क्या प्यार, युद्ध और चुनाव में हर झूठ, प्रपंच जायज है?
Chunav Ranniti: अब जबकि लोकसभा की लगभग 485 सीटों पर मतदाताओं ने अपना फैसला ईवीएम में बंद कर दिया है तब अंतिम चरण की ओर बढता यह आम चुनाव अपनी एक छाप पीछे छोड़ते हुए जा रहा है। वह छाप है कि इस आम चुनाव ने साबित किया है कि राजनीति में नैतिकता का जो अकाल था अब वो घोर दुष्काल में बदल गया है।
वास्तविक मुद्दों से दूर नेता झूठ, प्रपंच और पाखंड का सहारा लेकर अपने ही देश के मतदाताओं से छल करने में जरा भी नहीं चूकते। उनके आदर्शवादी व्यवहार का उपदेश सिर्फ सत्ता में आने के बाद भाषणों में बोलने के लिए रह गये हैं। चुनावी मैदान में वो मानकर चलते हैं कि वो कोई भी छल प्रपंच करके जनता को भरमाने के लिए स्वतंत्र हैं।

2014 में राष्ट्रीय क्षितिज पर नरेन्द्र मोदी का उदय हुआ था उस समय नेताओं की विश्वसनीयता रसातल में थी। कांग्रेस के दस साल के शासन में भ्रष्टाचार के इतने आरोप लगे थे कि "मेरा नेता चोर है" एक सामान्य सा जुमला बन गया था। भ्रष्टाचार विरोधी अन्ना आंदोलन ने नेताओं की इस विश्वसनीयता को और गिराने का ही काम किया था। अगर उसी समय राष्ट्रीय परिदृश्य पर नरेन्द्र मोदी का उदय न हुआ होता तो यह संभव है कि 2014 का आम चुनाव वोटिंग के लिहाज से अब तक का सबसे कम मतदान वाला चुनाव साबित होता।
लेकिन नरेन्द्र मोदी के उभार ने पूरे देश के लोगों तक यह संदेश दिया कि एक नेता है जिस पर भरोसा किया जा सकता है। वह भ्रष्ट नहीं है क्योंकि उसका अपना कोई परिवार नहीं है। नरेन्द्र मोदी के हिन्दुत्ववादी होने से अधिक जन सामान्य में उनकी छवि एक ऐसे विकास पुरुष की बनी जिसने गुजरात को लंदन, पेरिस बना दिया है। पहली बार सोशल मीडिया का चुनाव में इतना व्यापक इस्तेमाल हुआ। सोशल मीडिया के जरिए नरेन्द्र मोदी की पीआर एजंसी ने ब्रांड मोदी के प्रति एक ऐसा विश्वास पैदा किया जो शेर जैसा बहादुर है, निडर है और एक गरीब चायवाले का बेटा होकर भी भ्रष्ट नहीं है।
कांग्रेस के भ्रष्टाचार से उकताये जन सामान्य में मोदी को एक ऐसा 'अवतार' नजर आया जो उनके दुख, गरीबी और कष्टों से राहत देकर देश को फिर से सोने की चिड़िया बना देगा। उस चुनाव प्रचार ने अधिकांश लोगों के मन में यह बात स्वत: ही बिठा दी कि मोदी आयेंगे तो इंडिया को सुपर पॉवर बना देंगे। हालांकि सोशल मीडिया का ये समूचा कैम्पेन एक पीआर कैम्पेन था और पहली बार डीप फेक का इस्तेमाल करते हुए सच को झूठ के साथ कुछ इस तरह मिलाया गया था कि सच तक पहुंच पाना किसी आम व्यक्ति के लिए असंभव था। इसलिए वह सब सच मान लिया गया जो असल में झूठ था।
अपनी शुरुआत के पांच सात साल के छोटे से इतिहास में ही 2013-14 में पहली बार सोशल मीडिया इतना बुरी तरह बंटा था कि जोड़ने का काम करनेवाला फेसबुक लोगों को तोड़ने का जरिया बन गया। इतना गहरा पोलिटिकल डिवाइड इससे पहले कब हुआ था, यह तो पता नहीं लेकिन इस बंटवारे का असली कारण चुनाव जीतने के लिए फैलाये गये कुछ ऐसे झूठ थे जिसे कांग्रेस काउण्टर करने की स्थिति में ही नहीं थी। मोदी चुनाव जीत गये। भाजपा को अपने राजनीतिक इतिहास में पहली बार पूर्ण बहुमत मिला और नरेन्द्र मोदी संपूर्ण सम्मान और उत्साह के साथ देश के प्रधानमंत्री बन गये।
हालांकि मोदी के दस साल के शासनकाल को देखें तो एक अलग ही तस्वीर सामने आती है। अपने चुनाव प्रचार के दौरान वो जितने आक्रामक, सतही भाषा का इस्तेमाल करते हैं, शासन के दौरान उन्होंने उतना ही संयम रखा और ऐसा कुछ भी करने से परहेज किया जिससे उनकी विश्वसनीयता पर असर पड़े। संभवत: मोदी यह मानते हैं कि चुनाव प्रचार के दौरान कुछ भी कहा जा सकता है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सरकार में आने के बाद वही सब करने भी लगे।
