महाराष्ट्र में भाजपा का मास्टरस्ट्रोक या मास्टर ब्लंडर?
राजनीति एक ऐसा विचित्र खेल है जिसमें पांसा फेकने वाले के हर दांव में अपनी जीत और हार दोनों होती है। एक ही पांसे से वह कुछ जीत रहा होता है और ठीक उसी समय कुछ हार भी रहा होता है। महाराष्ट्र की शतरंज पर भाजपा की नयी चाल में ये दोनों बातें आपको साफ दिखाई देंगी। देवेन्द्र फणनवीस की जगह एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाकर एक ही चाल में जीत और हार दोनों सुनिश्चित कर ली है। लगभग ढाई साल पहले नवंबर 2019 में जब शिवसेना और भाजपा के बीच मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर टकराव शुरु हुआ उस समय शिवसेना अपना मुख्यमंत्री चाहती थी और भाजपा अपना। सुलह-समझौते की बात शुरु हुई तो शिवसेना ने नितिन गड़करी के नाम पर अपनी सहमति दे दी। लेकिन उस समय भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व देवेन्द्र फणनवीस के नाम पर अड़ गया। शिवसेना देवेन्द्र फणनवीस के नाम पर तैयार नहीं थी।

आखिरकार दोनों के बीच कटुता इतनी बढी कि तीन दशक का गठबंधन टूट गया और उद्धव ठाकरे कांग्रेस तथा एनसीपी के सहयोग से मुख्यमंत्री बन गये। स्वाभाविक है महाराष्ट्र की राजनीति में यह एक बेमेल गठजोड़ था। इससे शिवसैनिक भी असहज थे। आखिरकार ढाई साल बाद पार्टी के ही एक वरिष्ठ नेता एकनाथ शिंदे ने बगावत कर दी और भाजपा ने उस बगावत को पर्दे के पीछे से पूरा समर्थन भी दिया। एकनाश शिंदे और उनके बागी विधायक इस दौरान तीन भाजपा शासित राज्यों, गुजरात, असम और गोवा में रहे, जहां उनकी सुख-सुविधा और सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा गया। इसलिए यह तो बिल्कुल नहीं कह सकते कि भाजपा इन बागी विधायकों के साथ नहीं थी। इस बीच देवेन्द्र फणनवीस दिल्ली भी आते हैं और पार्टी के शीर्ष नेताओं से विचार विमर्श करके जाते हैं।
लेकिन उद्धव ठाकरे के इस्तीफे के बाद जब मुख्यमंत्री के नाम का ऐलान हुआ तो नाम सुनकर हर कोई चौंक गया। स्वयं एकनाथ शिंदे को उम्मीद नहीं थी कि वो प्रदेश के मुख्यमंत्री बनाये जाएंगे। उनके जो भी बयान थे उसमें अपनी महत्त्वाकांक्षा से ज्यादा कांग्रेस और एनसीपी के साथ वैचारिक कटुता थी। उन्होंने या उनके साथ बागी हुए विधायकों ने एक बार भी उद्धव ठाकरे के खिलाफ कुछ नहीं बोला। यह इस बात का संकेत था कि बागी विधायक उद्धव ठाकरे के निर्णय के खिलाफ हैं, उद्धव ठाकरे के खिलाफ नहीं।
इस बात को भाजपा नेतृत्व ने शायद समझा नहीं या फिर समझना नहीं चाहा। भाजपा नेतृत्व को
लगता है कि चिराग पासवान और उद्धव ठाकरे एक जैसे लोग ही हैं। अगर पशुपति पारस रामविलास का उत्तराधिकार चिराग से छीन सकते हैं तो फिर एकनाथ शिंदे उद्धव ठाकरे से क्यों नहीं? जो लोग ऐसा समझ रहे हैं वो महाराष्ट्र में शिवसेना की राजनीति को समझने में भूल कर रहे हैं। बाल ठाकरे ने शिवसेना के जरिए महाराष्ट्र में संगठित राजनीतिक कार्यक्रमों की शुरुआत की थी। शिवसेना सिर्फ चुनाव लड़ने वाली पार्टी नहीं है। वह सालभर सक्रिय रहनेवाला संगठन है जिसका आधार जिला प्रमुख और शाखा प्रमुख होते हैं।
