मतदान के प्रति उदासीनता क्यों?
Voting Percentage: मौजूदा चुनाव में मतदान के दो सबसे बड़े नकारात्मक पक्ष उभर कर आ रहे हैं। पहला यह कि यह एक खामोश चुनाव है। दूसरे, इसमें अब तक मतदाताओं की उत्साहपूर्ण भागीदारी नहीं हुई है। तीन चरणों के चुनाव में कुल मिलाकर लगभग 3 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है।
सामान्यतया यह माना जाता है कि किसी भी चुनाव में मतदाता का उत्साह दो स्थितियों में लहर पैदा करता है। एक जब चली आ रही सत्ता को बेदखल करना होता है और दूसरे जब किसी नए नेता या दल को राजपाट सौंपना होता है। इस बार यह दोनों बातें नहीं है। जैसे चल रहा है, चलने दिया जाए अथवा जो होना है, वह हो ही जाएगा को ब्रह्म सत्य मानकर मतदाता अपना काम धंधा रोक कर चिलचिलाती धूप में पसीना बहाने को तैयार नहीं है।

दरअसल चुनावी प्रक्रिया में दिन प्रतिदिन आम लोगों की भागीदारी कम होने के चलते वोटो का प्रतिशत गिर रहा है, जो लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। लोकतंत्र की अवधारणा के पीछे मंशा थी कि बहुमत का शासन होगा, परंतु आज वोटों के आधार पर प्राप्त बहुमत सीटों का शासन बनकर रह गया है। पिछले चुनाव में भाजपा को कुल 39 प्रतिशत वोट मिले थे लेकिन उसे और उसके गठबंधन को 300 से अधिक सीटें प्राप्त हुई थी।
पिछले चुनाव में 67 प्रतिशत वोटरों ने अपने मत का प्रयोग किया था। यानी कि 33 प्रतिशत मतदाता ऐसे थे जो वोट देने बूथ पर गए ही नहीं। वर्तमान चुनाव में भी ऐसा वातावरण निर्मित हो गया है कि लोग मतदान के लिए बहुत उत्सुक नहीं है। चुनाव प्रचार के कई फुटेज में देखने को मिला है कि उम्मीदवार मतदाताओं के पास वोट मांगने गए और मतदाता ताश के पत्ते फेंटने में मशगूल पाए गए। वे पलट कर उम्मीदवार की तरफ देखने की भी जहमत नहीं उठाते। इस तरह के दृश्यों से देश के लोकतंत्र से मतदाताओं के अलगाव का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
सवाल यह उठता है कि मतदान के प्रति लोग उदासीन क्यों हो रहे हैं या इसको बढ़ाने के लिए चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों को क्या प्रयास करना चाहिए। यह सही है कि मौजूदा चुनाव मौसम के लिहाज से अभूतपूर्व स्थिति में हो रहा है क्योंकि पूरा देश 40 से लेकर 45 डिग्री तापमान की गर्मी झेल रहा है। गर्मी के कारण भी बहुत लोग बूथ तक नहीं जा रहे हैं लेकिन इसके लिए जो अन्य महत्वपूर्ण कारण है उनमें दो प्रमुख है। पहला कारण पलायन का है जबकि दूसरा राजनीति में लोगों की घटती हुई रुचि का।
हिंदी क्षेत्र की बड़ी आबादी रोजगार की तलाश में दूसरे प्रदेशों में पलायन कर जाती है इसलिए मतदान के दिन वह अपने मतदान केन्द्रों पर उपस्थित नहीं हो पाती। वोट प्रतिशत कम होने का इसे महत्वपूर्ण कारण माना जाना चाहिए। प्रवासियों के मतदान में हिस्सा लेने के लिए चुनाव आयोग डिजिटल मोड में चुनाव कराने पर बहुत पहले से विचार कर रहा है।
जनवरी 2022 में मुख्य चुनाव आयुक्त ने राष्ट्रीय, प्रांतीय एवं क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को रिमोट वोट देने की प्रक्रिया बताने के लिए आयोग में डेमो दिया था, जिसमें बताया गया कि देश में कुल 45 करोड़ लोग ऐसे हैं जो अपने गृह जनपद में न रहकर विभिन्न कारणों से दूसरे जिलों और प्रदेशों में रहते हैं और चाहते हुए भी वोट के लिए उपस्थित नहीं हो पाते। वर्ष 2023 में कानून मंत्री किरण रिजुजू ने राज्यसभा में बताया था कि रिमोट वोट देने के बारे में विभिन्न पक्षों को इसकी व्यावहारिकता पर विचार करने के लिए आमंत्रित किया गया।