लेकिन समस्या यह हो गयी कि एक बार चुनाव जीतने के लिए अगर सतही भाषा, छद्म तरीकों का इस्तेमाल शुरु हो जाए तो गिरती राजनीति को वह और अधिक रसातल में ही ले जाता है। 2014 और 2019 का आम चुनाव हो या उसके पहले गुजरात का विधानसभा चुनाव। मोदी और कांग्रेस में हमेशा एक होड़ दिखाई दी कि कौन किसके खिलाफ कितनी सतही और गिरी हुई भाषा का इस्तेमाल करता है। मोदी को मौत का सौदागर और नीच आदमी तक कहा गया जिसका मोदी ने कांग्रेस के खिलाफ ही इस्तेमाल किया और चुनावों में बंपर जीत हासिल की।
यहां एक बात और गौर करने लायक है। मोदी ने कांग्रेस को शिकस्त देने के लिए जिन तरीकों का इस्तेमाल किया, अगर वो ऐसा नहीं करते तो संभव है वो 2009 वाले आडवाणी बनकर रह जाते। हमेशा के लिए पीएम इन वेटिंग। यह मोदी की आक्रामक शैली का ही परिणाम था कि ऑक्टोपस की तरह कहीं से भी प्रहार करने में माहिर कांग्रेस गुजरात के एक मुख्यमंत्री के सामने धराशायी हो गयी। इसलिए मोदी ने अगर कांग्रेस मुक्त भारत का नारा भी दिया तो यह एक बड़े वर्ग को बुरा नहीं लगा।
मोदी की अपनी राजनीतिक शैली ऐसी है कि सत्ता संचालन में जितने सधे हुए और संयमित रहते हैं, चुुनाव प्रचार में उतरते ही उतने ही बिखरे हुए और असंयमित हो जाते हैं। वो विपक्ष को लेकर बड़ा से बड़ा झूठा आरोप लगाने में जरा भी संकोच नहीं करते। यह एक प्रकार से उनके द्वारा बिछाया गया जाल होता है जिसमें विपक्ष जैसे ही फंसता है और मोदी पर पलटवार करता है, मोदी विपक्ष के उस पलटलार को ही अपना हथियार बना लेते हैं। मसलन इस बार उन्होंने लालू यादव के ऊपर परिवारवाद का आरोप लगाया। जवाब में लालू ने जैसे ही कहा कि मोदी का तो कोई परिवार ही नहीं है, तुरंत मोदी ने इसी को चुनावी हथियार बना लिया और इस बार उनके पूरे प्रचार का आधार ही मोदी का परिवार बन गया।
इस बार लालू यादव को छोड़ दें तो कांग्रेस समेत लगभग समूचा विपक्ष मोदी पर निजी प्रहार से बचा रहा। इस बात ने निश्चय ही मोदी के सबसे पसंदीदा हथियार को कुंद कर दिया जिसमें वो विपक्ष द्वारा किये गये निजी आक्षेप को ही विपक्ष के खिलाफ ब्रह्मास्त्र की तरह इस्तेमाल करते थे। लेकिन दुर्भाग्य से विपक्ष ने इस बार उन तरीकों का इस्तेमाल शुुरु कर दिया जो दो आमचुनावों से मोदी करते आ रहे थे।
अब विपक्ष ने भी लगभग सीख लिया है कि चुनाव प्रचार के दौरान वो कोई भी झूठ बोलने या प्रपंच करने के लिए स्वतंत्र हैं। इसलिए बिहार में राजद से लेकर यूपी में सपा तक। दिल्ली पंजाब में आम आदमी पार्टी से लेकर बंगाल में ममता बनर्जी तक कोई भी झूठ गढने और उसका प्रचार करने से संकोच करते नजर नहीं आ रहे हैं। अगर मोदी की इस बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता कि कांग्रेस सत्ता में आयी तो राम मंदिर पर बुलडोजर चलवा देगी तो भला कांग्रेस की इस अफवाह पर कोई कैसे यकीन कर लेगा कि भाजपा तीसरी बार सरकार में आयी तो संविधान बदल देगी? अगर मोदी के इस आरोप में कोई दम नहीं है कि कांग्रेस महिलाओं का मंगलसूत्र बिकवा देगी तो कांग्रेस के इन आरोपों में भी कोई खास दम नहीं है कि मोदी आरक्षण समाप्त कर देंगे।
दोनों ओर से झूठ ही बोला जा रहा है, यह सुननेवाला मतदाता तो समझ सकता है लेकिन सवाल यह है कि बोलनेवाला नेता संकोच क्यों नहीं करता? क्या सिर्फ इसलिए कि प्यार, युद्ध और चुनाव में सब जायज हो गया है इसलिए जो मन करे झूठ बोलो, चुनाव जीतो और आगे बढ़ जाओ? अगर इस मानसिकता से चुनाव लड़े जाएंगे तो जीत जाने के बाद नेताजी लोग सत्यवादी हरिश्चन्द्र हो जाएंगे इस बात पर कौन भरोसा करेगा?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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