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Maratha Agitation: मराठा बनाम ओबीसी टकराहट की आहट से घबराहट

Maratha Agitation: महाराष्ट्र के जालना जिले में मराठा आरक्षण को लेकर चल रहा आंदोलन हिंसक हो गया। इसमें 50 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हो गए। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने दो बसों को आग के हवाले कर दिया और कई गाड़ियों में तोड़फोड़ कर दी। इस आंदोलन की आग में घी डालने के लिए मराठा नेता शरद पवार जालना पहुंच गए। प्रदेश के मराठा मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने आंदोलनकारियों से शांति बनाने की अपील तो की है, लेकिन मामला ठंडा होता नजर नहीं आ रहा है।

असल में मराठा समुदाय के लोग अपनी दुर्दशा के लिए महाराष्ट्र की सभी सरकारों को जिम्मेदार मान रहे हैं। कभी महाराष्ट्र में राजनीतिक और आर्थिक रसूख रखने वाला यह समुदाय अपने घटते प्रभुत्व से विचलित और चिंतित है। महाराष्ट्र में प्रभुत्वशाली माने जाने वाले मराठाओं का कहना है कि लंबे समय तक मुठ्ठीभर परिवारों की कामयाबी को समूचे समुदाय की कामयाबी के तौर पर पेश किया जाता रहा है।

Maratha Agitation: Panic at the sound of Maratha vs OBC clash

2013 में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता रहे नारायण राणे की अध्यक्षता वाली एक समिति ने मराठाओं की समस्याओं को लेकर एक रिपोर्ट राज्य सरकार को सौपी थी। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि राज्य की आबादी में मराठा 34 फीसदी हैं लेकिन सरकारी कर्मचारियों में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ 14 फीसदी है। उच्च शिक्षा और तकनीकी संस्थानों में इनका दाखिला सिर्फ 12 फीसदी है, जबकि महाराष्ट्र में आत्महत्या करने वाले किसानों में 36 फीसदी इसी मराठा समुदाय से हैं। नारायण राणे के नेतृत्व में बनी समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि बहुसंख्यक मराठा या तो किसान हैं या फिर रोजगार गांरटी योजना के तहत काम करने वाले मजदूर हैं। उनकी आर्थिक स्थिति दयनीय है।

राणे समिति ने सिफारिश की थी कि मराठों को शिक्षा और सरकारी नौकरी में 16 फीसदी आरक्षण दिया जाए। जुलाई 2014 में कांग्रेस एनसीपी की तत्कालीन सरकार ने इस बारे में एक आरक्षण नीति लागू भी की थी लेकिन मुम्बई हाईकोर्ट ने उस पर रोक लगा दी। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में 1990 से 2008 के बीच आई तीन आयोगों की रिपोर्ट को आधार बनाया था जिसमें कहा गया था कि मराठाओं को पिछड़ा नहीं माना जा सकता है।

इसके बाद बनी देवेन्द्र फड़नवीस की सरकार ने मराठा आंदोलन की आंच से बचने के लिए एक विधेयक पारित कर दिया था। इसके तहत राज्य की सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थाओं में मराठाओं को 16 फीसदी आरक्षण देने का प्रावधान किया गया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मराठा समुदाय के लिए सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि इसे लागू करने से 50 फीसदी की सीमा का उल्लंघन होता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मराठा समुदाय से संबंध रखनेवाले एकनाथ शिंदे के मुख्यमंत्री होते हुए भी सरकार के हाथ बंधे हुए हैं। महाराष्ट्र में फिलहाल अनुसूचित जाति को 15 फीसदी, अनुसूचित जनजाति को 7.5 फीसदी, अन्य पिछड़ा वर्ग को 27 फीसदी और अन्य को 2.5 फीसदी आरक्षण मिला हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मराठा आरक्षण मामला सुलगने की तैयारी में था लेकिन मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस ने अपने राजनैतिक कौशल का इस्तेमाल कर उस आंदोलन को ठंडा कर दिया था। लेकिन अब एक बार फिर मराठा आंदोलन की चिंगारी भड़क गई है। लेकिन सरकार के सामने मुश्किल यह है कि अगर मराठा समाज को अलग से आरक्षण दिया जाता है तो आरक्षण की अधिकतम सीमा पार हो जाएगी और अगर उन्हें पिछड़ा वर्ग में शामिल कर आरक्षण दिया गया तो ओबीसी की नाराजगी का खतरा है।

भाजपा तथा एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना और पश्चिम महाराष्ट्र के दिग्गज मराठा नेता एनसीपी के अजित पवार के लिए समस्या यह है कि अगर मराठा आरक्षण की मांग स्वीकार नहीं की जाती है तो मराठा वोट बैंक शरद पवार और उद्धव ठाकरे की ओर खिसकने का जोखिम है और अगर मराठा आंदोलन की मांग मानकर मराठा को ओबीसी में शामिल कर लिया जाता है तो महाराष्ट्र में ओबीसी वोट से हाथ धोना पड़ सकता है और ओबीसी आंदोलन भी शुरू हो सकता है।

