इंडिया गेट से: स्पीकर के अधिकारों में कटौती की जरूरत

महाराष्ट्र विधानसभा में शिव सेना विधायक दल में बिखराव की ख़बरों के बीच फिर एक बार विधानसभा स्पीकर की भूमिका चर्चा में आ गयी है। अब तक का अनुभव तो यही बताता है कि विधानसभा अध्यक्षों ने दलबदल करने वाले विधायकों की सदस्यता खत्म करने के मामले में अपने अधिकारों का अपनी पार्टी के बचाव हेतु दुरूपयोग ही किया है। संविधान की दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 2(1)(ए) के अनुसार दलबदल करने वाले सांसदों विधायकों की सदस्यता खत्म करने का प्रावधान है। दलबदल करने वाले सांसदों और विधायकों की सदस्यता खत्म करने का फैसला करने का अधिकार स्पीकर या उच्च सदन के चेयरमैन को दिया गया है।

Maharashtra political crisis questions raised on the Speaker of the Assembly

आम तौर पर स्पीकर और चेयरमैन सत्ताधारी दल से होते हैं, इसलिए वे अपनी पार्टी या सत्ताधारी गठबंधन के पक्ष में ही फैसला करते हैं। इस का सब से निकृष्ट उदाहरण 8 जून 2022 का पश्चिम बंगाल विधानसभा के स्पीकर बिमान बेनर्जी का फैसला है। मुकुल राय मई 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की टिकट पर निर्वाचित हुए थे, अगले महीने जून में उन्होंने भाजपा छोड़ कर तृणमूल कांग्रेस ज्वाईन कर ली। मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी ने उन्हें पीएसी का चेयरमैन बना दिया, पीएसी चेयरमैन का पद विपक्ष के नेता को दिया जाता है। भाजपा ने मुकुल राय की सदस्यता खत्म करने की याचिका लगाई। सुप्रीमकोर्ट ने 2020 में अपने एक फैसले में कहा था स्पीकरों को दलबदल करने संबंधी याचिकाओं पर तीन महीने के भीतर फैसला करना चाहिए। इस के बावजूद स्पीकर ने 9 महीने तक फैसला नहीं किया, कोर्ट की हिदायत पर अप्रेल में फैसला किया तो भाजपा की याचिका अस्वीकार कर दी। हाईकोर्ट ने स्पीकर को नए सिरे से विचार करने को कहा तो स्पीकर ने दुबारा सुनवाई का नाटक कर के 8 जून को दुबारा अपने उसी फैसले को बरकरार रखा। जबकि दलबदल क़ानून के अनुसार किसी दल के दो तिहाई सदस्य मिलकर ही दलबदल कर सकते हैं, अगर उन की संख्या सदन में पार्टी के विधायकों या सांसदों की संख्या का दो तिहाई से कम है तो उन की सदस्यता खत्म हो जाएगी।

किहोटो होलोहन मामले के बाद 1992 में सुप्रीमकोर्ट ने कहा था कि पीठासीन अधिकारी का निर्णय अंतिम नहीं है और इसे किसी भी अदालत में चुनौती दी जा सकती है। यह दुर्भावना, विकृति आदि के आधार पर न्यायिक समीक्षा के अधीन है। इस से पहले स्पीकर का फैसला ही अंतिम माना जाता था, जिसे किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती थी। लेकिन अदालतें तब तक दखल नहीं देती, जब तक स्पीकर की तरफ से फैसला नहीं हो जाता। स्पीकर के फैसले के बाद भी मौटे तौर पर स्पीकर के फैसले के खिलाफ चार आधार पर कोर्ट सुनवाई करती है। पहला यह है कि यदि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए बिना आदेश पारित किया गया हो, जैसे कि दूसरे पक्ष को अपना मामला पेश नहीं करने देना और खुद ही फैसला कर देना। दूसरा यह है कि यदि स्पीकर का फैसला असंवैधानिक हो। तीसरा यह है कि अगर आदेश दुर्भावनापूर्ण या पक्षपातपूर्ण है। और चौथा यह है कि यदि आदेश विकृत है, जिसका अर्थ है कि यदि यह "कोई सबूत नहीं है, या पूरी तरह से अविश्वसनीय सबूत है, और कोई भी उचित व्यक्ति इस पर कार्रवाई नहीं करेगा"। मुकुल राय के मामले में स्पीकर ने बेतुका तर्क दिया है कि भाजपा ने सिर्फ वीडियो के सबूत दिए हैं कि मुकुल राय ने भाजपा छोडी है, कोई विश्वसनीय सबूत नहीं दिए। लेकिन क्या मुकुल राय ने स्पीकर के सामने पेश हो कर लिखित में कहा था कि उन्होंने भाजपा नहीं छोडी है।

