NDA: राजग का विस्तार करने में फूंक फूंक कर कदम रख रही भाजपा
एकता के प्रयासों हेतु विपक्षी दलों की बैठक और भाजपा के सहयोगी दलों की बैठकों से पहले महाराष्ट्र से लेकर आंध्र प्रदेश तक, और यूपी से लेकर पंजाब तक नए राजनीतिक समीकरण बनने बिगड़ने शुरू हो गए हैं। भाजपा ने विपक्षी दलों में भारी सेंधमारी शुरू कर दी है। जहां उसे महाराष्ट्र, बिहार और उत्तर प्रदेश में कुछ विपक्षी नेताओं को अपने साथ जोड़ने में सफलता मिली है, वहीं कांग्रेस को भाजपा के किसी भी सहयोगी का साथ मिलता नहीं दिख रहा। अलबत्ता किसान आन्दोलन के समय भाजपा का साथ छोड़ गए पंजाब के अकाली दल और राजस्थान के रालोपा को भी कांग्रेस नहीं साध सकी।

विपक्षी खेमे की जितनी भी पार्टियां पटना बैठक में शामिल हुईं या बेंगलुरु बैठक में शामिल हो रही हैं, वे सभी पहले से विपक्ष में ही थीं। लेकिन पटना बैठक के बाद कांग्रेस की सहयोगी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, जेडीयू की सहयोगी हिन्दुस्तान अवाम मोर्चा और समाजवादी पार्टी की सहयोगी सुहेलदेव समाज पार्टी कांग्रेस की रहनुमाई वाले विपक्षी गठबंधन का साथ छोड़कर भाजपा की रहनुमाई वाले एनडीए में शामिल हो चुकी हैं। महाराष्ट्र, बिहार और उत्तर प्रदेश में भाजपा को नए सहयोगी मिल गए हैं। एक साल पहले भाजपा ने विपक्षी खेमे में गई शिवसेना को भी तोड़ दिया था। जबकि दूसरी ओर पिछले एक साल में सिर्फ जेडीयू एनडीए से बाहर निकली है।
पटना बैठक के बाद जो दो राजनीतिक दल विपक्ष का साथ छोड़कर एनडीए में गए हैं, उन दोनों को पटना बैठक में नहीं बुलाया गया था। इसलिए कांग्रेस ने अब उन सभी पार्टियों को बुला लिया है, जिसका भले ही संसद या किसी विधानसभा में कोई भी चुना हुआ प्रतिनिधि नहीं है। हालांकि विपक्ष से एनडीए में गए सुहेलदेव समाज पार्टी के 6 और हिन्दुस्तान अवाम मोर्चे के चार विधायक हैं।

पटना बैठक के बाद स्थिति में सबसे बड़ा अंतर यह आया है कि चाचा शरद पवार विपक्ष की बेंगलुरु बैठक में शामिल होंगे, जबकि उनके भतीजे अजीत पवार एनडीए की दिल्ली बैठक में शामिल होंगे। इसी तरह मोदी सरकार की मंत्री अपना दल की अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल एनडीए बैठक में शामिल होंगी और अपना दल के दूसरे गुट की अध्यक्ष उनकी मां कृष्णा पटेल बेंगलुरु बैठक में शामिल होंगी, जो उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की पार्टनर है।
पटना बैठक में शामिल हुए राष्ट्रवादी कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल अब एनडीए बैठक में शामिल होंगे। बेंगलुरु में 17 जुलाई को डिनर से शुरू होने वाली विपक्ष की बैठक से पहले भी बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। शरद पवार के बेंगलुरु रवाना होने से पहले 16 जुलाई को अजीत पवार गुट ने अचानक शरद पवार के दफ्तर में दस्तक दे दी और उन्हें विपक्ष की बैठक में जाने से रोकने की कोशिश की।
प्रफुल्ल पटेल ने शरद पवार को याद दिलाया कि उन्होंने कुछ दिन पहले खुद ही कहा था कि 2024 में जीतेगा तो मोदी ही, फिर हारी हुई बाजी को खेलने का क्या फायदा है। अजीत पवार और प्रफुल्ल पटेल ने उनसे पार्टी को एकजुट बनाए रखने का रास्ता निकालने का आग्रह भी किया। अगर शरद पवार मान जाते हैं, तो पार्टी को एकजुट रखने के लिए प्रफुल्ल पटेल एनडीए में शामिल होने पर केंद्र में मिलने वाला मंत्री पद भी सुप्रिया सुले के लिए छोड़ने को तैयार हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस सुप्रिया सुले को कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने के कारण ही टूटी है।