शिवसेना की शाखा स्थानीय स्तर पर लोगों के मिलने जुलने और उन्हें जोड़कर रखने का जरिया होता है। बाल ठाकरे का यह शाखा प्रमुख वाला प्रयोग इतना सफल रहा कि आज महाराष्ट्र में हर राजनीतिक दल इस मॉडल को अपने यहां लागू करता है। इसलिए यह समझना कि एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा शिवसेना के सांगठनिक ढांचे को तोड़ देगी और इस तरह उद्धव ठाकरे महत्त्वहीन हो जाएंगे, भाजपा के शीर्ष नेताओं की भूल ही कही जाएगी। बल्कि इसका उल्टा असर यह होगा कि शिवसेना में उद्धव ठाकरे के प्रति सहानुभूति बढेगी। उनकी शाखा
वाली राजनीति सक्रिय होगी और चाहकर भी एकनाथ शिंदे का गुट उद्धव से दुश्मनी नहीं कर पायेगा। राज ठाकरे जो कि स्वयं ठाकरे परिवार के ही थे वो भी बाहर जाकर विकल्प इसलिए नहीं बन पाये क्योंकि शिवसेना का सिस्टम उनके पास नहीं था। वह कल भी उद्धव ठाकरे के पास था, आज भी उद्धव ठाकरे के ही पास है।
एक बात और जो समझने की जरूरत है वह यह कि शिवसेना का सांगठनिक ढांचा सत्ता आधारित नहीं है। शिवसेना सत्ता में रहे या न रहे, इससे उनके सांगठनिक ढांचे पर बहुत असर नहीं पड़ता। मुख्यमंत्री की कुर्सी से उतरने के बाद उद्धव ठाकरे एक बार फिर इसी ढांचे को मजबूत करने के लिए शिवसेना भवन में बैठने का ऐलान कर चुके हैं। जहां तक भाजपा की भीतरी राजनीति है, उसमें कोई विद्रोह तो शायद न हो लेकिन भितरघात की शुरुआत हो जाएगी। महाराष्ट्र भाजपा के नेता और कार्यकर्ता एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार कर लेंगे,
इसमें संदेह है। मुख्यमंत्री रहते हुए देवेन्द्र फणनवीस ने जिस प्रकार से महाराष्ट्र की राजनीति में अपने कद को बढाया है उसके सामने एकनाथ शिंदे बहुत छोटे हैं। ऐसे में उनको डिप्टी सीएम बना देना न केवल फणनवीस के लिए बल्कि भाजपा के लिए अपमानजनक फैसला है। एक स्वाभाविक सवाल कोई भी भाजपा नेता उठायेगा कि अगर डिप्टी सीएम के पद पर ही सरकार चलानी थी उद्धव ठाकरे में क्या बुराई थी?
शह मात के इस खेल का महाराष्ट्र में एक तीसरा कोण भी है। वह है मराठा राजनीति का। महाराष्ट्र के 30 प्रतिशत मतदाताओं से जुड़ी मराठा राजनीति पर लंबे समय से कांग्रेस और एनसीपी का कब्जा है। अगर एकनाथ शिंदे को मराठा नेता के तौर पर उभारकर भाजपा अगर यह सोचती है कि वह मराठा वोटबैंक में सेंध लगा देगी तो यह भी कपोल कल्पना ही कही जाएगी। शरद पवार के रहते मराठा राजनीति में किसी और का मराठा नेता बनना संभव नहीं है।
फिर भी भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने अपने ही पार्टी कैडर के मनोभाव के खिलाफ जाकर यह जोखिम भरा निर्णय लिया है तो जरूर कुछ सोच समझकर ही लिया होगा। फिलहाल तो महाराष्ट्र के भाजपा खेमे में सरकार बनने की खुशी से ज्यादा अपने किसी नेता के मुख्यमंत्री न बनने की मायूसी और उदासी है। दीर्घकालिक नफा नुकसान छोड़ भी दें तो तात्कालिक रूप ये यह बीजेपी की शह और मात वाली चाल तो बिल्कुल नहीं कही जाएगी।
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(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)
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