अपनी पार्टियां नहीं हैं। लेकिन उन्होंने विस्तार से समझाया कि एक परिवार से एक नहीं चाहे दस लोग राजनीति में आएं, इससे लोकतंत्र को कोई खतरा नहीं होता। लोकतंत्र को खतरा तब होता है, जब राजनीतिक पार्टियों पर एक परिवार का कब्जा हो जाता है, इसे परिवारवाद की राजनीति कहते हैं। जैसे तेजस्वी यादव की राजद, अखिलेश यादव की सपा, स्टालिन की द्रमुक, उद्धव ठाकरे की शिवसेना, राहुल गांधी की कांग्रेस, सुखविंदर सिंह बादल का अकाली दल, हेमंत सोरेन का झारखंड मुक्ति मोर्चा। इन सभी नेताओं को पार्टियां और उनका नेतृत्व अपने पिता से विरासत में मिला।

परिवारवाद और भ्रष्टाचार के बाद नरेंद्र मोदी ने जातिवाद की राजनीति पर हमला किया। कांग्रेस के सर्वेसर्वा राहुल गांधी ने जाति आधारित राजनीति को 2024 के लोकसभा चुनाव का मुख्य मुद्दा बना लिया है। नरेंद्र मोदी जो कांग्रेस के जाति आधारित राजनीति के जवाब में कहते रहे हैं कि वह देश में गरीब और अमीर दो ही जातियां मानते हैं, उन्होंने अपने जवाब को धारदार बनाते हुए कहा कि उन्हें सबसे बड़ा ओबीसी दिखाई नहीं देता, जिसे देश ने प्रधानमंत्री के रूप में चुना है।

राहुल गांधी ने इसके जवाब में ट्विट करके लिखा कि "प्रधानमंत्री इस बीच अक्सर कह रहे थे कि देश में सिर्फ दो जातियां हैं - अमीर और गरीब, मगर आज संसद में उन्होंने खुद को 'सबसे बड़ा ओबीसी' बताया। किसी को छोटा और किसी को बड़ा समझने की इस मानसिकता को बदलना जरूरी है।"

मोदी ने कब किसी को छोटा और बड़ा कहा था, असल में राहुल गांधी को जितना समझाया जाता है, उनका हर जवाब और हर टिप्पणी उसी के इर्दगिर्द रहती है। राहुल गांधी ने अपने ट्विट में आगे कहा कि ओबीसी हों, दलित हों या आदिवासी, बिना गिनती के उन्हें आर्थिक और सामाजिक न्याय नहीं दिलाया जा सकता। मोदी जी इधर उधर की इतनी बातें करते हैं, तो गिनती से क्यों डरते हैं?

राहुल गांधी के इस जातिवादी भडकाऊ राजनीति के दो जवाब हैं, एक जवाब तो इंडी एलायंस के नेता अखिलेश यादव और इंडी एलायंस के पूर्व नेता नीतीश कुमार दे चुके हैं। इन दोनों ने राहुल गांधी से पूछा है कि आज़ादी के बाद उनकी पार्टी की सरकारों ने 1951 में जाति आधारित जनगणना बंद क्यों करवाई थी। 1961, 1971, 1981, 1991 और 2011 में जनगणना के समय भी कांग्रेस की सरकारें थीं, तब पिछड़ी जातियों, दलितों और आदिवासियों के साथ अन्याय कौन कर रहा था।

राहुल गांधी और कांग्रेस के पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों के साथ इन्साफ की राजनीति में हकीकत होती तो पिछड़ी जाति के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इंडी एलायंस से बाहर क्यों निकलते। क्योंकि पिछड़ी जाति के नेता, चाहे वह अखिलेश यादव हों, या नीतीश कुमार, वे जानते हैं कि राहुल गांधी का जाति आधारित जनगणना का एजेंडा बाकी सब एजेंडे फेल हो जाने के कारण चुनावी एजेंडा मात्र है।

दूसरा जवाब नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में दिया, जब उन्होंने कर्पूरी ठाकुर का जिक्र करते हुए कहा कि (जनसंघ के समर्थन से) वह 1970 में अति पिछड़ी जाति के देश में पहले मुख्यमंत्री बने थे, जिनकी सरकार को कांग्रेस ने अस्थिर किया था। कर्पूरी ठाकुर को मोदी सरकार ने पिछले महीने ही सर्वोच्च भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया है।

राहुल गांधी जब जाति आधारित जनगणना की बात करते हैं, तो वह केंद्र सरकार के सचिवों का उदाहरण देकर कहते हैं कि वहां सिर्फ दो सचिव हैं। इसी के जवाब में मोदी ने कहा है कि वे गिनती करते रहते हैं कि सरकार में कितने ओबीसी हैं। क्या आप (कांग्रेस) यहां सबसे बड़ा ओबीसी नहीं देख सकते?" मोदी ने यह इसलिए कहा था क्योंकि अफसरों का काम सरकार के फैसलों का क्रियान्वयन करना होता है, फैसले अफसर नहीं, चुनी हुई सरकारें लेती हैं, और सरकार का मुखिया ही ओबीसी जाति से है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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