हालांकि रिमोट वोटिंग लागू करने के पूर्व जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 एवं 1951 के उपबंधों में संशोधन की आवश्यकता होगी, लेकिन विशेषज्ञों की राय है कि आज जब डिजिटल प्रणाली से चुनाव प्रक्रिया यानी ईवीएम पर उठे सवालों पर उच्चतम न्यायालय ने अंतिम रूप से मोहर लगा दी है तो रिमोट वोट डालने का मार्ग भी प्रशस्त हो गया है।
अब बात करते हैं चुनाव के प्रति लोगों की घटती रुचि का। हमारे देश में आज भी अधिकांश लोग राजनीति को सकारात्मक नजरिए से नहीं देखते। अक्सर लोगों को यह कहते हुए सुना जाता है कि राजनीति और चुनाव कुछ गिने-चुने लोगों का धंधा बनकर रह गया है। यही वे लोग हैं जो जब कभी चुनाव आता है और मतदान देने की बात होती है तो रामायण की चौपाई पढ़ने लगते हैं कि कोई नृप होहि हमें का हानि, चेरि छोड़ि होइब ना रानी।
दरअसल गांव से लेकर शहर तक राजनीतिकों का एक ऐसा पेशेवर वर्ग बन गया है जिसने ग्राम पंचायत से लेकर राज्य विधान मंडलों एवं संसद तक हर तरह के चुनाव को संचालित एवं नियंत्रित करने का पेशा बना लिया है। इसके चलते एक बड़ी आबादी राजनीतिक प्रक्रिया से खुद को अलग महसूस करने लगी है। इसमें राजनीतिक दलों की भी अपनी भूमिका है। पहले राजनीतिक दल विशेष अभियान चलाकर आम लोगों को दलों से जोड़ने का काम करते थे। जिन कार्यकर्ताओं को जोड़ते थे, उन्हें अपने विचारों और कार्यक्रमों से प्रशिक्षित भी करते थे, जिससे कि उनका राजनीतिक करण होता था। अब राजनीति केवल पैसों और मैनेजमेन्ट का खेल बन गई है।
पंचायत चुनाव से लेकर संसदीय चुनाव तक जिसके पास धन बल होता है वहीं चुनाव लड़ने की योजना बना पाता है। राजनीतिक दलों द्वारा टिकट के लिए पैसे लेने की भी खबरें आती रहती हैं। वोटो की ठेकेदारी भी शुरू हो गई है। वोटों के ठेकेदार किसी प्रत्याशी को आम मतदाता से सीधे संपर्क में आने से रोकने का हर संभव प्रयास करते हैं। चुनाव में बिचौलियों की तो चांदी हो गई है लेकिन चुनाव लड़ रहे नेता और मतदाता कार्यकर्ता के बीच सीधा संपर्क संवाद लगातार घटता जा रहा है।
इस आग में मीडिया के बढ़ते दखल ने घी का काम किया है। प्रौद्योगिकी ने मीडिया की पहुंच और उसकी रफ्तार इतनी तेज कर दी है कि मतदाता सूचनाओं की बौछार से आक्रांत है। मतदाताओं के पास इस गति से राजनीतिक सूचनाएं दागी जा रही हैं कि वह कोई अर्थपूर्ण राजनीतिक फैसला लेने की स्थिति में नहीं रह गया है। भेड़ बकरियों की तरह मतदाताओं को एक निर्णय की तरफ धकेला जा रहा है। इस काम में बाजार भी बढ़-चढ़कर अपना योगदान दे रहा है। एआई और डीप फेक ने रियलिटी और वर्चुअल रियलिटी के बीच के फासले को अत्यंत कम कर दिया है जिसने अर्धसत्यों के राजनीतिक इस्तेमाल को बढ़ावा दिया है।
ऐसे में किनारे बैठ वाली मुद्रा से बाहर निकाल कर नागरिक समाज को समझना होगा कि मतदान लोकतंत्र की मजबूती और विकास के लिए महत्वपूर्ण होता है। कैसे भी हो, विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, मीडिया, राजनीतिक दल, प्रबुद्ध नागरिक समाज सब मिलकर समावेशी सामाजिक सांस्कृतिक वातावरण निर्मित करने के लिए आगे आएंगे तभी हम मतदाता के मन में दायित्व के प्रति निष्ठा का भाव भर सकेंगे, और वह लोकतंत्र के लिए शुभ होगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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