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दक्षिण में भाजपा की उम्मीदें मोदी मैजिक के भरोसे

Dakshin Bharat mein BJP: प्रधानमंत्री मोदी ने जब 17वीं लोकसभा में अपने अंतिम संबोधन में भाजपा के लिए 370 सीटें और एनडीए के लिए चार सौ सीटों का जिक्र किया तो प्रधानमंत्री को इस बात का एहसास था कि उनके लगातार तीसरे कार्यकाल के लिए वह तीन सौ सत्तर सीटों का जो टारगेट सेट कर रहे है वह दक्षिण के राज्यों के समर्थन के बिना संभव नहीं है।

दक्षिण से आने वाले राज्यो में शामिल कर्नाटक से 28, आंध्र पदेश से 25, तेलंगाना से 17, तमिलनाडु से 39, केरल से 20 और एक सीट वाले पुडुचेरी मेें कुल मिलाकर लोकसभा की 130 सीटें आती है। 2019 में भारतीय जनता पार्टी इन 130 सीटों में से 29 सीटें ही जीत पाई थी। उसमें भी 25 सीटें अकेले कर्नाटक और चार सीटें तेलंगाना से मिली थी। तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश और पुडुच्चेरी मिलाकर 85 लोकसभा सीटों मे से बीजेपी को एक भी सीट नहीं मिली थी।

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भाजपा उत्तर भारत में अपने प्रदर्शन के शीर्ष पर है और अपने आंकड़ों को बढ़ाने के लिए इस बार भाजपा दक्षिण में अपने प्रदर्शन पर निर्भर है। इसलिए भाजपा ने दक्षिण की 130 सीटों में से 50 सीटें जीतने का लक्ष्य निर्धारित किया है। भाजपा की रणनीति लंबे समय से दक्षिण को फतह करने की रही है, परंतु दक्षिण की हिन्दुत्व विरोधी राजनीतिक संस्कृति में पले बढ़े मतदाताओं के बीच उसकी यह इच्छा मोटे तौर पर अधूरी ही रहती आई है।

भाजपा को उम्मीद है कि मोदी की लोकप्रियता, भाजपा संगठन और संघ के लगातार जमीनी स्तर पर काम के दम पर दक्षिण में भाजपा के लिए वोटों की फसल लहलहा सकती है। इसकी वजह 2019 के चुनाव में वोटों की हिस्सेदारी के ब्यौरे में है। बीजेपी को कर्नाटक में 51.38, तेलंगाना में 19.45, केरल 12.93,तमिलनाडु 3.66, आंध्र प्रदेश 0.96 प्रतिशत वोट मिले थे। इसलिए पार्टी ने अभी की योजना में ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों की पहचान की है, जिन्हें इस बार जीता जा सके।

कर्नाटक में भाजपा मजबूत है और विधानसभा चुनाव कांग्रेस से हारने के बाद भी भाजपा को भरोसा है कि वह कर्नाटक में अपने पिछले प्रदर्शन के आस-पास रह सकती है। 2019 में भाजपा ने राज्य की 28 सीटों में से 26 सीटें (एक सीट सहयोगी निर्दलीय को मिलाकर) जीत ली थी। हालांकि इस बार कर्नाटक में भाजपा की राह इतनी आसान नहीं है। बीते दस महीनों में कांग्रेस ने कर्नाटक में जनकल्याण गारंटियों पर 33 हजार करोड़ रूपये खर्च कर दिए हैं और कांग्रेस इन योजनाओं से लाभार्थी हुए 4.5 करोड़ लोगों से समर्थन की उम्मीद कर रही है जबकि भाजपा मोदी मैजिक और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर निर्भर है।

वहीं तेलंगाना में इस लोकसभा चुनाव में कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है। राज्य की 17 लोकसभा सीटों के लिए 13 मई को मतदान होगा। 2023 में विधानसभा जीत से उत्साहित कांग्रेस सियासी समर में बीआरएस को पटखनी देने के लिए पूरा जोर लगा रही है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री और कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष रेवंत रेड्डी बीआरएस प्रमुख चंद्रशेखर राव पर भ्रष्टाचार करने और परिवार को आर्थिक लाभ देने का आरोप लगा रहे हैं।