कुछ और उदाहरण देखिए। 2015 में आंध्र प्रदेश के 20 विधायकों ने दलबदल किया था, स्पीकर ने 2017 तक उन की सदस्यता खत्म करने की विपक्ष की याचिका पर सुनवाई ही शुरू नहीं की। इसी तरह 2016 में दलबदल करने वाले तेलंगाना के 26 विधायक 2018 में विधानसभा भंग होने तक विधायक बने रहे। इसी तरह भाजपा ने 2017 में मणिपुर के सात कांग्रेसी विधायकों के दलबदल के बाद सरकार बनाई थी। स्पीकर ने उन पर दलबदल की कोई कार्रवाई नहीं की। मणिपुर के कांग्रेसी विधायक थौनाओजम श्यामकुमार सिंह भी 2017 में कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए थे। स्पीकर 2020 तक उन की सदस्यता खत्म करने की याचिका पर कुंडली मार कर बैठा रहा। जिसके बाद उन्होंने खुद इस्तीफा दे दिया क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें मंत्री पद से हटा दिया था और विधानसभा में प्रवेश करने से रोक दिया। सुप्रीमकोर्ट ने तब यह कहते हुए स्पीकर के अधिकार पर भी सवाल उठाए थे कि वह एक राजनीतिक दल का सदस्य होता है, इसलिए उस के पास यह अधिकार क्यों होना चाहिए। अदालत ने कहा कि अगर स्पीकर सही समय पर फैसला नहीं करता तो यह अधिकार अदालतों का होना चाहिए। यह सुप्रीमकोर्ट का एक ऐतिहासिक फैसला है। सिर्फ विधानसभाओं के स्पीकर ही मनमानी नहीं कर रहे, लोकसभा के स्पीकर भी मनमानी कर रहे हैं। लोकसभा में तृणमूल के दो और वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के एक सांसद की सदस्यता खत्म करने की याचिका लंबित है। तृणमूल कांग्रेस अपने दो सांसदों शिशिर अधिकारी और सुनील कुमार मंडल को भाजपा में शामिल होने के लिए अयोग्य घोषित करवाना चाहती है, और वाईएसआरसीपी अपने सांसद रघु राम कृष्ण राजू को "पार्टी विरोधी गतिविधियों" के लिए अयोग्य घोषित करना चाहती है।

अदालते कई बार यह सवाल उठा चुकी हैं कि स्पीकर सत्ताधारी दल के पक्ष में फैसले लेते हैं या सत्ताधारी दल को फायदा पहुँचाने के लिए सदस्यों को अयोग्य ठहरा देते हैं। महाराष्ट्र विधान सभा के डिप्टी स्पीकर का ताज़ा फैसला इस का उदाहरण है, जहां शिवसेना के बागी सदस्यों की दो तिहाही का संवैधानिक आंकड़ा खत्म करने के लिए उन में से 16 सदस्यों की सदस्यता खत्म की गई। हरियाणा के जगजीत सिंह बनाम हरियाणा राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में स्पीकर की निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे। स्पीकरों के पक्षपातपूर्ण फैसलों के उदाहरणों का हवाला देते हुए सुप्रीमकोर्ट उनकी शक्तियों पर फिर से विचार करने के लिए कह चुकी है। कोर्ट ने विधायकों सांसदों की अयोग्यता पर निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र न्यायाधिकरणों का सुझाव दिया है। तो क्या अब यह समय नहीं आ गया है कि दलबदल क़ानून के अनुसार विधायकों या सांसदों की सदस्यता खत्म करने का अधिकार चुनाव आयोग को दिया जाना चाहिए?

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(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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