Uddhav Thackeray: क्या बाला साहेब की विरासत को बचा पाएंगे उद्धव ठाकरे?
Uddhav Thackeray: उद्धव ठाकरे के लिए पिछले दो साल बड़े झटके देने वाले साबित हुए हैं। एकनाथ शिंदे के साथ गए विधायकों से ही उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़ा नहीं हुआ, बल्कि उसके बाद भी नगरसेवकों से लेकर सांसदों तक ने उनका साथ छोड़ना जारी रखा।
उद्धव के लिए शिवसेना की विरासत को बरकरार रखने का सबसे बड़ा मौका यह लोक सभा चुनाव होगा। अब आगामी लोकसभा और विधानसभा के चुनाव ही तय करेंगे कि उद्धव ठाकरे ने शिवसेना की विरासत खो दी है या अब भी वह मैदान में बने रहेंगे।

इस वर्ष नगर निगम का चुनाव (बीएमसी सहित) भी होने वाला है और लोकसभा का भी। फिर यह भी संभावना है कि विधानसभा का चुनाव भी जल्दी हो जाए। महाराष्ट्र विधान सभा का कार्यकाल वैसे भी इस साल के अंत में खत्म हो रहा है। इसलिए उद्धव को खुद को साबित करने के लिए भरपूर अवसर है।
किसी एक चुनाव में हार के बाद भी उनके पास बाद के चुनावों में वापसी करने का समय होगा। उद्धव ठाकरे के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात महाराष्ट्र की राजनीति में प्रासंगिक बने रहने की है। यानी उन्हें पार्टी को फिर से खड़ा करना होगा और इसके लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। लेकिन बीच बीच में उनके स्वास्थ्य को लेकर भी कुछ खबरें आती रहती हैं।
उद्धव ठाकरे 15 वर्षों से अधिक समय से पार्टी प्रमुख की भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन वह संगठन के निर्माण में कभी भी जमीन पर सक्रिय नहीं रहे। बाल ठाकरे से उन्हें एक बनी बनाई पार्टी विरासत में मिली थी। अब आगे उनके प्रयासों पर निर्भर करेगा कि वह पार्टी को पुनर्जीवित करने में कितना सफल रहते हैं।
एक समय था जब बालासाहेब ठाकरे शिव सेना प्रमुख के रूप में महाराष्ट्र में कुछ भी करवाने की स्थिति में थे। वह शिव सेना के शाखा प्रमुखों को उनके नाम से जानते थे। संगठन पर उनका पूरा नियंत्रण था। उनके समय में राज्य सरकार की सत्ता का केंद्र शिव सेना का मुख्यालय था। मातोश्री से ही बाला साहेब संगठन और सरकार दोनों चलाते थे। मंत्रियों तक को ठाकरे से मिलना मुश्किल था। किसी में उनसे सवाल करने की हिम्मत नहीं थी।
लेकिन उद्धव ठाकरे सवालों के घेरे में होते हैं। वह अभी तक कार्यकर्ताओं में जोश भरने में सफल नहीं हुए हैं। ठाकरे की शिव सेना छिन्न भिन्न हो गई है, लेकिन कोई बड़ा प्रतिकार उनकी तरफ से नहीं आया। सबसे बड़ी बात यह है कि कार्यकर्ताओं को भी पार्टी की स्थिति का सही अंदाजा नहीं है।
उद्धव को अपनी पार्टी के लोगों के बीच बाल ठाकरे जैसा सम्मान नहीं मिलता। बाला साहेब ठाकरे जब भी बात करते थे अधिकारपूर्वक करते थे। बाला साहेब ठाकरे भी कई बार चुनाव हारे, लेकिन फिर भी वे महाराष्ट्र में निर्विवाद नेता बने रहे। उन्हें कोई भी हल्के में नहीं ले सकता था। बीजेपी के दो बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी भी ठाकरे से मिलने मुंबई जाते थे, लेकिन उद्धव बात बात पर शरद पवार से मिलने जाते हैं। निर्भीकता या अधिकार जताने के मामले में उद्धव उनके करीब भी नहीं हैं।
उद्धव अपनी पार्टी में भी पकड़ खोते जा रहे हैं। इसका कारण यह भी है कि वह बाला साहेब के सिद्धांतों को छोड़ कर सेकुलर राजनीति करने वालों के साथ हो गए हैं। बाल ठाकरे अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने के सख्त खिलाफ थे। वह हिंदुत्व में अक्षरशः विश्वास करते थे। लेकिन उद्धव उनकी विचारधारा को कमजोर कर रहे हैं।
इन सभी कमियों के उपरांत भी उद्धव के लिए अभी अवसर बचे हैं। एकनाथ शिंदे काफी हद तक ठाणे और मुंबई तक ही सीमित है। जबकि उद्धव की शिव सेना का प्रसार पूरे महाराष्ट्र में है। इसलिए उद्धव ठाकरे के सामने वापसी की कुछ गुंजाइश है।
उद्धव ठाकरे को जातियों और समुदायों को साधने के साथ साथ महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों की भी देखभाल करनी होगी। लेकिन उद्धव ठाकरे अंदरूनी इलाकों में एक या दो बैठकों को संबोधित करने के बाद तुरंत मुंबई लौट आते हैं। शायद उन्हें जमीन पर काम करने की आवश्यकता का एहसास नहीं है। वह अतीत के गौरव में जीने में ज्यादा विश्वास कर रहे हैं।
आज भी शिव सेना उद्धव से जुड़े लोगों को जब आदित्य ठाकरे से आदेश मिलता है तो लोग अपमानित महसूस करते हैं। दूसरी तरफ एकनाथ शिंदे ने खुद को भाजपा के खेल का एक खिलाड़ी बना लिया है। बीजेपी 2024 में सत्ता में आती है और महाराष्ट्र में कोई नया समीकरण बनता है तो दांव पर एकनाथ शिंदे ही हो सकते हैं।
1966 में जब शिव सेना की शुरुआत हुई थी तो उसका उद्देश्य महाराष्ट्र के बाहरी लोगों, विशेषकर दक्षिण भारतीयों (लुंगीवालों) को बाहर निकालना था, क्योंकि उन्हें लगता था कि वे महाराष्ट्रियों की नौकरियाँ छीन रहे हैं। बाद में यह विरोध उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य सभी लोगों पर लागू हो गया और सभी बाहरी लोगों में भय पैदा करते हुए उन्हें डराया-धमकाया और पीटा गया। इस तरह से बाला साहेब मराठी मानुस के एकछत्र नेता बन गए, लेकिन वही नीति अब उद्धव नहीं अपना सकते। काँग्रेस और शरद पवार की एनसीपी के साथ होने के बाद उद्धव अपना स्वतंत्र रुख नहीं दिखा सकते।
लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र को लेकर उद्धव ठाकरे की शिवसेना और कांग्रेस के बीच अभी खींचतान चल ही रही है। उद्धव ठाकरे और कांग्रेस के नेता अब कहने लगे हैं कि गठबंधन के बावजूद वे एक दूसरे के खिलाफ उम्मीदवार उतार सकते हैं। काँग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले सरेआम उद्धव ठाकरे पर एकतरफा फैसला करने का आरोप लगा रहे हैं। यदि गठबंधन में बिखराव होता है तो इसका भी नुकसान उद्धव ठाकरे को उठाना पड़ सकता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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