महाराष्ट्र में मराठा और ओबीसी में हमेशा छत्तीस का आंकड़ा रहा है। पहले भी जब मराठा को ओबीसी में शामिल करने की बात होती रही है तब हमेशा इसका विरोध ही हुआ है। यहां तक कि बीजेपी के दिवंगत नेता गोपीनाथ मुंडे और एनसीपी के नेता छगन भुजबल जो दोनों ही ओबीसी की राजनीति करते रहे हैं, वो दोनों भी इस मामले में अपनी-अपनी पार्टियों की नीति से परे जाते हुए एक साथ आ गए थे। ऐसे में तमाम विरोधाभासों से घिरी वर्तमान सरकार अपने ही ओबीसी नेताओं की नाराजगी लेने की स्थिति में नहीं है।

महाराष्ट्र सरकार के सामने दूसरी समस्या यह भी है कि यदि वह मराठा आरक्षण को मान भी लेती है तो राज्य में कई दूसरी जातियां भी आरक्षण हासिल करने का दबाव शिंदे सरकार पर बना सकती है। अभी तो सरकार यह कहकर खुद को 'सेफ जोन' में रखे हुए है कि संविधान की ओर से तय आरक्षण की अधिकतम सीमा से छेड़छाड़ उसके हाथ में नहीं। चुनाव के दहलीत पर खड़ी खिचड़ी सरकार किसी भी तरह का जोखिम लेने की स्थिति में नहीं है।

महाराष्ट्र में उत्तर महाराष्ट्र, पश्चिम महाराष्ट्र, कोंकण, मराठवाड़ा मराठा प्रभुत्व वाले क्षेत्र है और यही वह क्षेत्र है जहां कुछ हिस्सों में भाजपा मजबूत है तो कुछ में कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस और शिवसेना ताकतवर है। राजनीतिक ताकत के रूप में देखा जाए तो राज्य की आबादी में 34 प्रतिशत हिस्सा रखने वाले मराठा समुदाय ने अब तक 11 मुख्यमंत्री अपने समुदाय से दिए हैं। 51 प्रतिशत विधानसभा सीटों यानी कुल 288 में से 148 सीटों में उनके 50 फीसदी से ज्यादा वोट हैं। कुल 48 लोकसभा सीटों में से 25 सीटों पर 50 फीसदी से ज्यादा मतदाता मराठा हैं।

मराठा समुदाय से इस समय 23 सांसद हैं और महाराष्ट्र की विधानसभा और विधान परिषद की कुल 366 सीटें में से 210 विधायक मराठा समुदाय से आते हैं। राजनीतिक रूप से पूरी तरह से मजबूत होने के बाद भी यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राज्य में खुदकुशी करने वाले ज्यादातर किसान मराठा ही हैं। 67 प्रतिशत मराठा किसान भारी कर्ज में दबे है। प्रदेश में जमीन बेचने वाले किसानों में 50 फीसदी मराठा हैं और राज्य की नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ 14 प्रतिशत है।

मराठा समुदाय का यह विरोधाभास चौंकानेवाला है लेकिन समग्रता में देखें तो ऐसी ही शिकायतें ओबीसी व दलित समुदाय के लोगों को भी हो सकती है कि राज्य में उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी सीमित है। ऐसे में वर्तमान मराठा आंदोलन आगे बढ़ा और ओबीसी समुदाय ने खतरा महसूस किया तो प्रदेश में जातिगत टकराव की नयी जमीन तैयार हो जाएगी। पहले ही ब्राह्मण विरोधी भावनाओं के कारण यह टकराव होता आ रहा है। लेकिन अब मराठा बनाम ओबीसी का टकराव हुआ तो इसका प्रदेश की राजनीति ही नहीं समाज पर भी व्यापक असर होगा। ओबीसी समुदाय इस बात का लेकर चिंतित है कि राज्य सरकार मराठा आंदोलन की मांग को पूरा करने के लिए उनके हिस्से के आरक्षण में सेंध लगा सकती है।

ऐसे में मराठा समुदाय से आनेवाले मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का भविष्य इस बात पर भी निर्भर करेगा कि वह अपने ही समुदाय के आंदोलन से कैसे निपटते हैं। जिस महाराष्ट्र में ऐेसे बेमेल गठबंधन की सरकार चल रही हो जहां सब नेता एक दूसरे को निपटाने में व्यस्त हों और मराठा आंदोलन से अपने राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति करने की कोशिश में लगे हों ऐसे में अगर यह आंदोलन पूरे राज्य को अपने आगोश में ले ले तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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