कांग्रेस इस राज्य से 2019 में जीती 3 सीटों से बढ़कर 10 से ज्यादा सीटें जीतने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है, वहीं भाजपा एक दशक में विकास को आगे बढाने वाले दूरदर्शी नेता के तौर पर पीएम मोदी के चेहरे को आगे कर मोदी की गांरटी और केन्द्र की योजनाओं को भुनाने की पूरी कोशिश कर रही है।

भाजपा 2019 की चार सीटों के मुकाबले इस बार बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद के साथ कई चुनौतियों से भी जूझ रही है, जिसमें प्रतिद्वदियों के मुकाबले स्थानीय स्तर का कोई प्रभावी एजेंडा न होना शामिल है। दूसरे दलों से आए नेताओं को सहजता के साथ स्वीकारने में राज्य नेतृत्व की विफलता, पार्टी दिग्गजों के बीच मनमुटाव, नए नेताओं की खूबियों को भुनाने में दूरदर्शिता का अभाव और हिंदुत्व विचारधारा का खास प्रभाव न होना भाजपा के लिए बड़ी चुनौतियों में शुमार है। तेलंगाना में भाजपा एक जीवंत संगठनात्मक ढांचा तैयार करने में भी नाकाम रही है। ओबीसी वोटों पर निर्भर भाजपा की नजर हैदराबाद के आसपास की सीटों के अलावा उत्तरी तेलंगाना की सीटों पर है।

लेकिन भाजपा को सबसे ज्यादा उम्मीद तमिलनाडु से है। अन्नामलाई के भरोसे भाजपा ने एआईडीएमके से गठबंधन तोड़ा और तमिलनाडु में पहली बार अपना गठबंधन बनाने और उसकी अगुवाई करने का दम दिखाया। तमिलनाडु में भाजपा अपने दम पर 19 सीटों पर मैदान में उतरी है और सहयोगी दलों को 20 सीटें दी है। चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने तमिलनाडु में 10 से अधिक यात्राएं और 13 से ज्यादा रैलियों को संबोधित किया। बहरहाल तमिलनाडु में मतदान हो चुका है और भाजपा वहां तीन सीट जीतने की उम्मीद कर रही है।

तमिलनाडु के बाद भाजपा ने अपनी ताकत केरल मेे भी झोंकी है, जहां 26 अप्रैल को मतदान होना है। केरल भाजपा के लिए एक ऐसा भूभाग है जहां हिन्दुत्व स्थानीय शब्दावली में दाखिल हो चुका है। तभी तो 2009 में 6 फीसद के मुकाबले भाजपा का वोट शेयर 2019 में दहाई अंकों तक पहुंच गया। भाजपा इस छोटे से राज्य में अपना खाता खोलने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है। 2019 में अपनी प्रचंड जीत के बाद भाजपा मुख्यालय पहुंचे मोदी ने केरल को लेकर कहा था कि छोटे से राज्य में छोटी सी गैर मौजूदगी भी खलती है। उन्होंने उस समय कहा था कि 2024 में हम केरल में नारियल फोड़ेगे।

राहुल गांधी के वायनाड़ से दूसरी बार मैदान में होने के बाद कांग्रेस इस बार भी केरल में मजबूत है। 2019 में कांग्रेस के नेतृत्व में यूडीएफ ने 20 में से 15 सीटें जीती थी। इस बार भी कांंग्रेस को पिछला प्रदर्शन दोहराने की चुनौती के साथ भाजपा को खाता खोलने से रोकना भी है। भाजपा हर हाल में कांग्रेस के दबदबे वाले राज्य में इंट्री चाहती है इसलिए उम्मीदवारों का चयन भी सोच समझकर किया गया है और हाई प्रोफाइल नेताओं को मैदान में उतारा गया है।