शरद पवार ने अभी कोई फैसला नहीं किया है, लेकिन वह असमंजस की स्थिति में आ गए हैं। क्योंकि उनके पुराने वफादार साथी एक साथ उन्हें आग्रह करने पहुंचे थे, जिनमें अजीत पवार और प्रफुल्ल पटेल के अलावा एनसीपी के सारे मंत्री और डिप्टी स्पीकर नरहरी जिवाल भी मौजूद थे। इतने सारे नेताओं के अचानक पहुंचने पर शरद पवार की बेटी ने तुरंत जयंत पाटिल और जितेन्द्र अव्हाड को भी बुला लिया। दोनों गुटों की डेढ़ घंटे तक बातचीत हुई। बगावत के 14 दिन बाद शरद पवार से मिलने पहुंचे डिप्टी सीएम अजित पवार और उनके गुट के नेताओं के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर सियासी चर्चाएं तेज हो गई है। क्या शरद पवार बीमारी के बहाने बेंगलुरु जाना टाल देंगे या अजीत पवार और प्रफुल्ल पटेल का आग्रह ठुकरा देंगे।
जहां भाजपा ने महाराष्ट्र के बाद उत्तर प्रदेश और बिहार में विपक्ष के खेमे में सेंध लगाने में सफलता हासिल की है, वहीं अन्य तीन राज्यों में वह फूंक फूंक कर कदम रख रही है। इन तीन राज्यों को लेकर भाजपा गठबंधन बनाने को लेकर सावधानी बरत रही है। ये तीन राज्य हैं, आंध्र प्रदेश, हरियाणा और पंजाब। आंध्र प्रदेश के चन्द्रबाबू नायडू और पंजाब के सुखबीर सिंह बादल एनडीए की दहलीज पर खड़े हैं।
चन्द्रबाबू नायडू 2018 में एनडीए छोड़कर गए थे और सुखबीर सिंह बादल 2020 में किसान आन्दोलन के समय एनडीए छोड़कर गए थे। एनडीए छोड़ने के बाद चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी 2019 में विधानसभा चुनाव हार गई, और सुखबीर सिंह बादल का अकाली दल 2022 में विधानसभा चुनाव हार गया। दोनों अब वापसी के लिए भाजपा के दरवाजे पर खड़े हैं। चंद्रबाबू नायडू ने जून के पहले हफ्ते में अमित शाह और जेपी नड्डा से मुलाक़ात भी की थी, लेकिन नरेंद्र मोदी मोदी आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और वाईएसआर कांग्रेस अध्यक्ष जगन मोहन रेड्डी के साथ तालमेल की संभावना टटोल रहे हैं। इसीलिए उन्होंने एनडीए की बैठक से 48 घंटे पहले तक कोई फैसला नहीं किया है।
जहां तक भाजपा के सबसे पुराने सहयोगी अकाली दल का सवाल है, तो भाजपा अब अपनी शर्तों पर समझौता करेगी, क्योंकि पंजाब में भाजपा की ताकत पहले से दोगुनी हो गई है। आधी से ज्यादा कांग्रेस भाजपा में शामिल हो चुकी है। कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुनील जाखड़ के अलावा कई पूर्व कांग्रेसी सांसद और विधायक भाजपा में शामिल हो चुके हैं। भाजपा ने अपना प्रदेश अध्यक्ष भी कांग्रेस से आए सुनील जाखड़ को बनाया है। सुनील जाखड़ ने कहा है कि भाजपा बिना किसी गठबंधन के अपनी ताकत बढ़ाएगी। पहले भाजपा का अकाली दल से 23 विधानसभा सीटों और 3 लोकसभा सीटों का समझौता था। अब भाजपा आधे आधे की बात कर रही है।
जहां तक हरियाणा का सवाल है, तो 2019 में हरियाणा की सभी दस लोकसभा सीटें भाजपा जीती थी। लेकिन विधानसभा में भाजपा को बहुमत नहीं मिला था। भाजपा ने चौधरी देवी पाल के प्रपोत्र दुष्यंत चौटाला की जन नायक पार्टी के साथ गठबंधन करके सरकार बनाई थी। उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला ने 2024 में बिना गठबंधन अकेले चुनाव लड़ने का एलान कर रखा है। शायद यह एक रणनीति के तहत है, ताकि जाट वोटों को एकतरफा कांग्रेस के साथ जाने से रोका जा सके। हो सकता है कि आख़िरी दिनों में कुछ समझौता हो भी जाए।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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