कैसे बड़ा मुद्दा बन जाता है राजनीति में बोलना और न बोलना

नई दिल्ली। राजनीति में कब कौन सी बात बड़ा मुद्दा बन जाएगी कुछ कहा नहीं जा सकता। अब जैसे किसी नेता का बोलना अथवा न बोलना भी आज की राजनीति का एक प्रमुख विषय बन जाता है और लोग भी उसमें न केवल दिलचस्पी लेने लगते हैं बल्कि पक्ष-विपक्ष में खड़े होने लगते हैं। जरा याद करिये कि अब से कोई पांच साल पहले तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का न बोलना अथवा बहुत कम बोलना इतना बड़ा मुद्दा बन गया था कि आम लोग भी कहने लगे कि हमें ऐसा प्रधानमंत्री नहीं चाहिए बल्कि ऐसा प्रधानमंत्री चाहिए जो बोल सके। उनका नाम तक मौन मनमोहन सिंह कर दिया गया था। तब हुए लोकसभा चुनावों के परिणामों से ऐसे संकेत मिले थे कि कांग्रेस की हार के पीछे के कारणों में से एक मनमोहन सिंह का न बोलना भी रहा है।

कैसे बड़ा मुद्दा बन जाता है राजनीति में बोलना और न बोलना

लगभग उसी समय एक और नेता की चुप्पी को लेकर बहुत बोला जाने लगा था। यह कोई और नहीं बल्कि वह लालकृष्ण आणवाणी थे, जो उससे पहले अपने फायरी भाषणों के लिए जाने जाते थे। आडवाणी ने तब अचानक ऐसी चुप्पी ओढ़ ली थी कि लगता ही नहीं था कि यह नेता कभी बोलेगा। हुआ भी यही, बीते पांच वर्षों में शायद ही कभी कुछ किसी भी तरह से बोले हों। तब कहा जा रहा था कि इस चुप्पी के पीछे शायद उनका प्रधानमंत्री बनने का सपना टूटना है जिसे वह लंबे समय से संजोए हुए थे।

उससे पहले के लोकसभा चुनाव में आणवाणी अपनी पार्टी और गठबंधन के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे। लेकिन पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा था। इसी के साथ उनका वह सपना भी अधूरा ही रह गया था जिसे उस चुनाव में पूरा वह पूरा होता देख रहे थे। उसके बाद के चुनाव में पार्टी ने और गठबंधन ने प्रधानमंत्री पद का नया उम्मीदवार तब गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी को तय कर लिया था। इसके साथ ही इस बड़े नेता आणवाणी ने अपने लिए चुप्पी तय कर ली थी।

हालांकि लोकसभा चुनावों में हार के बाद मनमोहन सिंह पिछले पांच सालों में अपने प्रधानमंत्रित्व काल की तुलना में कहीं ज्यादा बोलते लगे। उन्होंने संसद में भी कई बार भाषण दिया। बाहर पार्टी से लेकर अन्य तमाम कार्यक्रमों में भी बोलते दिखे और सुने गए। हालांकि वह तब भी लगातार बोल रहे थे जब प्रधानमंत्री थे, लेकिन प्रचारित ऐसा किया गया कि वह न बोलने वाले प्रधानमंत्री हैं। लेकिन आडवाणी के साथ ऐसा नहीं हुआ। उनके न बोलने को लेकर अक्सर विरोधी सहानुभूति भी दिखाने लगे थे। अब एक नया घटनाक्रम हुआ कि भाजपा ने उन्हें लोकसभा चुनाव में टिकट भी नहीं दिया। उसके बाद भी वह नहीं बोले, तो एक बार फिर इसको लेकर बातें की जाने लगीं कि आखिर वह बोलते क्यों नहीं अथवा क्या उनकी चुप्पी अब कभी टूट भी पाएगी या नहीं।

इसी दौरान उन्होंने मौखिक तो कुछ नहीं बोला, लेकिन एक बार फिर ब्लॉग दिया जिसने न केवल राजनीतिक हलकों में विवादों को नया जन्म दे दिया बल्कि खुद उनकी पार्टी में भी एक खास तरह की हलचल देखने को मिलने लगी। यहां देखने की बात यह है कि किसी खास व्यक्ति के बोलने और न बोलने को क्यों इतना तूल दे दिया जाता है। इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया जाता कि संबंधित व्यक्ति कर क्या रहा है अथवा उसने किया क्या है। राजनीति में और दलों में जिम्मेदारियां मिलना न मिलना आम बात होती है।