शशि थरूर के सामने केेन्द्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर को उतारा है। त्रिशुर में फिल्म स्टार से नेता बने सुरेश गोपी कड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं। भाजपा ने केरल की लड़ाई में एक वैचारिक मोड़ ला दिया है। भाजपा को अभी तक केरल में एक भी लोकसभा सीट नहीं मिली है लेकिन भाजपा इस बार तिरूवनंतपुरम, त्रिशुर और पत्तनमत्तिट्टा को हासिल करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है। केरल में भाजपा ईसाईयों को साथ लेकर बहु फसली जमीन तैयार करना चाहती है। केरल में भगवा असर बढ़ रहा है। 2019 में भाजपा के उम्मीदवारों ने 2 से 3 लाख तक वोट प्राप्त किए थे। इस बार भाजपा को उम्मीद है कि खाता खुलेगा ही।

दक्षिण के तीसरे राज्य आंध्र प्रदेश में भाजपा टीडीपी के साथ मिलकर अपना खाता खोलने की उम्मीद कर रही है। चुनाव की घोषणा से पहले ही आंध्र के मुख्यमंत्री और वाईएसआर कांग्रेस प्रमुख जगन मोहन राज्य के चार अंचलों में चार विशाल सिद्धम (तैयारी) रैलियां कर चुके थे। इसकी शुरूआत विशाखापट्टनम से 27 मार्च को हुई थी। उसके बाद 21 दिवसीय मेमंत सिद्धम (पूरी तरह से तैयार) बस यात्रा से प्रदेश को नाप चुके हैं।

दूसरी तरफ टीडीपी प्रमुख पूरे राज्य में प्रजा गलम (जनता की आवाज) यात्रा से समर्थन मांग रहे हैं। नायडू को उम्मीद है कि मोदी की लोकप्रियता और भाजपा संगठन और पवन कल्याण का साथ उन्हें अतिरिक्त ताकत मुहैया कराएगा। आंध्र प्रदेश में टीडीपी 17 सीटों पर, भाजपा 6 सीटों पर और पवन कल्याण की जनसेना दो सीटों पर लड़ रही है। विधानसभा चुनाव की बात करें तो 175 सीटों में से टीडीपी 144 सीटों पर, जनसेना 21 सीटों पर और भाजपा 10 सीटों पर चुनाव लड़ रही है।

टीडीपी ने कांग्रेस और वाईएसआर कांग्रेस छोड़कर आए नेताओं को भी जमकर टिकट दिया है। जगन ने बस यात्रा 'मा भविष्य तू' अभियान चलाया, जिसका असर हुआ है। आंध्र प्रदेश के दक्षिण में जगन का जादू बरकरार है लेकिन मध्य में चंद्रबाबू नायडू मजबूत नजर आते हैं। विशाखापटटनम, पूर्वी और पश्चिमी गोदावरी, गुंटूर, प्रकाशम जिलों मे चंद्रबाबू नायडू की साइकिल का परचम लहरा रहा है। जबकि उत्तरी और दक्षिणी छोर पर जगन के चुनाव चिन्ह पंखे के फैन नजर आ रहे हैं। भाजपा आंध्र प्रदेश में भी एक लोकसभा सीट पर जीत की उम्मीद कर रही है।

मोदी को पूरी दुनिया का सबसे लोकप्रिय नेता बता रही भाजपा को इस बात का दर्द है कि दक्षिण के राज्य मोदी को स्वीकार नहीं कर सके हैं। इसलिए भाजपा मोदी के दम पर दक्षिण में दाखिल होने की कोशिश कर रही है। दक्षिण के लोग धर्मपरायण होते हुए भी उन्होंने धर्म को राजनीति से ज्यादातर अलग ही रखा। दक्षिण के सियासी लैंडस्कैप को बदलने की भाजपा की इच्छा विचारधारा और रणक्षेत्र की जरूरतों से प्रेरित है। एक दशक से भारत में शासन कर रही राष्ट्रीय पार्टी के लिए दक्षिण में मौजूद न होना सचमुच बैचेनी पैदा करता है। इस बार वह उस बेचैनी को मिटाना चाहती है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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