इतना ही नहीं, ऐसा भी कई बार होता है कि बहुत बड़े योगदान देने वाले व्यक्तियों के साथ भी ऐसा होता रहता है। इसी चुनाव में न केवल भाजपा बल्कि कांग्रेस से लेकर कई अन्य पार्टियों में ऐसे अनेक नेताओं को टिकट नहीं मिलता है जो बड़ी-बड़ी कुर्बानियां पार्टी के दिए होते हैं। कांग्रेस के बारे में तो यह आम शिकायत रही है कि उसके यहां अध्यक्ष और प्रधानमंत्री नेहरू परिवार से ही चुना जाता है। हालांकि वहां भी कुछ अपवाद रहे हैं, लेकिन बहुतायत में यही रहा रहा है। कांग्रेस में कई नेता ऐसे रहे हैं जिनकी पीढ़ी दर पीढ़ी पार्टी की सेवा में रही, उनके भी टिकट कट जाते हैं या बड़ी जिम्मेदारियां नहीं मिलतीं।

अभी हालिया उदाहरण सपा के मुलायम सिंह का भी लिया जा सकता है। यद्यपि उन्हें लोकसभा चुनाव में पार्टी ने टिकट दिया है, लेकिन लोग भूले नहीं हैं कि किस तरह उनसे पार्टी की बागडोर छीन ली गई। इतना ही नहीं, उनके प्रधानमंत्री बनने के अवसरों की भी अब कोई चर्चा नहीं होती जबकि अतीत में कई बार ये अटकलें लगाई जाती रही हैं कि वह भी पीएम पद के मजबूत दावेदार हो सकते हैं।

राजनीति में दो बातें अधिक महत्व की होती हैं। एक तो यह किसी के भी बारे में भी यह अंतिम रूप से नहीं कहा या स्वीकार किया जा सकता है कि उसके सितारे हमेशा एक जैसे रहेंगे क्योंकि इसमें अवसरों का बहुत महत्व होता है। राजनीति में मधु कोड़ा से लेकर राबडी देवी तक मुख्यमंत्री और एचडी देवेगौड़ा से लेकर इंद्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री हो सकते हैं क्योंकि मौके ऐसे थे। संभव है उन्होंने कभी यह सोचा तक न हो कि कभी वे भी मुख्यमंत्री अथवा प्रधानमंत्री हो पाएंगे। दूसरा यह कि कोई नेता अपने राजनीतिक जीवन में करता क्या है, इसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए जिसका ऐसे अवसरों पर अभाव ही दिखता है।

आडवाणी के बारे में किसी तरह की सहानुभूति अथवा न्याय-अन्याय पर कोई बात किए जाने के पहले इस पहलू को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। आडवाणी अब ब्लॉग बोल भी दिए हैं, तो उससे हमारे राजनीतिक विमर्श में कोई खास तब्दीली नजर आएगी, इसकी संभावना भी कम ही दिखती है क्योंकि यह सतत चलने वाली प्रक्रिया है। जब राजनीतिक पार्टियों में लोकतंत्र की कमी का सवाल उठाया जाता है, तब यही सवाल सबसे महत्वपूर्ण होता है, उन कार्यकर्ताओं को कभी अवसर नहीं मिल पाते हैं जो अपना सब कुछ छोड़कर केवल पार्टी की सेवा में लगे रहते हैं। इसके विपरीत मौकों को वे लपक लिया करते हैं जो अन्य विधाओं में सिद्धहस्त होते हैं। जब तक पार्टियों में इस लिहाज से काम करने की परिपाटी नहीं अपनाई जाएगी, कभी आडवाणी और कभी इसी तरह के अन्य व्यक्तियों के किनारे कर दिए जाने पर बातें होती रहेंगी, लेकिन इस समस्या का कोई समाधान नहीं निकाला जा सकेगा।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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